स्थान- पुरानी दिल्ली मुखर्जीनगर,
मुखर्जी नगर की वास्तिवकता से अवगत तो नहीं हूँ, किन्तु इस किताब ने 180 पेज पढ़ने तक वहाँ की ज़िन्दगी को वही की गलियों से मानो जीवन्त दर्शन कराया हो।
कहानी का सार कुछ यूं रहा कि देश के कोने कोने से निकल अपने ख़्वाबों को साकार करने उसी वजीराबाद, नेहरूविहार, इन्द्रविहार के छोटे से कमरे में कैद होकर इतिहास रचने का बेड़ा और आँखों में लाल बत्ती का सपना लिए अपना डेरा जमाया।
कुछ सांसारिक मोहमाया का शिकार भी हुए यानि दिल्ली की हवा उन्हें भी लगी और बत्रा चौराहे पर सिगरेट के धुएं से दुनिया और देश का नक्सा की कला के साथ संजीवनी बूटी समझ कुछ ने बोतले भी तोड़ी तो वही कुछ को गांव में बाबू जी के कर्ज़ लिए पैसे और कुछ को माँ द्वारा बेच दी जमीनों ने उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति उत्साहित बनाये रखा।
इन्हीं सबके साथ समय बीतता गया, कुछ पीटी निकाल, मेन्स तक पहुँचकर, आखिरी लड़ाई में लटक गए तो कुछ पहले ही। लेकिन उनमें एक बार और उठकर चल देने का जज्बा भी था और ख़ुद पर भरोसा भी।
शायद इसलिए कहा भी गया है,
सिविल सेवा की तैयारी करने वाले से ज्यादा भयंकर आशावादी मानव का संसार मे कही भी मिलना मुश्किल है।
अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा के बीच बढ़ते द्वंद ने आपसी तकरारें बढ़ाई और कई लोगों से फॉर्म में हिंदी भाषा माध्यम चुनवाकर भी उन्हें अंग्रेज़ी में सवाल पूछकर बाहर कर दिया गया था, क्या उनके ज्ञान का मूल्यांकन सिर्फ़ भाषा से ही करना उचित था आज भी अंग्रेज़ी और हिंदी के बीच ऐसी न जाने कैसी अवधरणा बनी हुई है, अंग्रेज़ी वाला ज्यादा ज्ञानी और हिंदी वाला कम।
ख़ैर इन्हीं सबके साथ वो लक्ष्मण रेखा भी आई जब कइयों को वापस अपने सपनो को उन्हीं बोरो और झोलों में कैदकर ले जाना था, कुछ ने तो एग्जाम पास कर मानो चाँद पर तिरंगा फहराया हो और कई लोगों ने इस सिविल के रेस से ही न जाने अलग मंजिल जैसे पत्रकारिता, स्टेट सर्विसेज या लेखन या अन्य किसी सम्मानीय जगहों पर पहुँच चुके थे।
वही कुछ असफ़ल लोगों को अपने प्रयासों पर फ़क्र था और शायद उनकी ज़िंदगी में एक ठहराव भी, उन्हें कभी कभी लगा भी होगा कि उन्हें द्वारा लिए निर्णय ग़लत निकले लेकिन जीवन की वास्तविकता में हम जाने अनजाने में न जाने कितने निर्णय गलत लेते है, लेकिन वही निर्णय हमें गिरकर उठना सिखाते है और इस व्यवहारिक संसार में ज़िन्दगी को सादगीपूर्ण जीने का जो अनुभव देते है उसे हम कहीं और से नहीं पा सकते है। और इसलिए
दुनिया की न जाने कितनी बातें जान समझकर, आँख बंद कर दौड़ती भागती दुनिया में वो कई असफ़ल लोग उन अज्ञानी लोगों से कही ज्यादा सफ़ल और खुश थे।
शायद सही ही कहा गया है कि
ज़िन्दगी आदमी को दौड़ने के लिए कई रास्ते देती है, जरूरी नहीं कि सब एक ही रास्ते दौड़े।
जरूरत है कि कोई एक रास्ता चुन लो और उस ट्रैक पर दौड़ चलो, रुको नहीं दौड़ते रहो।
क्या पता तुम किस दौड़ के “डार्क हॉर्स” साबित हो जाओ।।

Leave a reply to Himanshu Ranjan Cancel reply