ख़ामोशियाँ रोमांटिक होती हैं
हाँ, शायद रोमांस से भी कहीं ज़्यादा।
क्योंकि ख़ामोशी की तारीफ़
ख़ामोशी से ही हो सकती है;
लफ़्ज़ वहाँ अक्सर
अपने ही अर्थों का बोझ
ढोते हुए थक जाते हैं।
ख़ामोशी में बैठे दो चेहरे
बीच में बहती एक शांत मधुर हवा,
जो एक के माथे को चूमते हुए
बालों के साथ दूसरे तक पहुँच जाती है,
जैसे समय भी
उन दोनों के बीच
धीरे से सरक आया हो।
आँखें बहुत कुछ कहना चाहती हैं,
पर कहना छोड़ देती हैं
इस गहरे भरोसे के साथ
कि सामने वाली आँख
हर अधूरी बात,
हर रुक गई पुकार
अपने आप पढ़ लेगी।
पलकों पर ठहरी
एक आख़िरी अश्रु-बूँद,
जो टपककर कपोल से होती हुई
मिट्टी में समा जाना चाहती है
मानो किसी लंबे इंतज़ार का
थका हुआ निष्कर्ष हो।
उस बूँद के गिरने से पहले ही
वह दूसरी आँख
उस पूरे क्रम को
अक्षरशः पढ़ चुकी होती है
हर कंपन, हर थरथराहट,
हर अनकही प्रार्थना,
हर वह डर
जो प्रेम में
चुपचाप पलता है।
और फिर
उस आख़िरी बूँद के गिरने से पहले ही
एक आलिंगन
उसे थाम लेता है।
ऐसा आलिंगन
जो रोकता नहीं,
बस सहारा बन जाता है।
साँसों की गरमाहट
एक-दूसरे को पहचान लेती है,
जैसे वे पहले से
एक-दूसरे की भाषा जानती हों।
वह बाहें
बिना किसी आग्रह के
और भी क़रीब खींच लेती हैं
क्योंकि अब दूरी
कोई ज़रूरत नहीं रही।
अब चारों आँखें
एक साथ बंद हैं।
हवा में किसी अनजानी ख़ुशबू के साथ
दोनों की साँसें
एक-दूसरे में
घुलती जा रही हैं
जैसे दो अलग अस्तित्व
अपनी सीमाएँ
धीरे-धीरे भूल रहे हों।
और उसी लंबे आलिंगन के बाद,
जब वे एक-दूसरे का माथा
हल्के से चूमते हैं
और आँखें खुलती हैं
तो उनमें एक अलग रंग की
चमक और आकर्षण होता है,
मानो सदियों पुरानी
किसी खोई हुई सभ्यता का
पुनर्मिलन हो गया हो।
पुनर्मिलन का यह संयोग
आँखों के मिलने के साथ
अधरों को मिलने से भी
रोक नहीं पाता।
कुछ पल के लिए खुली आँखें
मानो अपनी बात कहकर फिर से बंद हो गई हों,
सब कुछ कह देने की चाह में
सूख चुके अधर
जब आपस में अंतर्लीन होते हैं,
तो समय का कारवाँ
मानो थम-सा गया हो।
सूरज की लालिमा
ढलते-ढलते
क्षीण होने के कगार पर होती है,
लेकिन ये पल
दुनिया के किसी कोने में
जैसे स्थिर हो गए हों, बिलकुल फ्रीज।
अधरों का वह मिलन
किसी उत्कंठा का शोर नहीं था,
बस एक मौन सा स्वीकार था
कि अब थकान को
कहीं टिकने की जगह मिल गई है।
(चुम्बन के बाद
वह धीरे से
अपना सिर उसकी गोद में रख देता/देती है)
जैसे वर्षों की भटकन के बाद
किसी छाया ने
अचानक अपने होने की
अनुमति दे दी हो।
गोद कोई आसन नहीं रह जाती,
वह एक आश्रय बन जाती है
जहाँ धड़कनें
बिना गिने चल सकती हैं,
और साँसें
ख़ुद को साबित करने से
मुक्त हो जाती हैं।
उँगलियाँ बालों में
बिना किसी क्रम के उतरती हैं,
सिर्फ़ इतना जानती हुईं
कि यहाँ
कोई जल्दी नहीं है।
वह सिर
जो अब गोद में टिका है,
किसी प्रश्न की तरह नहीं,
एक उत्तर की तरह
विश्राम कर रहा है।
और फिर
विश्राम भी
धीरे-धीरे
ठहराव में बदल जाता है।
ऐसा ठहराव
जहाँ समय
आगे बढ़ने का साहस नहीं करता,
और प्रेम
बस साँस लेता है।
शब्द तब तक
चाँदनी रात में
पूरी तरह खो चुके होते हैं
और उनकी कोई कमी
अब महसूस नहीं होती।
क्योंकि वहाँ
कहने के लिए
कुछ बचा ही नहीं होता है।
वहाँ सिर्फ़ ख़ामोशियाँ हैं
जो हृदय-गति से
संवाद कर रही हैं।
साँसें हैं,
जो वह सब कह रही हैं
जिसे शायद
किसी शब्दकोश ने
कभी नाम दिया ही नहीं।
ऐसे क्षणों में
प्रेम कुछ कहता नहीं
वह बस
ठहर जाता है।
और वही ठहराव
सबसे गहरा,
सबसे पूर्ण
स्वीकार बन जाता है।
हाथों में हाथ लिए,
जीवन की सार्थकता में
खो जाने के लिए
वे दोनों
एक ही रास्ते पर
एक साथ चल पड़ते हैं
बिना कुछ कहे,
बिना कुछ सुने,
बस यूँ ही…. (एक लंबा अन्तराल यूँ ही बीतता है बिना एक शब्द कहे/सुने)
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