किसी को वास्तव में जानने के लिए ख़ुद को भूलना पड़ता है। क्योंकि जब तक ‘मैं’ बचा रहता है, तब तक सामने वाला पूरा दिखाई ही नहीं देता। और यह जानना, यह समझना, किसी तर्क से नहीं, ठहराव से आता है उस ठहराव से, जहाँ मन भागना छोड़ देता है और आत्मा सुनने लगती है। इतना लीन होना एक-दूसरे में कि यह भी याद न रहे कि हम दो हैं कब एक-दूसरे से होकर गुज़र गए, और कब एक-दूसरे में समा गए, इसका हिसाब भी न बचे। यही वह क्षण है जहाँ संबंध अनुभव बन जाता है, परिभाषा नहीं। ऐसे में शारीरिक संबंध भी केवल देह का उत्सव नहीं रहते, वे आत्मा के संवाद का स्वाभाविक विस्तार बन जाते हैं। आत्मिक निकटता के बिना देह का स्पर्श अधूरा ही रहता है वह छूता तो है, पर पहुँचता नहीं। जब साँसों की लय पहले ही एक हो चुकी हो, जब उपस्थिति मात्र से मन शांत हो जाता हो, तभी देह भी किसी साधना की तरह खुलती है जहाँ भोग नहीं, समर्पण प्रधान होता है। इसलिए सच्चा मिलन पहले आत्मा में घटता है, फिर देह में उतरता है। और जो संबंध इस क्रम को समझ ले, उसके लिए प्रेम सिर्फ़ चाह नहीं रह जाता, वह चेतना का विस्तार बन जाता है।
उस क्षण में जब आँखें अपने आप बंद हो जाती हैं, तो देखने का काम स्पर्श संभाल लेता है। गर्दन के पास ठहरता हुआ स्पर्श किसी आम चाह से नहीं, किसी गहरे अपनत्व से जन्म लेता है जैसे कोई परिचित धुन बहुत पास आकर धीमे से याद दिला दे कि तुम सुरक्षित हो। देह के उभार और वक्र यहाँ आकर्षण का विषय नहीं रहते, वे तो केवल उस लय के पड़ाव बन जाते हैं जहाँ ठहरकर साँसें एक-दूसरे को पहचानती हैं। हाथ जब वहाँ टिकते हैं, तो वे लेने नहीं, सुनने लगते हैं देह की उस भाषा को जो शब्दों से बहुत पुरानी है। फिर एक खेल-सा आरंभ होता है, पर वह खेल भी किसी जीत या अधिकार का नहीं, दो चेतनाओं के एक-दूसरे में उतरते जाने का होता है। साँसों की गति धीरे-धीरे एक संगीत बन जाती है कभी तेज़, कभी मंद, जैसे कोई अदृश्य बाँसुरी पूरा वातावरण भर रही हो। और उस लय के साथ मानो कोई सुगंध फैल जाती है ऐसी, जो फूलों से नहीं, दो शरीर-आत्माओं के एक होने से जन्म लेती है। उस सुगंध में दोनों अपने-अपने नाम, अपनी सीमाएँ, यहाँ तक कि अपना अलग होना भी कुछ देर के लिए भूल जाते हैं। जब मिलन और गहराता है, तो वह क्रिया नहीं रह जाता, वह एक अवस्था बन जाता है जहाँ कुछ किया नहीं जाता, सब कुछ घटित होता है। दो शक्तियाँ अपने-अपने केंद्र छोड़कर एक ही अनुभूति में विलीन हो जाती हैं, जैसे दो लौ मिलकर एक ही प्रकाश बन जाएँ। उस क्षण में न शरीर प्रमुख होता है, न इच्छा केवल एक गहरा, शांत उन्माद होता है, जो थकाता नहीं, बल्कि भीतर तक विश्राम दे जाता है। और जब सब थम जाता है, तो शांति बचती है, जैसे किसी लम्बे संगीत के बाद अंतिम स्वर भी हवा में देर तक कंपन बनकर ठहरा रहता है। यही वह मिलन है जहाँ देह साधन बनती है, और आत्मा अर्थ। जहाँ प्रेम केवल महसूस नहीं किया जाता, जिया जाता है।
ख़ामोशियाँ रोमांटिक होती हैं हाँ, शायद रोमांस से भी कहीं ज़्यादा। क्योंकि ख़ामोशी की तारीफ़ ख़ामोशी से ही हो सकती है; लफ़्ज़ वहाँ अक्सर अपने ही अर्थों का बोझ ढोते हुए थक जाते हैं।
ख़ामोशी में बैठे दो चेहरे बीच में बहती एक शांत मधुर हवा, जो एक के माथे को चूमते हुए बालों के साथ दूसरे तक पहुँच जाती है, जैसे समय भी उन दोनों के बीच धीरे से सरक आया हो।
आँखें बहुत कुछ कहना चाहती हैं, पर कहना छोड़ देती हैं इस गहरे भरोसे के साथ कि सामने वाली आँख हर अधूरी बात, हर रुक गई पुकार अपने आप पढ़ लेगी।
पलकों पर ठहरी एक आख़िरी अश्रु-बूँद, जो टपककर कपोल से होती हुई मिट्टी में समा जाना चाहती है मानो किसी लंबे इंतज़ार का थका हुआ निष्कर्ष हो। उस बूँद के गिरने से पहले ही वह दूसरी आँख उस पूरे क्रम को अक्षरशः पढ़ चुकी होती है हर कंपन, हर थरथराहट, हर अनकही प्रार्थना, हर वह डर जो प्रेम में चुपचाप पलता है। और फिर उस आख़िरी बूँद के गिरने से पहले ही एक आलिंगन उसे थाम लेता है। ऐसा आलिंगन जो रोकता नहीं, बस सहारा बन जाता है। साँसों की गरमाहट एक-दूसरे को पहचान लेती है, जैसे वे पहले से एक-दूसरे की भाषा जानती हों। वह बाहें बिना किसी आग्रह के और भी क़रीब खींच लेती हैं क्योंकि अब दूरी कोई ज़रूरत नहीं रही।
अब चारों आँखें एक साथ बंद हैं। हवा में किसी अनजानी ख़ुशबू के साथ दोनों की साँसें एक-दूसरे में घुलती जा रही हैं जैसे दो अलग अस्तित्व अपनी सीमाएँ धीरे-धीरे भूल रहे हों। और उसी लंबे आलिंगन के बाद, जब वे एक-दूसरे का माथा हल्के से चूमते हैं और आँखें खुलती हैं तो उनमें एक अलग रंग की चमक और आकर्षण होता है, मानो सदियों पुरानी किसी खोई हुई सभ्यता का पुनर्मिलन हो गया हो।
पुनर्मिलन का यह संयोग आँखों के मिलने के साथ अधरों को मिलने से भी रोक नहीं पाता। कुछ पल के लिए खुली आँखें मानो अपनी बात कहकर फिर से बंद हो गई हों, सब कुछ कह देने की चाह में सूख चुके अधर जब आपस में अंतर्लीन होते हैं, तो समय का कारवाँ मानो थम-सा गया हो। सूरज की लालिमा ढलते-ढलते क्षीण होने के कगार पर होती है, लेकिन ये पल दुनिया के किसी कोने में जैसे स्थिर हो गए हों, बिलकुल फ्रीज।
अधरों का वह मिलन किसी उत्कंठा का शोर नहीं था, बस एक मौन सा स्वीकार था कि अब थकान को कहीं टिकने की जगह मिल गई है।
(चुम्बन के बाद वह धीरे से अपना सिर उसकी गोद में रख देता/देती है)
जैसे वर्षों की भटकन के बाद किसी छाया ने अचानक अपने होने की अनुमति दे दी हो। गोद कोई आसन नहीं रह जाती, वह एक आश्रय बन जाती है जहाँ धड़कनें बिना गिने चल सकती हैं, और साँसें ख़ुद को साबित करने से मुक्त हो जाती हैं। उँगलियाँ बालों में बिना किसी क्रम के उतरती हैं, सिर्फ़ इतना जानती हुईं कि यहाँ कोई जल्दी नहीं है। वह सिर जो अब गोद में टिका है, किसी प्रश्न की तरह नहीं, एक उत्तर की तरह विश्राम कर रहा है। और फिर विश्राम भी धीरे-धीरे ठहराव में बदल जाता है। ऐसा ठहराव जहाँ समय आगे बढ़ने का साहस नहीं करता, और प्रेम बस साँस लेता है।
शब्द तब तक चाँदनी रात में पूरी तरह खो चुके होते हैं और उनकी कोई कमी अब महसूस नहीं होती।
क्योंकि वहाँ कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं होता है।
वहाँ सिर्फ़ ख़ामोशियाँ हैं जो हृदय-गति से संवाद कर रही हैं। साँसें हैं, जो वह सब कह रही हैं जिसे शायद किसी शब्दकोश ने कभी नाम दिया ही नहीं।
ऐसे क्षणों में प्रेम कुछ कहता नहीं वह बस ठहर जाता है। और वही ठहराव सबसे गहरा, सबसे पूर्ण स्वीकार बन जाता है।
हाथों में हाथ लिए, जीवन की सार्थकता में खो जाने के लिए वे दोनों एक ही रास्ते पर एक साथ चल पड़ते हैं
बिना कुछ कहे, बिना कुछ सुने, बस यूँ ही…. (एक लंबा अन्तराल यूँ ही बीतता है बिना एक शब्द कहे/सुने)
कई बार कोई मकान इसलिए खड़ा नहीं रहता कि उसके सारे स्तंभ मजबूत थे, बल्कि इसलिए कि एक ही स्तंभ अपनी क्षमता से अधिक बोझ उठा रहा था। हम भूल जाते हैं कि दृढ़ता हमेशा समान रूप से वितरित नहीं होती, कहीं न कहीं कोई एक तत्व चुपचाप, अकेले, पूरे ढांचे का भार संभाल रहा होता है। और जब वह एक स्तंभ थककर टूट जाता है, तब हमें पहली बार समझ आता है कि स्थायित्व एक भ्रम था, संतुलन एक धारणा, और गिरना एक अनिवार्य सत्य।
टूटन सिर्फ़ संरचना को नहीं तोड़ती, वह हमारे भीतर बसे प्रतिमानों को भी ध्वस्त कर देती है। फिर कोई कमरा पुराना कमरा नहीं रहता दीवारें केवल दीवारें नहीं रह जातीं, वे स्मृतियों की राख ढोने वाले पात्र बन जाती हैं। प्रकाश वही होता है, पर अर्थ बदल जाता है; हवा वही चलती है, पर स्पर्श अपरिचित हो जाता है। हम महसूस करते हैं कि असल में टूटता घर नहीं, हमारे भीतर की किसी गहरी व्याख्या का अंतिम सूत्र होता है।
और फिर, शुरूआत का विचार भी एक तपस्या जैसा हो जाता है। फिर से आरंभ करना यही वह प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य अपनी ही परतों का परीक्षण करता है: क्या छोड़ना है? क्या साथ रखना है? और कौन-सा कठोर सत्य अब उसके भीतर स्थायी रहेगा?
क्योंकि पुनर्निर्माण सिर्फ़ निर्माण नहीं है यह एक स्वीकार है कि पहले जो था, वह अपरिवर्तनीय रूप से बदल चुका है। और जीवन का दर्शन यही बताता है कि जो वैसा कभी नहीं लौट सकता, उसे लौटाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए; बल्कि उस रिक्ति में एक नई संभावना ढूँढनी चाहिए।
कई बार सबसे बड़ा वेदांत यही है कि मनुष्य अपने ही ढहे हुए मकान की पहली ईंट पूरी जागरूकता से, बिना भ्रम के रख दे। क्योंकि सत्य यह है गिरने के बाद ही हम वास्तविक आकार ग्रहण करते हैं, और जो आकार टूटन के बाद बनता है, वह पहले से अधिक वास्तविक, अधिक सच, और अधिक अपना होता है।
वह हमेशा से कुछ ऐसे रहा, जैसे कोई भीतर ही भीतर एक सौम्य सा गुलाब लिए घूमता हो एक ऐसा गुलाब, जिसकी पंखुड़ियाँ उसके स्वभाव में, और जिसकी सुगंध उसके शब्दों और व्यवहार में समाई हो। लोग उसे देखते तो बस मुस्कुराते, जैसे किसी अनकहे सौंदर्य से अचानक सामना हो गया हो।
लेकिन उसकी सुंदरता, उसकी सरलता, उसकी महक यह सब उतना ही टिकता है जितना किसी गुलाब का टिकता है, जब तक वह अपने अस्तित्व से जुड़ा रहे। जीवन की तीखी उँगलियाँ जब उसे बार-बार उसकी जड़ से तोड़ती हैं, तो उसकी भीतर की पंखुड़ियाँ भी धीमे-धीमे अपनी चमक और अपनी जीवन-ऊर्जा खोने लगती हैं।
कई लोग उसे देखते हैं और कहते हैं, “तुम तो हमेशा खुशबू फैलाते हो,” पर वे यह नहीं देख पाते कि वह खुशबू अब कितनी थकी हुई है। वह हर दिन अपनी सरलता को संभालता है, जैसे कोई मुरझाने लगी पंखुड़ियों को हाथों में लेकर उन्हें फिर से हवा देने की कोशिश करता हो।
सच्चाई यह है कि वह व्यक्ति बहुत ज्यादा टूट चुका है। हर अनुभव, हर छल, हर अत्यधिक उम्मीद उसकी एक-एक पंखुड़ी को थोड़ा-थोड़ा छील ले गई है। वह लोगों के बीच आज भी महकने की कोशिश करता है, पर भीतर उसे मालूम है कि उसकी खुशबू अब उतनी प्रफुल्लित नहीं रही।
कभी-कभी उसे लगता है कि वह भी उसी गुलाब जैसा है जो बहुत बार तोड़ा जा चुका है। इतनी बार कि अब वह फिर से खिलना भी चाहे तो उसके भीतर डर सबसे पहले उग आता है डर कि इस बार भी शायद उसका अस्तित्व, उसकी कोमलता, उसकी सुगंध किसी अचानक आई कठोरता से कुचल दी जाएगी।
और इसीलिए, वह अब थक गया है। अपनी पंखुड़ियों को बचाते-बचाते, अपनी सुगंध को बाँटते-बाँटते, और अपनी कोमलता को साबित करते-करते। अब उसके भीतर एक अजीब-सी इच्छा जन्म ले रही है कि शायद उसे थोड़ा-सा मुरझा जाना चाहिए, थोड़ा-सा खुद में लौट जाना चाहिए।
परंतु उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं होती। क्योंकि जैसे किसी गुलाब की जड़ में एक मौन-सी जिद छिपी रहती है फिर से खिलने की, फिर से महकने की, फिर से खुद को पहचानने की वैसी ही जिद उसके भीतर भी अब भी बाकी है।
हो सकता है आज वह थका हुआ हो, आज उसके रंग फीके हों, पर किसी अनजाने मौसम में जब हल्की-सी धूप और थोड़ी-सी सही हवा मिलेगी, तब वह व्यक्ति अपने भीतर छिपी उसी जड़ों की ताकत से एक नई महक के साथ फिर से उगेगा।
और तब उसकी खुशबू पहले से कहीं ज्यादा गहरी होगी क्योंकि उसने हर टूटन, हर मुरझाहट को अपने भीतर अनुभव की तरह संजो लिया होगा।
उस शाम भीड़ में उसका अचानक दिखाई देना किसी साधारण संयोग की तरह नहीं था; वह अधिक किसी रहस्य की अनकही परत जैसा था, जिसे समय ने तीन वर्षों तक अपने भीतर छुपाकर रखा हो और ठीक उसी क्षण अनायास खोल दिया हो, जब मन सबसे कम तैयार हो। उम्र के साथ उसके चेहरे पर चमक नहीं बढ़ी थी बल्कि वह किसी पुराने रहस्य की तरह और गहरी, और सम्मोहक हो गई थी, जैसे अच्छी तरह छुपा हुआ नशा अचानक अपना असर दिखा दे।
मैं वहीं ठिठक गया। आंखें जैसे किसी अदृश्य शक्ति से थाम ली गईं। भीड़ की आवाजें धीमी होकर एक सुरहीन गूँज में बदल गईं। सामने खड़ी वह एक चेहरा नहीं, बल्कि किसी भूले हुए संसार का द्वार थी जहाँ मेरे ही भटके हुए वर्षों की प्रतिध्वनियाँ घूम रही थीं।
उस पल ऐसा लगा जैसे समय की दिशा उलट रही हो। जैसे मैं वर्तमान में नहीं, बल्कि किसी समानांतर जगत में खड़ा हूँ जहाँ स्मृति और यथार्थ एक ही क्षण में एक-दूसरे के भीतर समा जाते हैं।
मेरी हृदयगति ने अस्वाभाविक उछाल लिया। शरीर अपनी ही धड़कनों को समझ नहीं पा रहा था और मन किसी आध्यात्मिक कंपन्न की तरह कांपने लगा था। तीन वर्षों की दूरी एक झटके में इतने पास आकर खड़ी हो गई थी कि लगा शायद वे कभी बीते ही नहीं थे; उनका बहना शायद एक भ्रम था, और वह भ्रम अब टूट रहा था।
उसकी आँखों में एक गहरी स्थिरता थी ऐसी स्थिरता, जो वक्त से नहीं, किसी छुपे हुए अनुभव से जन्म लेती है। और उसी स्थिरता में एक क्षणिक कंपन भी था, जो मुझे कह रहा था कि यह मिलना अनायास नहीं है। इसके पीछे कोई राज़ है कोई अदृश्य खिंचाव, जो हम दोनों को बिना बताए इस भीड़ में एक-दूसरे के सामने ले आया है।
मैंने महसूस किया कि भीतर कोई द्वंद उठ रहा है। न शब्दों का, न तर्कों का— बल्कि अस्तित्व का।
ऐसा लगा जैसे मेरे भीतर कोई प्राचीन यायावर बैठा हो, जो वर्षों से किसी संकेत की प्रतीक्षा कर रहा था। और यह क्षण यह अचानक का मिलन उसी संकेत की तरह सामने उभरा हो: अचरज से भरा, असमझ, परंतु अत्यंत परिचित।
उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी, पर उसमें इस बार कोई अनकहा बोझ भी था जैसे किसी ने जीवन के रहस्यों को फुसफुसाकर उसे सौंप दिया हो और उसने उन्हें चुपचाप स्वीकार लिया हो। और मैं… मैं उन रहस्यों की सुगंध को दूर से ही महसूस कर पा रहा था।
उसके पास पहुँचते हुए मुझे लगा कि शायद यह कोई वास्तविक दृश्य नहीं है, बल्कि मेरे भीतर की कोई अनुभूति बाहर आकार ले रही है। पांव ज़मीन पर थे, पर मन किसी और आयाम में। यह मिलना किसी सामान्य मानवीय अनुभूति के दायरे में नहीं आता था। इसमें कुछ अतिरिक्त था कुछ ऐसा, जिसे भाषा पकड़ नहीं सकती।
वह पास थी, फिर भी पहुँच से बाहर। जैसे धुंध में उकेरी गई कोई आकृति कोमल, गहन, और क्षणभंगुर। उसकी उपस्थिति एक नज़र में एक अनुभूति थी और दूसरी नज़र में रहस्य का गहरा साया।
वक्त कुछ क्षण के लिए स्थिर हो गया था। जैसे दुनिया अपनी चकरी रोककर केवल हम दोनों के लिए एक छोटा-सा मंच बना रही हो, जिस पर एक दृश्य बिना किसी संवाद के, सिर्फ़ अनुभूतियों में लिखा जा रहा था।
और फिर उतना ही सरल, उतना ही रहस्यमय, वह क्षण टूट गया। उसने हल्के से मुस्कुराया ऐसा लगा मानो वह मुस्कान किसी अनकहे अध्याय की अंतिम पंक्ति हो। एक पंक्ति जिसे पढ़कर मन थोड़ी देर तक ठहरा रहता है, पर आगे बढ़ना सीख लेता है।
वह भीड़ में विलीन होने लगी। और मैं उसी स्थान पर ठहरा रहा जैसे किसी अद्भुत घटना का शेष कंपन अभी भी शरीर के भीतर गूँज रहा हो।
तभी भीतर एक गहरी समझ उतरी कि यह घटना किसी वापसी का वादा नहीं थी, किसी प्रेम की पुनःस्थापना नहीं, किसी पुनर्मिलन का प्रारंभ भी नहीं।
यह बस एक ठहराव था। एक अदृश्य विराम जहाँ जीवन ने मुझे क्षण भर के लिए रोककर यह एहसास कराया
कि कुछ लोग हमारी यात्रा की मंज़िल नहीं होते। वे केवल इतना करने आते हैं कि हम अपने भीतर छिपे धूल-धूसरित भावों को झाड़ सकें, अपनी अधूरी स्मृतियों को एक आकार दे सकें, और फिर उसी शांत स्वीकार के साथ आगे बढ़ सकें जिसके बिना यात्रा कभी पूर्ण नहीं होती।
उसका मिलना किसी अध्याय की वापसी नहीं था वह केवल यह बताने आया था कि मेरा रास्ता कहीं और है… और वह? वह मेरी कहानी की मंज़िल नहीं, बल्कि उस कहानी में रखा गया एक बेहद रहस्यमय, बेहद खूबसूरत ठहराव था।
एक ऐसा ठहराव जो जीवन को तो नहीं बदलता पर मन की गति को एक पल के लिए अवश्य रोक देता है।
दोस्तों! मेरा नाम है हिमांशु सुधा, कहानियां सुनाता हूँ!(Nilesh Mishra Style )
कहानी संख्या:- 1
गर्मी के मौसम का वह अंतहीन सा दिन धीरे-धीरे शाम में ढल रहा था। हवा सूखकर खुरदुरी हो चुकी थी, जैसे किसी ने प्रकृति के गले में धूल भर दी हो। सूरज, जो पूरे दिन अपने ताप के अहंकार में जलता रहा था, अब क्षितिज पर उतरते हुए अपनी पराजय स्वीकार कर रहा था। पराजित सूरज की उस धुंधली-सी रोशनी में शहर एक अजीब-सी चुप्पी ओढ़े खड़ा था एक ऐसी चुप्पी, जो बाहर से ज़्यादा भीतर सुनाई देती है।
मन में भी ठीक ऐसा ही कोई निर्जन प्रदेश उग आया था। विचारों की परतें, थकान की परछाइयाँ और न बोली गई बातों की टीस… सब मिलकर मन को एक अंतहीन रेगिस्तान बना चुकी थीं। ऐसा लगता था जैसे कल्पनाएँ भी पसीने की तरह सूख गई हों और भावनाएँ भी गर्मी की तरह थक चुकी हों।
उसी सूनेपन के बीच, अचानक एक ठंडी लहर चली एक ऐसी हवा, जो मौसम के नियमों जैसी नहीं थी। वह हवा किसी प्राकृतिक घटना की तरह नहीं, किसी उपस्थिति की तरह महसूस हुई धीमी, गहरी और भीतर उतर जाने वाली।
और फिर, वह आई।
किसी किताब में लिखे सत्य की तरह नहीं; किसी प्रार्थना की तरह नहीं; बल्कि किसी पुराने स्मृति के पुनर्जन्म की तरह।
जैसे आकाश की अनंत ऊँचाई से एक सर्द धुन धरती पर गिर पड़ी हो, और वह धुन मेरे भीतर जगह बनाती चली गई। उसकी उपस्थिति जितनी कोमल थी, उतनी ही अचूक संवेदनाओं पर बिना अनुमति कब्ज़ा करती हुई। एक अनकही शीतलता थी उसमें, जो स्पर्श न करते हुए भी छू जाती थी। उसकी मुस्कान में किसी अधूरी कविता की मिठास थी, और उसकी सादगी में किसी पुराने सत्य की ईमानदारी।
उसी क्षण, मन के भीतर फैला हुआ शोर धीमा होने लगा मानो वर्षों बाद कोई हाथ भीतर रखी हुई रेत को थामने के लिए आगे आया हो।
उससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, यह अनुभूति पनपने लगी कि जैसे लम्बे समय से बिछड़ा कोई अपना, मौन की पगडंडी से चलकर फिर लौट आया हो। जैसे लंबे इंतज़ार की घड़ी अब अपने अंतिम चक्र में हो थकी, पर राहत देती हुई।
उस शाम की ठंडी हवा, जो पहली बारिश का संकेत देती है, इस बार आँसुओं का परिचय भी बनी। लेकिन वे आँसू पुराने आँसुओं से अलग थे। वे हार की भाषा में नहीं, मुक्त होने की भाषा में गिर रहे थे।
उनमें पीड़ा की कठोरता नहीं थी; उनमें एक तरह की पारदर्शिता थी जैसे मन का बोझ पिघलकर तरल हो रहा हो। गालों तक पहुँचते-पहुँचते वे आँसू किसी मृत अंत की तरह नहीं गिरते थे; उनमें दिशा थी, एक धीमी-सी यात्रा, जैसे वे किसी और जगह पहुँचकर अर्थ बन जाना चाहते हों।
और फिर, उसकी उंगलियों का स्पर्श….. इतना हल्का जैसे हवा ने उधार लिया हो; और इतना गहरा कि मन ने उसे हमेशा के लिए रख लिया।
वह स्पर्श किसी उपचार जैसा था जैसे शरीर के पसीने को सुखाती हुई सर्द हवा आत्मा की थकान को भी शांत कर सकती है। जैसे किसी के कोमल आगोश में समा जाने भर से, भीतर के रेगिस्तान में पहली बूंद गिर सकती है।
गर्मी जब अंत की ओर होती है, और हवा में पहली बारिश की आहट घुलती है, तभी मौसम बदलता है। यह परिवर्तन प्रकृति का नहीं, मन का भी होता है। मन उसी पल समझता है कि राहत का आना हमेशा किसी बड़े शोर के साथ नहीं होता कभी-कभी इसका स्वर इतना धीमा होता है कि सिर्फ वही सुन सकता है जो लंबे समय तक अकेला रहा हो।
शायद मैं भी ऐसे ही अकेलेपन के लंबे मार्ग पर चल रहा था विचारों की भीड़ में घिरा, फिर भी भीतर से सूना। और ठीक उसी थकान के मध्य वह आई पहली बारिश की बूंद की तरह, जो सूखी मिट्टी को भिगोने नहीं, बल्कि उसे नया अर्थ देने उतरती है।
उसी अनुभूति, उसी परिवर्तन और उसी अदृश्य राहत की कहानी है यह। यह कहानी किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस क्षण की है जो जीवन में बहुत कम आता है, और जब आता है, तो एक थके हुए दिल की समूची दुनिया बदल देता है।
सही जगह पर न बोलते हुए ख़ामोश रह जाना, कई बार गुनाह करने से भी अधिक ख़तरनाक होता है। क्योंकि जहाँ अन्याय के सामने मौन ओढ़ लिया जाता है, वहाँ सच की आवाज़ दम तोड़ देती है।
इज़्ज़त, नैतिकता की चादर और तमाम झूठे वादों के आड़ में हम अक्सर अपने भीतर की कुंठाओं को पालते रहते हैं। यह कुंठा धीरे-धीरे विचारों को विकृत कर देती है, और यही विकृत मानसिकता केवल व्यक्ति के ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज के पतन का कारण बनती है।
मौन तब तक गुण है, जब तक वह विवेक से जन्म ले; पर जब वह भय, स्वार्थ या सुविधा की उपज बन जाए, तो वही मौन एक गहरी साज़िश में बदल जाता है। ऐसी चुप्पी से न तो चरित्र बचता है, न चेतना।
जब लोग बोलना छोड़ देते हैं, तो सत्ता और असत्य बोलने लगते हैं। और जब सच कहने वालों की आवाज़ें दबा दी जाती हैं, तो झूठ को सच बनने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता।
इसलिए आवश्यक है कि हम अपने भीतर की निष्ठा को जगाए रखें, सही समय पर सही बात कहने का साहस बनाए रखें। क्योंकि खामोश रहकर हम केवल अपने शब्द नहीं खोते, बल्कि धीरे-धीरे अपनी आत्मा भी खो देते हैं।
ख़ुद के सही होने/ग़लत होने का प्रमाण सिर्फ़ स्वयं के पास होता है, सच्चाई आँखें बयाँ करती हैं उसे किसी व्यक्ति/समाज द्वारा पुष्टि की आवश्यकता नहीं होती है।
सामाजिक प्राणी के तौर पर किसी भी व्यक्ति की पहचान केवल उसकी उपलब्धियों या ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, आचरण और अन्य मानवीय गुणों से होती है।
मनुष्य का आचरण उसके ज्ञान और चेतना के स्तर को स्पष्ट करता है। सामान्यतः यह देखा जाता है कि जिस व्यक्ति के पास वास्तविक ज्ञान/जानकारी होता है, वह अत्यंत विनम्र होता है। इसका कारण यह है कि ज्ञान व्यक्ति को यह समझने की क्षमता प्रदान करता है कि संसार कितना व्यापक है और उसकी स्वयं की जानकारी उस व्यापकता की तुलना में कितनी सीमित है। यह अनुभूति ही उसे विनम्र और सरल बनाती है।
जब कोई व्यक्ति ज्ञान के साथ-साथ विनम्रता को धारण करता है, तो वह समाज में कई बार आदर और प्रशंसा का पात्र बनने लगता है। किंतु अनेक बार प्रशंसा मिलने पर वह असहज महसूस करने लगता है। इसका कारण शायद यही होता है कि वह व्यक्ति स्वयं को प्रशंसा से परे रखना चाहता है। उसे भय रहता है कि कहीं अत्यधिक प्रशंसा या आदर उसे अहंकार की ओर न ले जाए।
वास्तविक ज्ञानयुक्त प्राणी को यह अनुमान रहता है कि अहंकार कहीं न कहीं विनम्रता को नष्ट कर देता है और विनम्रता के बिना ज्ञान अधूरा हो जाता है। इसलिए वह व्यक्ति भीतर से निरंतर सजग रहता है कि उसकी विनम्रता कहीं प्रशंसा की चमक में धूमिल न पड़ जाए।
इसके विपरीत जिन व्यक्तियों के पास ज्ञान का अभाव होता है/जानकारी सीमित होती है, वे अक्सर अति-उत्साही हो जाते हैं। थोड़ी-सी जानकारी के आधार पर ही वे स्वयं को विद्वान मानने लगते हैं/दिखने का प्रयास करते हैं और कई बार कुतर्क का सहारा लेकर अपनी बात सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।
ज्ञान और विनम्रता का संबंध अभिन्न है। बुद्धिशील प्राणी सदैव विनम्र रहने का प्रयास करता है और प्रशंसा से दूर रहकर अपने आत्म-संयम की रक्षा करने का भी।
विनम्रता ही ज्ञान का सबसे बड़ा आभूषण है। जिस व्यक्ति में यह गुण विद्यमान है, वह स्वयं को निरंतर सुधारते हुए दूसरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है और समाज में कुछ अमूल्य योगदान दे सकता है।
वर्तमान समय में यह प्रवृत्ति तेजी से देखने को मिल रही है कि हर व्यक्ति केवल अपनी बात कहना चाहता है, परंतु सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। धैर्य की यह कमी विशेष रूप से उन लोगों में अधिक दिखाई देती है जिनके पास पर्याप्त जानकारी या समझ का अभाव होता है। ऐसे बुद्धिहीन या सतही सोच वाले प्राणियों से बहस करने के बजाय विवेकशील व्यक्ति प्रायः मौन रहना उचित समझते हैं।
मौन रहना कई बार व्यक्तिगत स्तर पर बुद्धिमत्ता और संयम का प्रतीक माना जा सकता है, किंतु जब यह प्रवृत्ति समाज में व्यापक हो जाती है तो इसके दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। विवेकशील लोगों की चुप्पी ही धीरे-धीरे अज्ञानियों और कुतर्कियों के बोलबाले का कारण बनने लगती हैं।
ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि समाज के शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग समय रहते आगे आए और आवश्यकता पड़ने पर स्पष्ट रूप से सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का साहस दिखाएँ।
यही रवैया ही समाज को संतुलित, जागरूक और स्वस्थ बनाए रखने में मददगार हो सकता है।
I had to grow up far too soon, Hiding my tears behind a smile of noon. At a young age I learned to bear, Others’ burdens, their pain and care.
Without you, the world feels bare, Without you, no joy feels fair. Even without you, I just try to smile, But hide my emptiness all the while.
Your voice still echoes in my ear, Your prayers still show the path so clear. Your memory is the strength I hold, Your blessings shine like purest gold.
You were my only guide, I know your gaze still follows me from the other side. Yet in your love, I still survive, In your light, my soul stays alive.
पुरुष यदि स्त्रियों की संवेदनशीलता और सहनशीलता से सीख सके, तो उसका व्यक्तित्व और भी संतुलित एवं परिपक्व बन सकता है।
सिर्फ़ शिक्षा या धन से नहीं, बल्कि करुणा, धैर्य और समझ से ही सच्ची मनुष्यता पनपती है।
जब पुरुष महिलाओं की दृष्टि से दुनिया देखना सीख जाता है, तभी वह रिश्तों, समाज और जीवन के असली अर्थ को समझ पाता है
त्याग पुरुष भी करते हैं, पर स्त्रियों का त्याग निश्चित रूप से कहीं अधिक गहन और व्यापक रहा है। उन्होंने परिवार, बच्चों और रिश्तों के लिए अपने जीवन की अनेक महत्वाकांक्षाएँ सहजता से त्याग दी हैं। ऐसे उदाहरणों में पुरुषों की संख्या बहुत कम दिखाई देती है।
असली पुरुषत्व बाहुबल के प्रदर्शन में नहीं, बल्कि उस कोमल ममत्व में छिपा होता है। जहाँ शक्ति का संगम संवेदना से हो, वहीं पुरुष का सौंदर्य सबसे अधिक दमकता है।
जब उसके हृदय में दया और करुणा का विस्तार हो, तो वह केवल बलशाली नहीं, बल्कि मानवीय भी कहलाता है। वह अपने सामर्थ्य से नहीं, अपनी सहृदयता से लोगों के दिल जीत लेता है।
हम अपनी प्रेमिका से उतना ही प्यार करते हैं जितना दोस्तों से, शायद दोस्तों से अधिक ही। लेकिन यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि दोनों रिश्तों का आधार और उन्हें निभाने का तरीका अलग होता है।
गर्लफ्रेंड/प्रेमिका के साथ का रिश्ता संवेदनाओं, जिम्मेदारियों और भावनाओं का अधिक गहन रूप होता है, जबकि दोस्तों के साथ का रिश्ता सहजता, खुलेपन और अपनापन लिए हुए चलता है। जीवन में दोनों ही रिश्तों की ज़रूरत अलग-अलग तरह से होती है, इसीलिए किसी एक के लिए दूसरे को छोड़ देना या नज़रअंदाज़ कर देना कभी भी सही नहीं हो सकता,
दोस्त और प्रेमी दोनों ही हमारे जीवन को सहारा देते हैं, हमें ऊर्जा और संतुलन प्रदान करते हैं। दोनों की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ही जीवन के लिए अनिवार्य हैं। जीवन की पूर्णता इन्हीं रिश्तों के सामंजस्य से संभव हो सकती है।
आजकल अक्सर यह बहस छिड़ी रहती है कि “एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते।” मैं इस बात को नहीं मानता। दोस्ती का कोई धर्म, जाति या लिंग नहीं होता। यह केवल विश्वास, भावनाओं और पारदर्शिता पर टिकी होती है। हाँ, इतना ज़रूर है कि यदि आप किसी को दोस्त मानते हैं तो उसे उसी नज़र से देखना पड़ेगा। अगर दोस्ती के भीतर छिपकर कोई और भावना विशेषकर आकर्षण या वासनात्मक विचार आने लगे, तो फिर वह दोस्ती नहीं रह जाती, बल्कि रिश्ते का रूप बदल जाता है।
सच्ची दोस्ती की पहचान यही है कि उसमें न कोई स्वार्थ हो, न कोई छुपा एजेंडा। वहाँ केवल अपनापन हो, विश्वास हो, और जीवन के हर सुख-दुख में साथ निभाने की मंशा।
असल में, रिश्तों की खूबसूरती इसी में है कि वे अपने-अपने दायरे और महत्व में स्वीकारे जाएँ। दोस्त और प्रेमी दोनों की ज़रूरतें अलग-अलग हैं, लेकिन जीवन में दोनों का होना हमें संतुलन प्रदान करता है। जैसे शरीर और आत्मा, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, वैसे ही दोस्ती और प्रेम भी जीवन की यात्रा के पूरक हैं।
इन बातों को जितना बेहतर हम समझ पाएंगे, हमारा जीवन उतना ही सहज और सुंदर होगा। ज्ञान तभी सार्थक होता है जब वह जीवन के अनुभवों और रिश्तों के समन्वय से जुड़ जाए। मनुष्य तभी संपूर्णता की ओर बढ़ सकता है जब वह रिश्तों को समझे, निभाए और संतुलन बनाए। अन्यथा जीवन कूपमंडूकता अर्थात संकीर्णता और सीमित सोच की स्थिति में ही रह जाएगा।
रिश्तों का असली अर्थ केवल नाम देने या बहस करने में नहीं, बल्कि उन्हें सच्चाई, ईमानदारी और संतुलन के साथ जीने और निभानें में है।
यही समझ इंसान को परिपक्व बनाती है, और उसका जीवन संपूर्णता की ओर अग्रसर करती है।
हर व्यक्ति का अपना संघर्ष होता है जो कभी तुलनात्मक नहीं हो सकता। संघर्ष करना भी बहुत जरूरी है आपको जीवन का एक नया आयाम मिलता है पर कुछ संघर्ष एक यात्रा की तरह आपके जीवन में आते हैं जिनकी कोई मंजिल नहीं दिखती।
व्यक्ति अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव, संघर्ष या यूँ कहे इस जीवनरूपी कुरूक्षेत्र में अनेक महाभारत जैसे युद्ध लड़ता है जिसमें द्वंद्व भी है, डर भी है और न जाने कितनी अन्य लड़ाई है जिससे लड़ना ही है ऐसे में सभी का परिणाम सुखद या जीत का होगा, ऐसा कहां संभव होगा। ऐसे में कुछ लड़ाई लड़ी ही इसलिए जाती है जिसमें आपके जज्बे, धैर्य, सहनशीलता आदि की परीक्षा होती है सरल शब्दों में कहें तो कुछ जंग जीत-हार के लिए नहीं बल्कि इसलिए लड़ी जाती हैं कि लोग आपके सिर्फ़ लड़ाई में बने रहने के लिए ही जाने।
आज के परिवेश में ऐसी सैकड़ों बीमारियां हो चुकी है जिसके साथ व्यक्ति अपना जीवनयापन अपनी दैनिक दिनचर्चा एवं अन्य जरूरी कामों के साथ कर रहा है लेकिन कैंसर उसमें से एक ऐसी बीमारी है जिसको लेकर समाज में एक अजीब किस्म का डर है जिसके बारे में लोग बात तक नहीं करना चाहते और उस व्यक्ति एवं उसके परिवार पे इस बीमारी का एक अलग मानसिक दबाव भी पड़ता है जिसमें समाज का भी ठीक ठाक योगदान होता है। इस बीमारी से जल्द अवगत होने पर इससे पूर्णरूपेण इजात मिल सकता है अन्यथा जीवन संघर्षमय हो जाता है ।
वहीं इस बीमारी को लेकर लोगों में सही जानकारी का काफी अभाव भी है, इस बीमारी का अत्यधिक खर्चीला और न्यूनतम रिकवरी रेट भी डर का अहम कारण है। दूसरा पहलू प्राइवेट संस्थानों ने कैंसर के नाम पे एक नया बाजार खड़ा कर दिया है जहाँ इलाज कराना सामान्य परिवारों के लिए बेहद मुश्किल काम है। कुछ अस्पताल जो सरकार द्वारा या फिर सब्सिडी के तौर पर इलाज कर रहे है वहां पर मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई है कि डॉक्टर्स और मरीजो दोनो के लिए एक नया संघर्ष है जहां इलाज में विलम्ब तो होता ही है साथ में इससे होने वाले अन्य साइड इफेक्ट्स के अलावा अन्य पर्याप्त जानकारी से भी मरीज अछूता रह जाता है जिससे अधिकतर लोग अपने जीवन को वापस सामान्य स्थिति में ला ही नहीं पाते।
माँ को कैंसर से जूझते हुए लगभग तीन साल हो गए थे, अपनी तकलीफ़ों को दरकिनार कर जीवन को हमेशा नया मोड़ देने की उनकी आदत बहुत पुरानी थी लेकिन इस बार जीवन संघर्ष कुछ ऐसा था कि दोनों की इस जंग में उनकी हार लगभग निश्चित हो चुकी थी।
इस बीमारी के शुरुआती दौर में ही पता चल पाने की संभावना कम ही होती है अन्यथा कि आप अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहते हुए निरंतर चेकअप कराते हो। जैसा कि सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में कहाँ ही हो पाता है। जुलाई 2021 में अचानक से ये बात सामने आयी कि इनको बच्चेदानी(Ovary) का कैंसर हो सकता है इस बात की वास्तविक पुष्टि और सारे जाँच पड़ताल करते लगभग 30-35 दिन और गुजर गए। 50 वर्ष की उम्र तक कभी कोई बीमारी न होने के बाद अचानक से ऐसी असाध्य बीमारी का सामने आना दर्दनाक तो था ही साथ में आश्चर्यजनक भी।
बात जब निजी संबंधों के जीवन से संबंधित हो तो व्यक्ति अपनी हैसियत से ज्यादा ही कोशिश करता है। परिस्थिति की गंभीरता और जल्द राहत पाने के उद्देश्य से दिल्ली के एक प्रतिष्ठित हॉस्पिटल में सर्जरी हुई जो 6-7 घंटे तक चली। कोरोना के दौर में डॉक्टर्स, अस्पताल और आस पास के परिवेश के हिसाब से ये सब चीजें आपको थोड़ा और असहज कर देती हैं।
फिर जब आपको यह लगता है इन सबसे शायद आगे के रास्ते आसान हो जाएं तो आप सब्र रखना बेहतर समझते हैं। चार हफ्ते दिल्ली में अस्पताल का यह सफर शायद दर्द कम ही देता अगर 15 दिन बाद आई बायोप्सी की रिपोर्ट पॉजिटिव न आती।
पर समय कठिन हो तो परीक्षा भी कठिन ही होती है। इन सबके बावजूद तीसरे स्टेज के कैंसर की पुष्टि हुई। जिसमें सर्जरी के बाद कीमोथेरेपी की सलाह दी गई, सर्जरी के 1 महीने भी सही से नहीं हुए कि कीमोथेरेपी की शुरुआत हुई अब आगें के इलाज के लिए हर महीने दिल्ली जाना और वहाँ के प्राइवेट अस्पतालों का खर्चा लंबे समय तक उठा पाना मुश्किल था।
इसलिए आगें का सफर टाटा मेमोरियल अस्पताल से शुरू हुआ। सर्जरी के बाद के आवश्यक 6 सेशन जैसे थमने का नाम लेता। आगें की जाँच-पड़ताल से ये पुनः पुष्टि हुई कि इसने अपना घर बदल दिया है यानी शरीर के अन्य हिस्से में फैलने लगा है और जिसको रोकने के लिए कीमोथेरेपी के साथ अब टारगेटेड थेरैपी भी शुरू करनी पड़ेगी। और फ़िर हर 21 या 28 दिन बाद बनारस जाने और कीमोथेरेपी कराने का ये सिलसिला अनवरत जारी हो गया। यह सब सुनने समझने में बिल्कुल कहानी की तरह लग सकता है पर जब उल जलूल विचारों, अंतर्द्वंद्व और अवसादों इन सब से आप घिरने लगते हैं तो ये सफ़र मुश्किल लगने लगता है । पर इन्हीं के बीच आप को फिर से ख़ुद को संभालकर चलने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं होता।
इन परिस्थितियों ने ज़िन्दगी को देखने का दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल दिया था, हम जहाँ अपने जीवन में क्या पढ़ना है? क्या पहनना है ? आदि चीज़ों तक का निर्णय नहीं ले पाते और इन्हीं बीच आपको अचानक से किसी के ज़िन्दगी संबंधित निर्णय लेने पड़े तो आपके पैरो तले जमीन खिसकने लगती है। पर जो इन संघर्षों को चेहरे पर तनिक भी सिकन आये ख़ुद झेल लेता हो, अपनी जिंदादिली से कठिन परिस्थितियों में भी और उठ खड़े होता हो, और अधिक उत्साह के साथ अपने जीवन को नई दिशा देता हो तो आपका काम बस सहयोग करना हो जाता है और ऐसा व्यक्तित्व ही उस व्यक्ति को और महान बनाता है, माँ उसी का उदाहरण थी, जितना ही संघर्ष कठिन होता गया, “माँ ने ज़िन्दगी को ये हर दफ़ा महसूस कराया कि वो एक माँ है।”
दो से अधिक सालों में लगभग पचास कीमो सेशन और उसके तमाम साइड इफेक्ट्स के साथ कई चीज़े जिसे शब्द देना बेहद मुश्किल है लेकिन इसके बावजूद अपनी लगभग उसी दिनचर्या को बनाये रखते हुए, साथ में अपने पेशे को जारी रखना आसान हो या न हो, माँ का चलना निरन्तर जारी था, सुबह समय से उठना, काम धाम निपटाकर स्कूल जाना और वापस आकर फ़िर से वही प्रक्रिया। माँ बाप के छोटे सपने होते हैं या फ़िर होते ही नहीं, संयुक्त परिवार का हिस्सा होने से व्यक्तिगत इच्छाओं का लगभग अन्त सा हो जाता है, अपने बच्चों की शादी के साथ वह कहीं बाहर अकेले रहना चाहती थी, बहुत मुश्किल से उनके समक्ष बहन की शादी हो सकी थी,
उनके देखभाल और साथ से ज़्यादा मेरे लिए दुनिया की कोई चीज़ बड़ी नहीं थी उन्हें इस बात पर गर्व भी था, व्यक्तिगत जीवन की बहुत चीज़ों को मैंने छोड़ भी दिया और बताना उचित नहीं समझा, माँ बाप कितने भी परेशान या संघर्ष में क्यों न हो बच्चों के सपने और सुख को सर्वोपरि रखते हैं लेकिन फ़िर बच्चों का क्या कर्तव्य हैं अपने सपनों के लिए उन्हें अकेले छोड़ देना ? नहीं, मैं ये सब बकवास को नहीं मानता, दुनिया की सारी चीज़ों को मैं माँ के लिए इन्तजार करा सकता हूँ/था, और किया भी और मुझे अपने निर्णयों पर तनिक भी पछतावा नहीं फ़िर चाहे नौकरी छोड़ी हो, IIT न जाने का निर्णय किया हो या फ़िर कुछ और।
कैंसर किसी मरीज को निशाना नहीं बनाता, एक पूरे परिवार को निशाना बनाता है। तकरीबन तीन साल से इससे लड़ते हुए माँ को हंसते रोते, टूटते बिखरते और फिर से हंसते देखा था बीमारी का तो नहीं पता पर माँ का हौसला इतना बड़ा था कि उसके सामने अन्य सभी चीज़ों का कद बौना हो गया था हमें तो सिर्फ़ उसके साथ खड़े रहना और ख़ुद के और उनके चेहरे पर हँसी बरकार रखनी थी हमने कितना प्रयास किया कितना नहीं इसका हिसाब अब कौन ही करे।
आज भी मैं उस पूरी रात को याद नहीं करना चाहता क्योंकि उस काली रात का मंज़र मेरी आँखों के सामने सिर्फ़ तैरता है, उस रात हौसला टूट चुका था, दर्द ने सब्र के बाँध तोड़ दिए थे, जिसकी गोद में सर रख के बड़ा हुआ था उसको पूरी रात अपने गोद में लिटाए रखा था, समय और परिस्थिति के सामने विवश था, “बाबू हमको बचा लो, जान निकल जाएगा” ये वाक्य मेरी स्मृतियों के ख़त्म होने के साथ ही शायद मस्तिष्क में कौधना बंद करेगा।
रात्रि के अंतिम पहर में दर्द की उस उच्चावस्था में मैंने भोलेनाथ से ये प्रार्थना कि हे महादेव(माँ भोलेनाथ को बहुत मानती थी) इस दर्द से इन्हें मुक्ति दो और मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि इस मुक्ति का अर्थ महादेव क्या निकाल लेंगे।
कभी कभी दिमाग़ सोचता है कि कोई इस दुनिया से कैसे जाता है? आपका कोई अपना अज़ीज़ यूं पलक झपकते चला जाता है और आप जान नहीं पाते, समझ नहीं पाते कि हुआ क्या? ऐसा ही हुआ था मैं जान चुका था कि साँसे थम चुकी हैं लेकिन सीपीआर दे रहा था, बची थी सिर्फ़ औपचारिकता। समय को इतना क्रूर नहीं होना चाहिए कि एक बच्चे से वो न सिर्फ़ सब कुछ छीन लें बल्कि दुनिया के प्रति उसका दृष्टिकोण भी बदल दे, इन सब घटनाओं के लिए दुनिया के किसी भी शब्दकोश में कोई शब्द नहीं हैं जो कुछ भी सही सही व्यक्त कर सके, हो तो बताइएगा जिस बच्चें ने अपनी आँखों के सामने अपनी माँ के प्राण जाते हुए देखा हो और उसी से फ़िर उस मृत शरीर को पैक कराने से लेकर बिना अश्रु बहाए ले जाने जो कहा जाए, शायद करना पड़ता है पुरुष होने के फायदे भी हैं तो नुकसान भी,
मौत तो निश्चित है कौन यहाँ सदा रहने को आया है लेकिन विचारहीनता/शून्य की अवस्था क्या हो सकती है उसको महसूस किया जा सकता है जब दो मृत शरीर एक साथ हो जहाँ एक में सांस न हो और एक में बस सांस ही हो, क्योंकि मृत शरीर को आग लगाना कोई संस्कार तो हो सकता है लेकिन उस बच्चे के लिए? जो स्वयं आग भी लगा रहा हो।
माँ ने जन्म भी दिया था, पहली शिक्षक भी थीं और आज भी हैं मैं उन्हें अपने साथ लेकर चलता हूँ, और जब तक सांसें हैं उनका साथ रहेगा भी। मेरी सारी अवधारणाएं और कहानियाँ अलग हैं(जीवन को लेकर, माँ की मार को लोग प्रसाद समझते हैं, जितने भी समय तक साथ रहा उन्होंने किसी बच्चे पर कभी हाथ उठाया ही नहीं, डांट ही पर्याप्त हुआ करती थी(ज़रूरत उसकी भी शायद ही कभी पड़ती थी)।
आज पांच सितंबर है, लोग अपने शिक्षक और गुरू को याद कर रहे हैं और मैं अपनी माँ को, और सिर्फ़ आज नहीं हर दिन करता हूँ।
स्त्री और पुरुष प्राकृतिक और शारीरिक रूप से भिन्न हैं यानि दोनों को शायद अलग-अलग जिम्मेदारी मिली है, जिससे प्रकृति और समाज को सुचारू रूप से चलाने में मदद मिल सके।
इन सबके साथ दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, और शायद एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं है। स्त्री पुरुष न सिर्फ़ एक दूसरे को संपूर्णता प्रदान करते हैं बल्कि दोनों मिलकर उस व्यवस्था को भी सम्पूर्ण बनाते हैं जिसकी जिम्मेदारी उन पर है।
लेकिन हमें इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत है कि सामाजिक प्राणी के तौर पर दोनों में विद्यमान सभी माननीय गुण समान है यानि कि भावनात्मक स्तर पर दोनों की स्थिति बिल्कुल बराबर है।
एक दूसरे की पूरकता को ध्यान में रखते हुए हमें अपने साथी का चयन इस प्रकार करना चाहिए जो आपके स्वभाव, शैली और जीवन के अन्य पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आपको संपूर्णता प्रदान करे। (उदाहरण स्वरूप ख़ुद को संपूर्णता प्रदान करने से तात्पर्य है कि यदि एक अंतर्मुखी है तो दूसरा बहिर्मुखी, एक अधिक धैर्यवान तो दूसरा कम)
रिश्तों की बुनियाद सहजता पर टिकी होती है; जहाँ कोई खामोश रहते हुए भी सिर्फ़ उसका पास होना ही सुखद अनुभूति कराता हो, आप साथ खुलकर रो सके, बेतरतीब बिना कारणों के हँस भी सके। ऐसा होता है तो निश्चित रूप से ऐसे साथी का होना सौभाग्य की बात होगी।
जीवन में साथ रहते हुए कितने भी संघर्ष और दुख भले क्यों न आ जाएँ लेकिन उन कठिन परिस्थितियों में यदि एक सच्चा सहारा भी आपके पास है तो आपके लिए कहीं ना कहीं वह पर्याप्त हो सकता है वहाँ से निकलने ले लिए।
जीवन निर्वाह के लिए अन्य तमाम चीज़ों की और आवश्यकता ज़रूर होती है किंतु उन सभी में रिश्ते ही ऐसे होते हैं जो जीवन पर्यंत निरंतर बने रहते हैं। ऐसे में आप महत्व अन्य भौतिक चीज़ों को देना चाहते हैं या फिर रिश्तों को यह आपके ऊपर निर्भर करता है।
नानी अब और रोने लगी है, उसकी हड्डियों के साथ नसे भी दिखने लगी है, पिछले महीने मिलने गया था तो पता चला अब उसका रक्तचाप भी बढ़ जाता है, हर दिन तुम्हारे पास जाने को बोलती है, हां वहीं जहां बड़े मामा, नाना और तुम चली गई बिना बताए, मैं उसको अब रोकना भी नहीं चाहता, अब जब भी जाता हूं दोनों गालों पर हाथ रखकर बच्चों की तरह रोने लगती है फ़िर जब बुढ़ापे की थकान उसके चेहरे पर छा जाती है तो ख़ुद छुप हो जाती है, मेरे जाने का मन अब कम करने लगा है लोगों को संभालते संभालते मैं पत्थर हो तो गया हूं पर उसको देखकर मेरी आत्मा झकझोर उठती है,
पता है मैं अब पांच बजे उठने लगा हूं नहीं तो फ़िर सोया ही रह जाता हूं, देर से उठूं तो मिट्टी के चूल्हे में अब कोई चाय नहीं रखता इसलिए रोज ख़ुद ही बनाने की आदत डाल लिया हूं, घर ख़ुद से न पहुंचूं तो अब कोई फोन नहीं करता, हां! खाना अभी भी वहीं ढका रखा रहता है पर कभी देर हो जाए तो कोई इंतज़ार नहीं करता।
नौकरी करने अभी भी नहीं गया हूं, कभी कभी सोचता हूं किसके लिए और क्यों करूं? पर शायद कुछ दिन में करने भी लगूं, मैं तो तुम्हारे पास ही आना चाहता था लेकिन एक पागल वैद्य ने पता नहीं कई महीनों तक न जाने क्या क्या पिलाए रखा, कुछ दिनों से अब मैंने वो कड़वी घूंट पीना बंद कर दिया है।
मैंने एक जादुई दुनिया से कुछ दिनों का करार कर लिया है, वो काम जो अधूरे रह गए हैं उसको पूरा कर मैं वहीं आ जाऊंगा, तुम्हें पता है लड्डू अब पांच महीने का हो गया है कई बार तो उसको देखकर ही तुम्हारी याद जाती वो अपनी मां पर ही गया है और उसकी मां तो तुम्हारी ही बेटी है, मैंने सोच रखा है जब भी बोलना शुरू करेगा उससे पहला शब्द नानी ही बुलवाने का प्रयास करूंगा।
अरे! याद है वो लड़की जिससे तुम कभी कभी वीडियो कॉल पर बात किया करती थी, इसी साल फरवरी में उसके घर वालों ने शादी कर दी, शादी से पहले कंधे पर सर रखकर खूब रोई थी, जैसे मैं तुम्हारे गोद में सर रख के रोता था कुछ दिनों बाद उसे बहुत फोन करने का प्रयास किया लेकिन अचानक से तुम्हारी तरह बिना बनाए वो भी चली गई। मैं ढूंढने नहीं गया, जब तुम नहीं लौट रही तो उसके लौटने की क्या उम्मीद करूं मैं,
लेकिन जैसे मैंने तुम्हारी हर चीज़ को सहेज कर रखा है वैसे उसके भी सामानो को, वैसे तो सामान आंधी-तूफान, जलभराव में गुम भी हो सकते हैं पर यादें आख़िरी साँस तक रहती है तो मैंने इनको तुम्हारे उसी लोहे के बक्से में रखकर वही पुराना ताला लगा दिया हूं,
……ऑफिस से सुबोध जब उस दिन फ़िर घर लेट पहुंचा, उसे पता था उसने दिव्या को फ़िल्म दिखाने का वादा किया है उसे यह भी पता था आज फिर से ताने मिलेंगे, गुस्से को झेलना होगा; मनाना भी पड़ेगा(एक दूसरे के साथ समय बिताने की बातों को कई दिन से टाल रहा था) पर आज वह ग्लानि की मुद्रा में नहीं था, सभी बातों को सुनकर नजरअंदाज करते हुए, कमरे में चला गया क्योंकि आज वह अपनी नौकरी गवां बैठा था(कई दिनों से चीज़ें ठीक न होने पर झल्लाकर इस्तीफा सौंप आया था), उसके लिए मानो धरती सूनी हो चुकी थी कुछ खोने से कहीं ज्यादा कठिन होता है शुरू से शुरू करना, डर इसका भी था कि इसका असर व्यक्तिगत संबंधों पर भी पड़ेगा, अभी तक तो सिर्फ समय की पाबंदियां हुआ करती थी अब उसे आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ेगा।
पत्नी प्रेमिका बन जाए ऐसा कम ही हो पाता है, उसके हिस्से में उम्मीद के पूरे होने से ज्यादा त्याग आता है, संबंधों की असली परीक्षा वैसे कठिन समय में ही होती है। कभी न होने वाले इस अप्रत्याशित व्यवहार को भांपते हुए पत्नी ने स्थिति का समझने का प्रयास किया((स्त्रियां चाहे गुस्से में हो या फिर दुखी लेकिन उन्हें लोगों का मन पढ़ना पुरुषों से बेहतर आता है)।
दिव्या ने पूछा सब ठीक है? सुबोध ने कहा बहुत हो गया था, नौकरी छोड़ दी मैंने, उसे पता था इस नौकरी की कितनी जरूरत थी उसे इस समय लेकिन अगर उसने छोड़ देने का फैसला लिया तो ये भी पता होगा कि कितनी समस्याएं भी है उससे।
लाख दुखों का पहाड़ टूट पड़े पर यदि इंसान का जीवनसाथी उससे कहे कोई बात नहीं हम मिलकर देख लेंगे, तुमको दिक्कत थी छोड़ दिया बात खतम ऐसे समय पर उसे जो विश्वास मिलता उससे वह महसूस करता है समय आने पर दुनिया की कोई भी जंग जीत लेगा। हालात को समझते हुए क्यों? थोड़ा सोच लेते के सवालों में उलझने के बजाए दिव्या ने आगे बढ़ने पर जोर दिया। सुबोध खाने के मूड में नहीं था ऐसे में किसे ही भोजन परवाह होगी पर बुरी से बुरी हालत में भी चाय के लिए कम ही मना करता था, दिव्या ने बोला खाना नहीं खाना तो चाय ही पी लो कपड़े बदलो मैं आती हूं।
दिव्या वापस दो कप चाय के साथ लौटी (ऐसे में सुबोध चाय के साथ सिगरेट भी पीना चाहता था वो कभी कभी ही पीता था लेकिन घर पर कभी नहीं) विचारों के समर में डूबे इंसान को प्रेम से बाहर निकाला जा सकता है बातों के क्रम में अपने व्यक्तिगत जीवन को और गहनता प्रदान करते हुए एक दूसरे की अश्रुधाराओं के साथ एक दूसरे में समाहित हो गए।
पुरुष कितना भी टूटा हो अपनी पसंदीदा स्त्री की बाहों में होने के बाद सब भूल जाता है और वहां रहते हुए दुनिया जीत लेना उसके लिए आसान नजर आता है। इन सबके बीच नीचे सरकते हुए सुबोध दिव्या की गोद में सो गया। सुबोध के बालों में हाथ फेरते हुए दिव्या भी कुछ सोचने लगी थी।
भाग दो:-
सब कुछ पास हो तो साथ होने की जिम्मेदारी कम समझ आती है पर अगर अचानक से जब सब कुछ छूटने लगे तो फिर साथ होने की जिम्मेदारी का एहसास होने लगता है यही सोचते सोचते दिव्या को कब नींद आ गई पता नहीं चला। सुबह उठकर दीवार पर टंगी घड़ी को देखा सुबोध अभी तक सो रहा है ऑफिस के लेट हो रहा है जैसे उसने जगाने के लिए उसके सर पर हाथ फेरा उसके शरीर में एक कंपन सा उत्पन्न हो गया, इन सबके बीच सुबोध की आंख खुल गई थी इतने में दिव्या ने अपने विचारों को परिवर्तित करते हुए बोला उठो चाय पी लो मैं बना कर लाती हूं।।
दिव्या ने शादी के बाद आगे की पढ़ाई को जारी रखा था, उसे क्रिएटिव काम बहुत पसन्द थे जैसे पेंटिंग करना, कुछ लिखना वैसे भी वह पीएचडी करना चाहती थी संभवतः इस साल उसे कहीं दाखिला लेना भी था। सुबोध ने सोचा भी यही था कि मैं ऑफिस और तुम पढ़ाई दोनों साथ रहकर उसी शहर में कर लेंगे।
ऐसा नहीं है कि घर के सारे काम पर एक मात्र अधिकार दिव्या का ही था, सुबोध सप्ताह की छुट्टी पर जब पहले की तरह वादा करने के बाद उसको बाहर घुमाने या फिल्म दिखाने नहीं ले जा पाता था तो दिव्या के लिए उसके मनपसंद का खाना बनाता था फिर दोनों टेबल पर बैठकर लैपटॉप में कुछ देखते हुए या फिर किसी विषय पर बात करते हुए खाना खाते थे।
दिव्या को सुबोध से शिकायतें भी थी पर जब सुबोध व्यस्त समय के बीच कुछ न कुछ उसके लिए बिना बताए करता था तो वो सब भूल जाती थी, पिछले ही महीने दिव्या ने शादी बाद अपना पहला जन्मदिन मनाया था, जन्मदिन सप्ताह के वीक डेज में था तो दोनों की सहमति से कुछ खास करने की बातों को छुट्टी के दिन लिए टाल दिया गया था।
बदकिस्मती कहें या प्राकृतिक प्रक्रिया दिव्या का जन्मदिन इस बार उसके पीरियड्स साइकल के बीच में पड़ा, सुबोध की एक खास बात थी कि वो अंतर्मुखी या अपने जीवन संघर्षों में कितना भी व्यस्त क्यों न हो वह दिव्या की हर छोटी छोटी बातों का ध्यान रखता था। रात में एक सिर्फ पेस्ट्री खिलाकर बर्थडे की शुभकामनाएं देते हुए दोनों सो गए थे।
सुबह का चाय, नाश्ता उस दिन सुबोध ने खुद बनाया, लाख मना करने के बाद दिव्या किचेन में साथ ही थी, स्त्री संसार की ईश्वर द्वारा निर्मित सबसे खूबसूरत क्रिएशन है बशर्ते उसे ठीक तरह से समझ लिया जाए। जाते जाते सुबोध ने बोला कोशिश करूंगा कि आज मैं घर जल्दी आ जाऊं, तुम एक काम करना दोपहर का खाना बाहर से खा लेना।
दिव्या को सुबोध के साथ शहर आए अभी कुछेक दो तीन महीने ही हुए थे इसके पहले वो शादी बाद अपने घर या ससुराल वाले शहर में ही थी। धीरे धीरे सुबोध अपने काम और व्यक्तिगत जीवन के बीच सामंजस्य बनाने का प्रयास कर रहा था, पर निजी कंपनियों के मालिकों को लोगों का सुकून कहां ही पसंद होता है इंसान किसी अस्पताल के बेड पर भी लेटा हो तो उससे मिलकर पहले तो Get well Soon तो बोलेंगे लेकिन लौटते हुए उसे ये बता आयेंगे कि You are still on the way, Finish it Soon, You know We are already too late for the Deployment.
भाग तीन
ख़ैर ऑफिस पहुंचने के पहले रात में ही सुबोध ने अपनी पत्नी के खास दिन के लिए कुछ सरप्राईज के बारे में सोच रखा था उसे पता था वो दूर रहेगा ऐसे में उसने आज के लिए अपना दिल और दिमाग़ घर पर छोड़ जाने लिए सोचा।
जाने से पहले रात में स्टडी रूम में जाकर उसने ऑनलाइन मंगाई सादे लेटर्स में से कुछ पर उसके लिए कुछ अपनेपन के शब्द लिखे और साथ में बाकी पन्नो के माध्यम से पूरे दिन की दिनचर्या को प्लान किया था और उन पन्नों को अलग अलग जगह रखकर कुछ घंटों के समयांतराल पर फोन पर बता बता कर सरप्राइस देने का प्लान किया।
स्टडी टेबल के अलग अलग दराज में सुबोध ने अलग अलग पन्नों को रखा हुआ था, ऑफिस पहुंचने के तुरंत बाद सुबह के 10:00 बजे के आसपास दिव्या को कॉल किया और स्टडी रूम में जाने के लिए बोला, पहले तो झुंझलाहट में दिव्या बोली तुम खुद की चीजों पर भी ध्यान नहीं हमेशा जल्दी में रहते हो पर फिर उसके प्यार से आग्रह करने पर की वह ऑफिस से संबंधित कुछ जरूरी कागज वहीं भूल गया है कृपया वह उसे फोन पर भेज दे।
थोड़ी देर के लिए इंसान भले ही गुस्से या झुंझलाहट में क्यों न हो किंतु प्यार और अपनेपन में इन क्षणिक चीजों को जल्दी भूल जाता है, दिव्या ने जब रूम में जाकर दराज खोला तो उसे गुलाब के छोटे गुलदस्ते के साथ एक पत्र हाथ लगा, पहले तो एकदम अचंभित हो उठी ऊपर की एक लाइनों पर उसकी निगाह जाने से उसे अनुमान हो गया था फिर भी उसने सुबोध को जब फोन किया और पूछा तो उसने सिर्फ़ इतना जवाब दिया कि तुम्हारे लिए किचेन में मैं थोड़ी सी चाय बचाकर आया हूं उसे गर्म करके इस पत्र को बालकनी में रखे गमलों के बीच जाकर पढ़ो, जिसमें उगे उन नन्हें पौधों के सृजनकार हम दोनों हैं और जहां हमें उनके साथ एक दूसरे की ख़ुशबू भी आती है।
सुबोध के ऑफिस जाने के बाद दिव्या आलस वश जाकर बेडरूम में लेट गई थी और वहीं उसकी आंख भी लग गई थी कुछ घंटों बाद जब फोन की आवाज बजी तब वह उठी थी। पत्र मिलने के बाद जैसा उसमें लिखा था उसका पालन तो उसे करना ही था, दिव्या के लिए इस तरीके का शायद पहला अनुभव था दोनों की शादी को 1 साल होने वाले थे किंतु दोनों एक दूसरे को लगभग 2 साल से जान रहे थे, क्योंकि विवाह पारिवारिक माध्यमों से हुआ था इसलिए शादी के पहले बहुत सहजता हर चीज को लेकर दोनों में नहीं बन पाई थी बस कुछ मुलाकातों और बातों का सिलसिला ही ज्यादातर चला था। शादी के बाद हनीमून के लिए बड़ी मुश्किल से समय निकालकर दोनों भारत के दूसरे कोने एक आईलैंड गए थे, दुनिया भर के थकान और तमाम व्यस्ताओं के बीच मुश्किल से दो-चार दिन पूर्णरूप से उन्होंने एक दूसरे के साथ गुजारे थे, वहां से लौटने के कुछ दिन बाद दिव्या अपनी मायके चली गई थी और सुबोध वापस अपने ऑफिस के लिए नए शहर।
शादी के पहले वाले जन्मदिन यानी पिछले साल सुबोध ने अपनी शुभकामनाओं के साथ कुछ उपहार भेजा था लेकिन इस बार का यह अनुभव उसके लिए जितना सुखद, सुकून भरा था उतना ही आश्चर्यचकित करने वाला भी, जब किसी से ज्यादा उम्मीद न हो और वो अचानक से उम्मीदों की कल्पना शीलता को भी लांघ जाएं तो फिर उन भौतिक चीजों का मूल्य ही ख़त्म हो जाता है जो सबसे खास और आकर्षक बन जाता है उस व्यक्ति के द्वारा किए गए सारे प्रयत्न और कुछ प्रेम के शब्द।
सुबोध ने पत्र कुछ इस प्रकार लिखने का प्रयास किया था कि दिव्या को यह एहसास हो कि इस पल में सुबोध उसके बगल वाली कुर्सी पर ही है। कई बार इंसान करीब रहकर भी दूर होता है और दूर रहकर भी बेहद करीब इतना करीब की उसकी शारीरिक अनुपलब्धता का ख़्याल ही नहीं रहता उसके शब्द कानों में गूंजते रहते हैं और उसकी सांसे अंतरात्मा को छूती रहती हैं बस फ़र्क सिर्फ़ इस बात का होता है कि किसको क्या महसूस कराया जा रहा है।
Dear Divya!
माफ़ करना इस समय मैं तुम्हारे पास शारीरिक रूप से नहीं हूं लेकिन मेरे शब्द, मेरे एहसास, मेरी भावनाएं सब कुछ मैं उन्हीं सिलवटों के बीच छोड़ कर आया हूं, आज मैं उस आलिंगन से मुक्त ही नहीं होना चाहता था, मैंने सोचा था अपने हाथों से चाय और सैंडविच बनाने के बाद मैं तुम्हारे बालों को भी संवार दूंगा तुम कहती तो चोटी नहीं तो जूड़ा भी मैं ही लगाता, मुझे पता है दो दिन से तुमने बाल भी नहीं धोए हैं। तुम्हारी नाराजगी जायज है, आज मुझे तुम्हारे साथ वहीं तुम्हारे बगल होना चाहिए था। हमारी शादी को 1 साल होने वाले हैं और मुझे पता है कि जितना समय मुझे तुम्हें देना चाहिए उतना मैं शायद अभी नहीं दे नहीं पाता। हां पर अपनी तरफ से कोशिश पूरी करता हूं। मैं हर दिन तुम्हारे साथ रहते हुए एक व्यक्ति के तौर पर शांत और सहज होता जा रहा हूं, इन भयंकर निराशा के विकराल में तुम्हारी गोद समुद्र का वह किनारा है जहां लहरें आकर शांत हो जाती हैं और दुनिया के सारे दुखों को मैं तुम्हारी बाहों में आने के बाद भूल जाता हूं, तुम्हारे कंधे मेरे लिए अतिरिक्त भुजाओं की तरह हैं, हमारे जीवन के यात्रा की यह महज शुरूआत है और यह यात्रा जीवन पर्यंत चलने वाली है, अंत में तुमसे यही कहना चाहूंगा यह डगर चाहे कितनी भी अच्छी या बुरी क्यों ना हो मैं ना तुमसे आगे ना पीछे बल्कि तुम्हारे साथ तुम्हारे बगल तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेते हुए यूं ही चलता रहूंगा।
तुम्हारा शुभ!
सुबोध एक संवेदनशील और अच्छे व्यक्तित्व का इंसान है इस बात का अंदाजा दिव्या को शुरू से था, बचपन में पिता को खो देने के बाद उसके ऊपर जिम्मेदारियां का बोझ जल्दी आ गया और अन्य पारिवारिक झंझावाते निश्चित रूप से शोभन के जीवन को प्रभावित करती रहती हैं। दिव्या को इन पहलू से कोई शिकायत नहीं थी, सबको साथ लेकर चलना तो व्यक्ति के व्यक्तित्व को ही झलकाता है।
किंतु आज इस अप्रत्याशित व्यवहार से अपनेपन की जिस भावना का प्रमाण सुबोध ने दिया था वह शायद दिव्या के कल्पनाओं से परे था यह सब सोचते हुए उसके आंख से आंसुओं की धारा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह इस समय बस सुबोध को गले लगाकर बच्चें की तरह उसकी भुजाओं के बीच कुछ समय के लिए समा जाना चाहती थी। इतने में सहसा उसके फोन की घंटी फिर बजी वह भागकर फोन के पास पहुंची तो देखा सुबोध का ही दोबारा फोन आया था और पूछने पर कुछ खाया पिया या नहीं के साथ अन्य सवालों के जवाब में अपने अश्रुओं पर थोड़ा लगाम देते हुए दिव्या सिर्फ थैंक यू सो मच फॉर एवरीथिंग ही बोल पाई थी बाकी बातों को मुलाक़ात तक टाल देना उचित समझा।
इससे पहले की बात खत्म होती सुबोध ने फिर से टेबल के दूसरे दराज को खोलने को कहा, दूसरा दराज थोड़ा बड़ा था इसलिए बचे सारे पन्नों के साथ कुछ चीजों को सुबोध ने एक साथ रख दिया था, पहले बार की तुलना में दिव्या के चेहरे पर अबकी आशा की एक किरण दिखाई दे रही थी जहां उसे एक पन्ने पर फ्रिज में उसके पसन्द की रखी ढ़ेर सारी चॉकलेट की सूचना, बेडरूम के दराज में वॉर्म हीटिंग pad की लोकेशन मिली तो आखिरी और अंतिम पन्ने पर लिखा था उसका लंच उस तक कितने बजे पहुंचेगा की भी के सूचनाएं उपलब्ध थी।
इन सब चीजों को देखते हुए दिव्या स्तब्ध थी और उसके आंख में अश्रु, दिव्या अपने सारे दर्द भूल चुकी थी और उसका ध्यान अब दीवार पर टंगी सिर्फ़ उस घड़ी पर था जहां वह सुबोध के आने का इंतज़ार कर रही थी….और यह इंतजार ऐसा था जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।।।
यह उपन्यास भारतीय मध्यम वर्ग के जीवन की सादगी और संवेदनशीलता को दर्शाता है, जिसमें कल्पना और यथार्थ के सुंदर मिश्रण से जादुई यथार्थवाद के रूप में भावनाओं को उकेरा गया है।
पूरी कहानी रघुवर प्रसाद और सोनसी जो कि एक नवविवाहित जोड़े हैं, साधारण जीवन के असाधारण सौंदर्य को प्रस्तुत करने का काम लेखक ने किया है, जीवन की छोटी-छोटी चीजें, जैसे एक खिड़की, छोटा सा घर और उसके सामान कितने गहरे अर्थ लिए हो सकते हैं। रघुवर प्रसाद, एक गणित शिक्षक, और उनकी पत्नी सोनसी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक छोटे शहर में एक किराए के कमरे में रहते हैं। उनकी खिड़की के अंदर उनका सामान्य जीवन है तो खिड़की के बाहर उनकी जादुई दुनिया, जिसमें नदियां, तालाब, पक्षी और एक बूढ़ी औरत शामिल हैं। यह जादुई दुनिया केवल उन्हें दिखाई देती है और उनके लिए एक सपनों की तरह है, जिसमें यथार्थ और कल्पना का ऐसा मिश्रण है कि जो उनके साधारण से जीवन में एक नई मिठास भर देती है।
उपन्यास के मुख्य कथानक में वैवाहिक जीवन, प्रेम और एक दूसरे से प्रति समर्पण की उच्चतम अवस्था, प्रकृति के प्रति प्रेम, कर्तव्य, और साधारण चीजों में खुशी व सुकून ढूंढकर उसमें लीन हो जाने की प्रवृत्ति शामिल हैं। यह जादुई यथार्थवाद की शैली में लिखा गया है जो गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ के कार्यों से तुलना की जाती है, लेकिन यह अपनी सादगी और काव्यात्मक भाषा के माध्यम से एक विशिष्ट पहचान बनाता है।
भाषा अक्सर सपनों जैसी है, जहां पात्र एक बात कहते हैं लेकिन दूसरी समझते हैं जो उपन्यास को एक अलौकिक वातावरण प्रदान करता है। पाठक को कई जगह कुछ चीजें समझने में भले तकलीफ़ हो किंतु कसावट, रहस्यात्मकता और रोमांस से जो उसको सुखद अनुभूति होती है उससे वो भी उनके साथ साथ उसी जादुई दुनिया में प्रवेश कर उनकी कहानी के समानांतर अपनी कहानी का भी प्लॉट बुनने लगता है।
खिड़की एक गहरा प्रतीकात्मक तत्व है। यह मुख्य रूप से आशा, स्वतंत्रता, और नई संभावनाओं का प्रतीक तो है ही साथ ही खिड़की उस बंद दीवार में एक रास्ता या दृष्टिकोण प्रदान करती है जो बाहरी दुनिया से जुड़ने, सपनों को देखने, और सामाजिक बंधनों से परे सोचने का माध्यम बनती है।
मानव जीवन की आकांक्षाओं, सीमाओं, और संवेदनाओं का एक अद्भुत समावेश और एक दार्शनिक चित्रण के रूप में लिखित उपन्यास निश्चित रूप से साधारण लोगों की एक असाधारण कहानी है।
जीवन में वैसे तो महत्वाकांक्षाओ का कोई अंत नहीं है, संघर्ष/किस्मत का आलाप करने के बजाय सीमित साधन, सामंजस्य और आत्मीय प्रेम के अद्भुत सम्मिश्रण से जीवन को कैसे न सिर्फ जीवंत बनाया जा सकता है बल्कि कैसे जिया जा सकता है। इसका बेहतरीन चित्रण प्रस्तुत किया गया है।
आजकल हर कोई सिर्फ अपनी बात कहना चाहता है, कोई किसी को सुनना नहीं चाहता।
अगर सुनने का प्रयास भी करता है तो बस सुनकर टाल देना चाहता है। ज्यादातर मामलों में ऐसा ही देखा जाता है।
रिश्तो के बीच सहजता और संवेदनशीलता धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है, ऐसे में लोग एकाकीपन के शिकार हो रहे हैं, उनके जीवन में खुशियां भी कम हो रही है और अवसाद भी बढ़ता जा रहा है।
भागते दौड़ते जीवन के बीच व्यक्ति को अपने सार्वजनिक जीवन के विभिन्न आयामों यानि नौकरी पेशा, पढ़ाई या अन्य व्यवसाय के साथ व्यक्तिगत जीवन के बीच सामंजस्य बैठाना ही होगा। सुख दुख जीवन का हिस्सा है अगर सुख में अत्यधिक चढ़ाव और दुख में अत्यधिक गिरावट आई तो आपकी ऊर्जा और उत्पादकता दिन ब दिन कम होती जाएगी।
ध्यान रखिए, जीवन में आपके अपने सच्चे लोग जो सच में आपके सुख दुख में साथ रहते हैं वो कठिन समय में सहारा देते हैं तो अच्छे समय में आपका आंकलन करने में मदद।
इसलिए कुछ चुनिंदा अच्छे लोगों की संगति में जरूर रहिए, जहां सुकून हो, हंसी हो और आपका बचपन भी जिंदा रहे।
साथ ही साथ यह जीवन जीने के लिए मिला है उसे किसी प्रकार से नष्ट करने के लिए नहीं।
हर व्यक्ति की अपनी क्षमताएं और प्रतिभाएं अलग-अलग होती हैं आपको यह पहचानना होगा कि आप किस काम के लिए बने हैं और किस कार्य को करते हुए आप अपना शत प्रतिशत दे रहे हैं और उससे आपको खुशी मिल रही है।
जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलिए और बिना किसी से तुलना किए हुए खुद को बेहतर बनाने का प्रयास करते रहिए।
जीवन शायद कुछ और नहीं बल्कि अकेलेपन से एकांत तक की यात्रा को कहा जा सकता है। लेकिन अकेलेपन के आलिंगन का सौभाग्य भी सबको कहां नसीब होता है ?
जीवन में कई बार बहुतों के होने से आपके आंखों में चमक जिंदा होती है पर वहीं वक्त के करवट लेते ही वही लोग फिर आपके तमस भरे जीवन में माचिस की एक लौ भी जलाने में सक्षम नहीं होते।
अंत में आपको अपने जीवन का दीपक स्वयं ही बनना पड़ता है और सही/गलत का मूल्यांकन करते हुए नए रास्ते अपनाने पड़ते हैं।
यह ध्यान रखना कि आप किस दौर से गुज़रे हैं, कैसे इसने आपकी मानसिकता को समय समय पर मज़बूत किया यह आपको नकारात्मक मस्तिष्क चक्र से बाहर निकाल सकता है और आपको उन कमज़ोर, एक-सेकंड के आवेगों को दरकिनार करने में मदद कर सकता है।
भले ही आप अभी जीवन से निराश और पराजित महसूस कर रहे हों। मैं कह सकता हूं कि आप एक या दो बार ऐसे समय के बारे में सोच सकते हैं जब आपने बाधाओं को पार किया फ़िर चाहे वह छोटी बाधाएं क्यों ही न रही हो। ऐसे में बड़ी बाधाओं से निकलने का मार्ग यहीं से प्रशस्त होगा।
जीवन की वास्तविक समझ के साथ आपको यह पता चलता है कि असल में आपकी प्रतिस्पर्धा किसी और या बाहरी परिवेश से नहीं बल्कि आपके स्वयं से है।
जब आपके दिमाग में कुछ होता है तो आप उसे महत्वाकांक्षा कहते हैं- यह सिर्फ़ एक विचार की शुरुआत है और फिर आप अपनी सारी जीवन ऊर्जा उसमें लगा देते हैं, इस हद तक कि वह विचार आपका जीवन बन जाता है।
मेरा विश्वास करें, ऐसा कोई विचार नहीं है जिसके लिए आप अपना पूरा जीवन लगा दें और ऐसा कोई विचार नहीं है जो मूल रूप से घटित हो- ऐसा इसलिए है क्योंकि आपके जीवन की शुरुआत से ही शिक्षक और माता-पिता बच्चों को नंबर एक बनने की ओर निर्देशित करते हैं और यह नंबर एक धीरे-धीरे महत्वाकांक्षा में बदल जाता है, यह अलग-अलग रूप ले सकता है लेकिन मूल रूप से यह महत्वाकांक्षा के ढांचे के भीतर नंबर एक ही रहेगा।
लेकिन शायद लोग महत्वाकांक्षी इसलिए होते हैं क्योंकि उन्हें सफल होने के लिए खुद को आगे बढ़ाने का कोई दूसरा तरीका नहीं पता होता। मैं लक्ष्य निर्धारित किए बिना खुद को सफल होने के लिए कैसे आगे बढ़ा सकता हूँ? यह मूल प्रश्न है कि महत्वाकांक्षा सही है या गलत? यह न तो सही है और न ही गलत: क्योंकि आपकी महत्वाकांक्षा बहुत सीमित है: क्योंकि अब आप जो कुछ भी जानते हैं, उसे दस से गुणा करने पर ही आपकी महत्वाकांक्षा है। और अगर आप बहुत बहादुर हैं तो आप इसे सौ से गुणा कर देंगे। या अगर आप थोड़े लापरवाह हैं तो आप इसे लाखों से गुणा कर देंगे। लेकिन यह सब सिर्फ़ उसी का विस्तार है जो आप पहले से जानते हैं क्योंकि आप किसी ऐसी चीज़ के लिए महत्वाकांक्षा नहीं रख सकते जिसे आप पक्के तौर पर नहीं जानते।
मानव जीवन में नई संभावनाओं के प्रकट होने के लिए और सबसे बढ़कर मनुष्य की प्रतिभा को उजागर करने के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम एक महत्वाकांक्षी दुनिया न बनाएँ, बल्कि एक आनंदमय और सभी चीज़ों की अंतर्निहित दुनिया बनाएँ क्योंकि अगर आप अपनी क्षमताओं के अनुसार जो भी करते हैं उसमें बहुत खुश और पूरी तरह से लगे हुए हैं, तो आप उस सीमा तक पहुँच जाएँगे जहाँ तक आपकी क्षमताएँ आपको पहुँचने देती हैं।
आपका पूरा काम अपनी क्षमताओं को लगातार बेहतर बनाने पर केंद्रित है ताकि आप अपनी गतिविधि के हर पल में अपनी ऊर्जा का अधिकतम उपयोग कर सकें, चाहे आप कुछ भी करें। भले ही आप कुछ भी तय न करें, लेकिन अपनी क्षमताओं के साथ हर समय अधिकतम गति बनाए रखें और देखते रहे कि आप कहाँ जाते हैं।
कौन जानता है आप कहाँ जाएँगे? आप उन जगहों पर जा सकते हैं जिनकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की थी, लेकिन अगर आपने जो सोचा था वो हो जाए, तो क्या ख़राब ज़िंदगी होगी। इसलिए खुद को महत्वाकांक्षा तक सीमित न रखें क्योंकि मनुष्य के पास असीम संभावनाएँ हैं और जीवन उस संभावना को तलाशने के बारे में है।