दुनिया में अगर कुछ भी निश्चित है तो वो है मौत। ज़िंदगी कुछ और नहीं बल्कि खुद के रोने के साथ इस दुनिया में आगमन से लेकर दूसरों के रोने के साथ वापसी के बीच का सफर है।
स्त्री पुरुष द्वारा संतान उत्पत्ति की चाह स्वयं की इक्क्षा होती है फिर चाहे वो संतान सुख की अनुभूति के लिए हो या अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए अथवा कुछ और। किंतु एक तरीके से उसके परवरिश की नैतिक जिम्मेदारी उस दंपत्ति की होती है सिर्फ़ इसलिए कि उस संतान को इस दुनिया में लाने का निर्णय उनका स्वयं का था।
ऐसे में हर मां बाप अपनी संतान को स्वयं से ज्यादा सुख, सुविधा और अन्य जरूरतों की पूर्ति पर अधिक ध्यान देता है। इन सबके बीच मायने ये रखता है कि जब किसी परिवार के पास दो वक्त की रोटी खाने के सिवाए कुछ न हो और फिर भी वह अपने संघर्ष और मेहनत से खुद का और अपनी आने वाली पीढ़ी का जीवन स्तर और उद्पादकता बढ़ाने के लिए तत्पर रहता है। नैतिक रूप से उनकी सराहना इस मामले में की जानी चाहिए।
बदलते परिवेश और आधुनिकता के दौर में नवीन पीढ़ी ने संघर्ष और संवेदनशीलता के रास्ते से हटते हुए अधिकतर चीजों के लिए दोषारोपण का रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है और अपने जीवन को हर मामले में तुलनात्मक बना कर रखा हुआ है।
क्या मानव मात्र का जीवन मिलना ही अनमोल नहीं? जिसे हम अपने संस्कार, संस्कृति, संघर्ष, संवेदनशीलता से इसे एक नया आयाम दे सकते हैं। जिम्मेदारियों से भागती ये युवा पीढ़ी जो सिर्फ़ अब भौतिकतावादी चीजों में ही अपना जीवन देखता है उसे अपने पूर्वजों के ऋणी होने का एहसास कब और कैसे होगा।
मैं भी ख़ुद को इसी युवा पीढ़ी की फ़ेहरिस्त में रखता हूं। गांव के ही बुजुर्गों की कहावत है कि व्यक्ति कहीं भी पहुंच जाए उसे अपनी जड़े नहीं भूलनी चाहिए क्योंकि वो ही उसे जमीन से जोड़े रखने का काम करती है। आपके सम्बंध और आपकी व्यवहारकुशलता ही इस जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है जो शाश्वत रहती है बाक़ी चीजे समय और परिवेश से बदलती रहती हैं।
उम्र बढ़ने के साथ जब व्यक्ति परिपक्व होता जाता है तो उसे प्रौढ़ावस्था में बड़ो की बोझिल लगने वाली बातें न सिर्फ़ बेहतर समझ आने लगती हैं बल्कि उनके प्रति उनका नज़रिया भी बदलने लगता है।
मध्यम वर्गीय परिवार जन्म के बावजूद ईश्वर और परिवार की तरफ से कभी कोई कमी महसूस नहीं हुई बल्कि आवश्यकता से अधिक समस्त चीज़ों की प्रतिपूर्ति की गई। पर समय समय पर पूर्व की प्रथम और दूसरी पीढ़ी के संघर्षों की कहानियां बताई जाती रहीं हैं जिससे हम सभी प्रदत्त सुविधाओं का दोहन न करें।
अइया(पिता जी की दादी) जिनका सानिध्य मिला तो पर उनको करीब से ज्यादा अनुभव करने का मौका नहीं मिला सिवाए उनकी व्यक्तिगत घटनाओं और कहानियों के सुनने के। परंतु अम्मा(दादी) को देखने समझने और उनके साथ वक्त बिताने का समय खूब मिला, थी तो वो निरक्षर ही पर अपने काम के प्रति लगन, निष्ठा और मेहनत उन्हें अलग बनाता है। सुबह भोर होते ही उठने से लेकर फिर रात्रि को सोने के बीच का समय उनका सिर्फ़ पारिवारिक गतिविधियों में ही गुजरता था। दैनिक सामग्री की व्यवस्था उसका संरक्षण और उसका उचित वितरण इतना आसान नहीं जब आपके पास लोगों की संख्या सामान्य परिवारों से ज्यादा हो।
घर उसमें रह रहे लोगों से होता है वरना वह ईंट से बनी दीवारों का मकान होता है। मकान को घर बनाने, उसे संजोने और समय समय पर उसे उद्दीपित करने का काम हमेशा घर की स्त्रियों ने ही किया है। पुरुष जो ख़ुद को हमेशा अस्त-व्यस्त पाता है उसे घर की ज़िम्मेदारी न ही मिले तो बेहतर है। पितृसत्तात्मक सत्ता जिसका वर्चस्व सदियों से रहा है और जिसने आर्थिक गतिविधियो की ज़िम्मेदारी उठाई रखी उसने सब कुछ इसी को समझा। अन्य पारिवारिक एवं घरेलू कामों में दिन रात लिप्त स्त्रियों के कामों को कोई तवज्जों दी ही नहीं। पर आज संसाधनों के उचित वितरण से लेकर हर क्षेत्र में समान प्रतिनिधि मिलने पर पुरुषवादी सोच रखने वाले समाज का सिंहासन हिलने लगा है।
Too be Continued…… Wait for full letter 🙏

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