बिखरी डायरी

Expression of thoughts, Life Experiences, Book Reviews, Analysis and Most importantly a balance between personal life and professional life.



  • मुख्य पात्र निर्मला के जीवन के माध्यम से प्रेमचंद ने ‘द सेकेंड वाइफ’ में बाल विवाह, दहेज प्रथा और पितृसत्ता जैसी सामाजिक बुराइयों को उजागर किया है।

    स्वतंत्रता-पूर्व युग में लिखी डार्क फ्रिक्शन, द सेकेंड वाइफ, डेविड रुबिन द्वारा प्रेमचंद की निर्मला का अंग्रेजी अनुवाद है । प्रेमचंद ने यह उपन्यास तब लिखा जब हिंदी साहित्य और कविता में महिला पात्रों का बोलबाला था। मुख्य पात्र निर्मला के जीवन के माध्यम से, लेखक ने बाल विवाह, दहेज प्रथा, पितृसत्ता और बेतुके अंधविश्वासों जैसी सामाजिक बुराइयों के विषयों को दुखद घटनाओं की ओर ले जाने वाले विषयों को समेटा है। इसमें एक युवावस्था की कहानी भी है, जिसमें निर्मला अपने पिता की मृत्यु के बाद होने वाली भयावह घटनाओं के साथ तालमेल बिठाते हुए यथार्थवादी रूप से बदलती है।

    कहानी 15 वर्षीय निर्मला के बाल विवाह की तैयारियों से शुरू होती है। उसे विवाह योग्य आयु की माना जाता है। जिस लड़की ने अपनी गुड़िया और अपनी बहन कृष्णा की शादी एक सप्ताह पहले ही धूमधाम से की थी, वह खुद दुल्हन बनने जा रही थी, जिससे वह डरपोक और अकेली हो गई। यह रिश्ता काफी बातचीत के बाद तय हुआ और आखिरकार एक ऐसा परिवार मिला जिसने दहेज की मांग नहीं की।

    बाद में निर्मला के पिता उदयभानु की असामयिक मृत्यु के बाद दहेज की व्यवस्था न कर पाने के कारण यह रिश्ता टूट जाता है। हालाँकि दूल्हे के परिवार ने कभी भी सीधे तौर पर दहेज की माँग नहीं की थी, लेकिन वे उदयभानु से अच्छी रकम की उम्मीद कर रहे थे जो उनके निधन के बाद असंभव लगने लगा और यहीं से निर्मला का दुर्भाग्य शुरू हुआ।

    निर्मला अपने पिता की छत के नीचे रहती थी, अपना बचपन खो देती है क्योंकि उसकी शादी उस उम्र में तय हो जाती है जब उसे शादी की अवधारणा को समझने की ज़रूरत नहीं होती या नहीं होती। जब उसके पिता उसे सबसे अच्छे वर को नीलाम कर देते हैं जो कम दहेज मांगता है, तो वह विकल्प के अभाव में एकांत चुनती है। उदयभानु में गर्व की भावना है जो चिल्लाती है कि वह परिवार का मुखिया है जब वह कहता है कि परिवार के लिए कमाने वाला होने के नाते वह अपनी मर्जी से खर्च करेगा और कोई भी उसकी आलोचना नहीं कर सकता। यह तब होता है जब उसकी पत्नी कल्याणी उसे शादी के लिए अपने खर्चों पर नज़र रखने के लिए कहती है। 

    निर्मला के पति तोताराम मुंशी उनसे बीस साल बड़े थे और विधुर थे, जो उनके पिता की उम्र के थे, उनकी पहली शादी से तीन बेटे थे। उनका सबसे बड़ा बेटा मंशाराम निर्मला की उम्र का ही था। निर्मला की शादी उनकी मां ने तोताराम से कर दी थी, क्योंकि जिस व्यक्ति से उनकी सगाई हुई थी, भुवनमोहन सिन्हा ने रिश्ता तोड़ दिया था, क्योंकि उनके परिवार को बेहतर दहेज के साथ बेहतर रिश्ता मिल गया था। निर्मला मुंशीजी का अपने पिता की तरह ही सम्मान करती थीं, क्योंकि उन्हें दोनों में समानता मिली थी।

    उनका वैवाहिक जीवन निराशा से भरा था, उसे अपने पति से घृणा थी, जिसे वह कभी प्यार नहीं करती थी, लेकिन एक पत्नी और उसके बच्चों की नई माँ के रूप में अपने कर्तव्यों के कारण ही उसका पालन करती थी। जब उसे आखिरकार मंसाराम में सांत्वना मिलती है, तो मुंशीजी को उसके और मंसाराम के बीच एक अवैध संबंध पनपने का संदेह होता है। इसके परिणामस्वरूप उसने अपने बेटे को दूर भेज दिया और उसके बाद दुख के कारण उसकी मृत्यु हो गई और निर्मला ने घर में अपनी एकमात्र दोस्त को खो दिया। वह उसके साथ वह प्रेमपूर्ण जीवन पाने में विफल रहता है जिसकी उसने अपेक्षा की थी। इसके बजाय, वह अपने दो बेटों को खो देता है।

    सिन्हा ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने मंसाराम का मृत्युशैया पर इलाज किया था। इससे वे परिवार के और करीब आ गए और मंसाराम की मृत्यु के बाद भी सिन्हा अपनी पत्नी सुधा के साथ उनसे मिलने आते थे, जो अब निर्मला की विश्वासपात्र बन गई है। बाद में, यह पता चलता है कि भुवनमोहन सिन्हा वही व्यक्ति है जिसने दहेज के लिए निर्मला से अपनी शादी तोड़ दी थी। भुवनमोहन का उद्धारकर्ता परिसर तब सक्रिय होता है जब वह निर्मला की बहन की शादी अपने छोटे भाई से करवाने का प्रस्ताव रखता है ताकि निर्मला के साथ किए गए अन्याय को बदला जा सके।

    निर्मला की बहन कृष्णा जो उससे पाँच साल छोटी थी, निर्मला की शादी के समय सिर्फ़ एक बच्ची थी। जब कल्याणी निर्मला की टूटी हुई शादी से परेशान थी, तो कृष्णा ने ही उसे सांत्वना दी, हालाँकि वह अभी बच्ची ही थी। वह अपनी माँ से कहती है कि टूटी हुई शादी निर्मला के साथ होने वाले दुर्व्यवहार से बेहतर है, अगर उसने बिना दहेज के भुवनमोहन से शादी की होती। लेकिन अपनी शादी के लिए, वह अपने पति की पसंद के हिसाब से खुद को बदलने का फैसला करती है, जिससे निर्मला हैरान रह जाती है।

    सुधा एक क्रांतिकारी महिला पात्र है जो अपने लिए एक मजबूत रुख अपनाती है। वह वही है जिसने निर्मला को ऊपर उठाया और उसकी विश्वासपात्र बनी। हालाँकि, एक शिक्षित महिला होने के बावजूद, वह गाँव और कल्याणी के अंधविश्वासों में फंसकर अपने शिशु को खो देती है।

    पहले बच्चे मंसाराम की मृत्यु के बाद; चोरी के आत्मग्लानि में दूसरे बच्चे की भी मृत्यु हो जाती है और बाद में तीसरा बच्चा घर के काम धाम से तंग आकर कुछ बाबा के झांसे में आने के बाद उनके साथ हरिद्वार चला जाता है।

    अंत में बच्चों के वियोग में मुंशी जी अपने तीसरे बच्चे को खोजने के लिए अपने झोले बस्ते के साथ निकलते हैं और एक महीने बाद उसको किसी तरह लेकर वापस लौटते हैं किंतु तब तक पति के वियोग में निर्मला की मृत्यु हो जाती है और संयोग कहिए या दुर्भाग्य कि ठीक उसी सुबह मुंशी जी घर पहुंचते हैं जिस दिन निर्मला की चिता को आग देने वाला कोई नहीं था।

    यह पूरा उपन्यास दुखांत अंत के साथ यथार्थवादी दृष्टिकोण पर लिखा गया है।



  • रेत की मछली एक ऐसी कहानी है जो पाठक को मानवीय रिश्तों की जटिलता, विश्वासघात, और स्त्री की पीड़ा के गहरे अनुभवों से रूबरू कराती है। यह उपन्यास अपनी सादगी और भावनात्मक तीव्रता के कारण पाठकों को प्रभावित करता है, लेकिन इसे पढ़ना आसान नहीं है।

    रेत की मछली उपन्यास, कांता भारती द्वारा रचित, एक स्त्री के वैवाहिक जीवन के बाद की त्रासदियों और भावनात्मक संघर्षों की गहन कहानी है। यह उपन्यास उनके पूर्व पति धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध उपन्यास गुनाहों का देवता के जवाब में लिखा गया माना जाता है, जो उनके निजी जीवन के अनुभवों पर आधारित है।

    कहानी एक ऐसी महिला की है, जो अपने घर, परिवार के खिलाफ जाकर प्रेम विवाह करती है और उसके बाद ससुराल में सुखद भविष्य की कल्पना करती है। वह अपने नए जीवन में सुंदरता और प्रेम की आशा के साथ कदम रखती है, लेकिन उसका सपना धीरे-धीरे टूटने लगता है। उपन्यास का कथानक सामाजिक दुविधाओं, विश्वासघात और भावनात्मक दर्द के इर्द-गिर्द घूमता है। कहानी में एक जंगली बेल का बिंब प्रमुख है, जो नायिका के ससुराल में उगती है और उसकी सारी खुशियों को नष्ट कर देती है। यह बेल नायक की मुंहबोली बहन का प्रतीक मानी जाती है, जिसके साथ नायक का अनुचित संबंध दर्शाया गया है और जो नायिका के जीवन को पूरी तरह से तहस-नहस कर देता है।

    अगर रेत की मछली को गुनाहों का देवता के जवाब के रूप में देखा जाए तो गुनाहों का देवता में चंदर का चरित्र धर्मवीर भारती का आत्मचित्रण है, और सुधा उनकी पहली पत्नी कांता भारती का।
    रेत की मछली इस कहानी को कांता भारती के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है, जिसमें चंदर की कमजोरियों और दोगले चरित्र को उजागर किया गया है।

    कहानी के आधार पर कई समीक्षकों का मानना भी है कि यदि रेत की मछली में 10% भी सत्यता है, तो यह धर्मवीर भारती की छवि पर एक गंभीर सवाल उठाता है।

    यह कहानी स्त्री-विमर्श का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जो प्रेम, विश्वासघात और सामाजिक बंधनों के बीच एक महिला की पीड़ा को उजागर करता है। यह पाठकों को गहरी चिंता, अकेलापन और असहनीय भावनात्मक तनाव का अहसास कराता है।
    रेत की मछली न केवल कांता भारती के निजी अनुभवों की अभिव्यक्ति है, बल्कि यह गुनाहों का देवता के चरित्र चंदर के आदर्शवादी चित्रण के दूसरे पहलू को भी सामने लाता है। यह उपन्यास पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि प्रेम और विवाह के पीछे की वास्तविकता कितनी जटिल और दर्दनाक हो सकती है।

    वैसे तो चाहे पुरुष हो या महिला उसके कई चेहरे हो सकते हैं उसका वास्तविक चेहरा क्या है यह अनुमान लगा पाना मुश्किल है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस समाज में पुरुष होने के बहुत नाजायज फायदे रहे हैं/हैं ठीक उसी स्थिति में होने पर समाज का नज़रिया पुरुष और स्त्री के अनुसार बदल जाता है।

    अंत में निदा फ़ाज़ली के एक शेर के साथ अपनी बात ख़त्म करूंगा कि:

    हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
    जिसको भी देखना कई बार देखना।

  • इस दुनिया में सबसे बड़ा धन स्वास्थ्य धन है यदि आप स्वयं और आपके माता पिता के साथ अन्य परिवार के सदस्य पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं तो यक़ीनन आप धनी है।

    जितने भी लोग अपने जीवन के दूसरे चरण यानी 25-35 वर्ष के बीच हैं कोई अध्ययनरत होगा, कोई नौकरी की तलाश में, तो कोई नौकरी में लेकिन इन सबके बीच कैसे भी करके आपको स्वयं के साथ अपने लोगों खासकर मां बाप के स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा।

    आपके संघर्ष /कठिन समय को देखते हुए कई बार मां बाप आपको बहुत चीजें बताते ही नहीं हैं लेकिन उम्र की इस अवस्था में आपको परिपक्वता दिखानी होगी और अब आपको उनके स्वास्थ्य संबंधित जानकारी पूरी डिटेल्स में रखनी होगी वो बताएं या नहीं फिर आप उनको अपने पास रखें, किसी और को उनके पास रखें या फिर ख़ुद ही कुछ भी करके बराबर सब अपडेट आप लेते रहे।

    सामंजस्य आपको बनाना ही होगा, दुनिया न कभी रुकी है न रुकेगी नौकरी, पैसा, सफ़लता सबका प्रयास करिए लेकिन मां बाप और स्वयं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखने के साथ।

    दुनिया में सब कुछ आगे पीछे, कम ज्यादा हासिल हो सकता है लेकिन यदि इसकी ट्रेन एक बार छूटी तो कभी पकड़ने का मौका नहीं मिलेगा और रह जाएगा हाथ में सिर्फ़ मलाल।

    उम्र के इस पड़ाव पर यदि मां बाप या किसी और अजीज को आप खो देते हैं तो फिर उसके बाद जीवन में सफलता असफलता का क्या मूल्य बचता है मुझे नहीं पता।

    मुझे ऐसा लगता है व्यक्ति के जीवन की बुनियाद रिश्तों और मानवीय गुणों पर ही टिकी होती है, बाकी चीजें उसके लिए जीवन निर्वहन करने में सहायक मात्र होती हैं।

  • मां के जाने के बाद बहुत शिद्दत से मैंने इस कमरे को संवारा था; कई महीनों के बाद अनगिनत यादों, विचारों और अंतर्द्वंदों को छोड़कर प्रयागराज कुछ ही दिनों पहले फ़िर से आया हूं लेकिन ये कमरा दिल और दिमाग़ में हमेशा के लिए बस चुका है।

    मैं जब भी
    ज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तप कर
    मैं जब भी
    दूसरों के और अपने झूट से थक कर
    मैं सब से लड़के ख़ुद से हार के
    जब भी उस एक कमरे में जाता था।
    वो हल्के और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरा
    वो बेहद मेहरबाँ कमरा
    जो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता था
    जैसे कोई माँ
    बच्चे को आँचल में छुपा ले
    प्यार से डाँटे
    ये क्या आदत है
    जलती दोपहर में मारे मारे घूमते हो तुम
    वो कमरा याद आता है
    दबीज़ और ख़ासा भारी
    कुछ ज़रा मुश्किल से खुलने वाला वो शीशम का दरवाज़ा
    कि जैसे कोई अक्खड़ बाप
    अपने खुरदुरे सीने में
    शफ़क़त के समुंदर को छुपाए हो
    वो कुर्सी
    और उस के साथ वो जुड़वाँ बहन उस की
    वो दोनों
    दोस्त थीं मेरी
    वो इक गुस्ताख़ मुँह-फट आईना
    जो दिल का अच्छा था
    वो बे-हँगम सी अलमारी
    जो कोने में खड़ी
    इक बूढ़ी अन्ना की तरह
    आईने को तंबीह करती थी
    वो इक गुल-दान
    नन्हा सा
    बहुत शैतान
    उन दिनों पे हँसता था
    दरीचा
    या ज़ेहानत से भरी इक मुस्कुराहट
    और दरीचे पर झुकी वो बेल
    कोई सब्ज़ सरगोशी
    किताबें
    ताक़ में और शेल्फ़ पर
    संजीदा उस्तानी बनी बैठीं
    मगर सब मुंतज़िर इस बात की
    मैं उन से कुछ पूछूँ
    सिरहाने
    नींद का साथी
    थकन का चारा-गर
    वो नर्म-दिल तकिया
    मैं जिस की गोद में सर रख के
    छत को देखता था
    छत की कड़ियों में
    न जाने कितने अफ़्सानों की कड़ियाँ थीं
    वो छोटी मेज़ पर
    और सामने दीवार पर
    आवेज़ां तस्वीरें
    मुझे अपनाइयत से और यक़ीं से देखती थीं
    मुस्कुराती थीं
    उन्हें शक भी नहीं था
    एक दिन
    मैं उन को ऐसे छोड़ जाऊँगा
    मैं इक दिन यूँ भी जाऊँगा
    कि फिर वापस न आऊँगा।

    © जावेद अख्तर।

  • मुझे यह कहना कभी नहीं आया कि मैं प्रेम करता हूं या नहीं।

    मैंने रखा बस उसकी छोटी छोटी चीजों का ध्यान
    ज़रूरत पड़ी तो चाय और मैगी भी बनाया
    ट्रेन लेट हुई तो बैठा उसके साथ घंटों सीढ़ियों पर।

    मोबाइल के दौर में लिखे मैंने उसके लिए खत, पर्चियां चिपकाकर किया भेंट किताबों को।

    गुस्सा करने पर समझाया नहीं बस सुना उसको
    जब आसूं आए तब बस आने दिया और होने दिया मन को हल्का,

    भीड़ भाड़ और सड़क पर चलते हुए बिना बताए गाड़ियों के साइड मैं खुद चला और उसको चलने दिया सुरक्षित अपने बाएं से।

    थीं कुछ शिकायतें भी लेकिन हंसने हंसाने के क्रम में टाल दिया,
    मिली नज़रें जब अचानक से तो फेर ली आंखे, हां देखा ज़रूर लेकिन घूरा नहीं कभी।

    लेकिन सच में, मुझे यह कहना कभी नहीं आया कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं या नहीं।

    ©Him


  • वैसे किसी मानवीय गुण या फिर एहसास को व्यक्त करने के लिए यदि आपको किसी खास दिन या खास पल की जरूरत पड़ रही है तो निश्चित रूप से उसमें कुछ ना कुछ कमी है लेकिन यदि किसी भावना या एहसास को प्रतीकात्मक रूप में किसी से तुलना या उसको व्यक्त करने के लिए किसी का सहारा लिया जाता है तो उसके पीछे कोई ना कोई कहानी होती है।

    The rose looks fair, but fairer we it deem For that sweet odour which doth in it live.”
    मतलब गुलाब सुंदर होते हैं, लेकिन इसे और सुंदर बनाती है, इसकी खुशबू जो इसका प्राकृतिक गुण भी है ।

    इसी तरह प्रेम भी बहुत खूबसूरत होता है लेकिन इसे और खूबसूरत बनाती है आपसी समझ और एक दूसरे पर विश्वास जो प्रेम का गुण है। अगर यह गुण प्रेम में विद्यमान है तो प्रेम भी गुलाब की तरह महक कर और खूबसूरत हो जाता है।
    यही नहीं, गुलाब के फूल में कांटे भी होते हैं। यह प्रेमियों को इशारे में बताते हैं कि प्रेम में भी कई दर्द होते हैं, चुभन होती है लेकिन दर्द और चुभन की परवाह करोगे तो प्रेम के सुंदर फूल से वंचित रह जाओगे ।

    गुलाब का फूल प्रेमियों को एक और चीज़ सिखाती है जैसे गुलाब को मसल कर फेंक दो, फिर भी खुशबू फेंकने वाले के हाथ में रह ही जाती है, प्रेम में भी अगर कोई एक जुदा हो जाय तब भी वो यादें संग रह ही जाती हैं।

    प्रेम और गुलाब एक दूसरे के पर्याय हैं। दोनों की कहानी एक सी है इसलिए शायद प्रेम के प्रतीक के रूप में गुलाब ही देते हैं।
    गुलाब रोमांस से जुड़ा फूल तो है ही साथ में लाल रंग भावुक प्रेम से जुड़ा है।

    गुलाब अपनी खूबसूरती में अद्भुत है, इसकी पंखुड़ियाँ मखमली मुलायम होती हैं और इसकी खुशबू सुखदायक और मनभावन, संभव है कि गुलाब वास्तव में इंद्रियों के लिए एक वास्तविक दावत है: दृश्य, स्पर्श और श्रवण [आमतौर पर दृष्टि, स्पर्श और ध्वनि की इंद्रियों के रूप में जाना जाता है।

    गुलाब की उपस्थिति पूर्णता की सीमा पर लगती है, प्रत्येक पंखुड़ी आकार में सममित प्रतीत होती है। क्या ऐसा ही नहीं होना चाहिए? किसी प्रियजन को किसी की इंद्रियों को प्रसन्न करना चाहिए और परिपूर्ण दिखना चाहिए। हालाँकि गुलाब का उपयोग करके तुलना में एक और आयाम जोड़ा गया है। गुलाब में कांटे हैं यह वह व्यापक छवि है जिसके माध्यम से संप्रेषित किया जा रहा है कि गुलाब विश्वासघाती हो सकते हैं। तो प्रेम भी विश्वासघाती हो सकता है रूपक हमें बताता है।

    जब कोई अपने स्नेह की वस्तु को छूने के लिए पूर्ण विश्वास के साथ आगे बढ़ता है तो आह, एक कांटा बहुत नुकसान पहुंचा सकता है! “सावधान रहो,” रूपक चेतावनी देता है: प्रेम इंद्रियों के लिए एक दावत है, लेकिन यह हमें अभिभूत कर सकता है, और यह हमें चोट भी पहुँचा सकता है। यह हमें चुभ सकता है और तीव्र पीड़ा का कारण बन सकता है। शायद ऐसी ही कुछ प्रेम की धारणा है – एक चेतावनी।

    © Him

    Note:- कुछ पंक्तियां स्वयं की हैं और कुछ अलग अलग जगह से उठाई है।

  • दोस्त होना एक जिम्मेदारी है!

    दोस्ती वह किरदार है जो जीवन के अन्य सभी रिश्तों को समय-समय पर निभाता है।

    मां की तरह निस्वार्थ होता है, पिता की तरह धवंस भी दिखाता है, बड़े भाई की तरह समझाता भी है और बहन की तरह पुचकारता भी है।

    पर एक दोस्त जब स्वयं के किरदार में होता है तो आपकी सारी कल्पनाओं से परे होकर वह आपके लिए एक ऐसी दुनिया बनाता है जहां ना कोई बंधन होता है, ना कोई सीमा होती है, ना कोई मर्यादा होती है, ना कोई डर होता है, ना कोई संकोच होता है और ना ही आपको बात बात पर कोई टोकने वाला होता है।

    वह आपको स्वीकारता है ठीक वैसे जैसे आप खुद की स्वीकार्यता को चाहते हैं।

    यदि कुछ अनुपात में कोई अपने मूल स्वरूप में बना रहता है तो कहीं ना कहीं सबसे अहम योगदान उसके दोस्तों का होता है। दोस्त परिवार का सिर्फ बढ़ता स्वरूप नहीं बल्कि कभी-कभी परिवार से भी बढ़कर हो जाता है।

    अपने निजी अनुभव से सभी को यही सलाह देना चाहूंगा कि किसी एक मात्र इंसान को अपनी पूरी दुनिया मत बनाइएगा।
    हर वक्त, हर समय बाकी सभी रिश्तों के साथ यार दोस्त साथ चाहिए ही चाहिए।

    ऐसी संख्या बहुत सीमित होती है अगर मैं तीन-चार भी कह दूं तो शायद अधिक हो जाएगी इसलिए भीड़ मत कमाइए, दोस्ती कमाइए।

    संबंधों को ऐसा निभाइए की कोई/कुछ लोग यह कह सके कि आप सच मायने में उनके दोस्त हैं।

    जैसे लोग कहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है ठीक वैसे ही दोस्ती की नहीं जाती हो जाती है।

    फिलहाल इस मामले में मैं बहुत खुशनसीब हूं मेरे पास दो-तीन ऐसे रत्न मौजूद हैं।

  • तुम आना मेरे पास, पूरा समय लेकर!

    मैं सिर्फ तुम्हें सुनूंगा ही नहीं बल्कि पूरा का पूरा जहन में उतार लूंगा।
    जिन खामोशियों से तुम्हें डर लगता है मेरे साथ वह तुम्हें अपनी लगने लगेंगी।
    रोने के लिए कंधा भी होगा, तुम्हारे खुद के सारे आंसू सूख न जाए इसके लिए मैं तुम्हें अपने आंसुओं से सहयोग दूंगा।

    अपना हुनर तुम उनको दिखाना जिन्हें कलाबाजी/कलाकारी सिर्फ़ देखने में पसंद है।
    मैं देखूंगा इस हंसने हंसाने के क्रम में खुद के मज़ाक बनाएं जाने की तमाम वजहों को।

    तुम आना पूरा समय लेकर,
    मैं तुम्हें ले चलूंगा समुद्र किनारे उस शांत लहरों के बीच जहां पत्थरों पर बैठे हम दोनों के साथ एक दूसरे की खामोशियां होंगी।

    ©Him

  • सच है कि जिन चीज़ों को व्यक्त करने के लिए इस मंच का चयन किया था उसका साहस कभी जुटा ही नहीं पाया लेकिन अब 2024 पर भी मिट्टी डालने का समय आ गया है।

    किसी संवेदना/सहारा जैसी किसी बात का कोई उद्देश्य नहीं बस मन/मस्तिष्क में बैठे तमाम अंतर्कलहों/विचारों को अंतिम रूप से व्यक्त करने का है।

    एक आखिरी खत
    पार्ट एक:-

    मैं इस साल को यूं ही खामोशी से गुजरते हुए देखना चाहता था लेकिन काफी जद्दोजहद के बाद फैसला किया है एक अंतिम खत मां के नाम लिखूंगा; अपने अंतर्द्वंद्व को ख़त्म करते हुए वो सब कुछ जो शायद मैं अंतिम समय कह पाता।

    कभी कभी दिमाग़ सोचता है कि कोई इस दुनिया से कैसे जाता है? आपका कोई अपना अज़ीज़ यूं पलक झपकते चला जाता है और आप जान नहीं पाते, समझ नहीं पाते कि हुआ क्या?

    दुनिया में अगर कुछ भी निश्चित है तो वो है मौत। ज़िंदगी कुछ और नहीं बल्कि खुद के रोने के साथ इस दुनिया में आगमन से लेकर दूसरों के रोने के साथ वापसी के बीच का सफर है।

    स्त्री पुरुष द्वारा संतान उत्पत्ति की चाह स्वयं की इच्छा होती है फिर चाहे वो संतान सुख की अनुभूति के लिए हो या अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए अथवा कुछ और। किंतु एक तरीके से उसके परवरिश की नैतिक जिम्मेदारी उस दंपत्ति की होती है सिर्फ़ इसलिए कि उस संतान को इस दुनिया में लाने का निर्णय उनका स्वयं का था।

    ऐसे में हर मां-बाप अपनी संतान को स्वयं से ज्यादा सुख, सुविधा और अन्य जरूरतों की पूर्ति पर अधिक ध्यान देते हैं, इन सबके बीच मायने ये रखता है कि जब किसी परिवार के पास दो वक्त की रोटी खाने के सिवा कुछ न हो और फिर भी वह अपने संघर्ष और मेहनत से खुद का और अपनी आने वाली पीढ़ी का जीवन स्तर/उत्पादकता बढ़ाने के लिए तत्पर रहता है तो नैतिक रूप से उनकी सराहना अवश्य की जानी चाहिए।

    बदलते परिवेश और आधुनिकता के दौर में नवीन पीढ़ी ने संघर्ष और संवेदनशीलता के रास्ते से हटते हुए अधिकतर चीजों के लिए दोषारोपण का रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है और अपने जीवन को हर मामले में तुलनात्मक बनाकर रखा हुआ है।

    परिवार/घर उसमें रह रहे लोगों से होता है वरना वह ईंट से बनी दीवारों का मकान होता है। मकान को घर बनाने, उसे संजोने और समय-समय पर उसे उद्दीपित करने का काम हमेशा घर की स्त्रियों ने ही किया है। पुरुष जो ख़ुद को हमेशा अस्त-व्यस्त पाता है उसे घर की ज़िम्मेदारी न ही मिले तो बेहतर है। पितृसत्तात्मक सत्ता जिसका वर्चस्व सदियों से रहा है और जिसने आर्थिक गतिविधियों की ज़िम्मेदारी उठाई रखी उसने सब कुछ इसी को समझा। अन्य पारिवारिक एवं घरेलू कामों में दिन रात लिप्त स्त्रियों के कामों को कोई तवज्जों दी ही नहीं। पर आज संसाधनों के उचित वितरण से लेकर हर क्षेत्र में समान प्रतिनिधित्व मिलने पर पुरुषवादी सोच रखने वाले समाज का सिंहासन हिलने लगा है।

    ऐसे में हर व्यक्ति अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव, संघर्ष या यूँ कहे इस जीवनरूपी कुरूक्षेत्र में अनेक महाभारत जैसे युद्ध लड़ता है जिसमें द्वंद्व भी है, डर भी है और न जाने कितनी अन्य लड़ाई है जिससे लड़ना ही है ऐसे में सभी का परिणाम सुखद या जीत का होगा, ऐसा कहां संभव है ऐसे में कुछ लड़ाई लड़ी ही इसलिए जाती है जो आपके जज्बे, धैर्य, सहनशीलता की परीक्षा के लिए होती है सरल शब्दों में कहें तो कुछ जंग जीत-हार के लिए नहीं बल्कि इसलिए लड़ी जाती हैं कि लोग आपके सिर्फ़ लड़ाई में बने रहने के लिए ही जाने।

    आज के परिवेश में ऐसी सैकड़ों बीमारियां हो चुकी है जिसके साथ व्यक्ति अपना जीवनयापन, अपनी दैनिक दिनचर्या अन्य जरूरी कामों के साथ कर रहा है लेकिन कैंसर उसमें से एक ऐसी बीमारी है जिसको लेकर समाज में एक अजीब किस्म का डर है जिसके बारे में लोग बात तक नहीं करना चाहते और उस व्यक्ति एवं उसके परिवार पे इस बीमारी का एक अलग मानसिक दबाव पड़ता है जिसमें समाज का भी ठीक ठाक योगदान होता है। इस बीमारी से जल्द अवगत होने पर इससे पूर्णत शायद इजात मिल सकता है अन्यथा जीवन संघर्षमय हो जाता है ।

    वहीं इस बीमारी को लेकर लोगों में सही जानकारी का काफी अभाव भी है, इस बीमारी का अत्यधिक खर्चीला और न्यूनतम रिकवरी रेट भी डर का अहम कारण है।

    दूसरा पहलू प्राइवेट संस्थानों ने कैंसर के नाम पे एक नया बाजार खड़ा कर दिया है जहां इलाज कराना सामान्य परिवारों के लिए बेहद मुश्किल काम है। कुछ अस्पताल जो सरकार द्वारा या फिर सब्सिडी के तौर पर इलाज कर रहे है वहां पर मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई है कि डॉक्टर्स और मरीज दोनो के लिए एक नया संघर्ष है, जहां इलाज में विलम्ब तो होता ही है साथ में इससे होने वाले अन्य साइड इफेक्ट्स के साथ अन्य पर्याप्त जानकारी से भी मरीज अछूता रह जाता है। जिससे अधिकतर लोग अपने जीवन को वापस सामान्य स्थिति में ला ही नहीं पाते।

    शेष आगे फिर…!

  • ख़त

    दुनिया में अगर कुछ भी निश्चित है तो वो है मौत। ज़िंदगी कुछ और नहीं बल्कि खुद के रोने के साथ इस दुनिया में आगमन से लेकर दूसरों के रोने के साथ वापसी के बीच का सफर है।

    स्त्री पुरुष द्वारा संतान उत्पत्ति की चाह स्वयं की इक्क्षा होती है फिर चाहे वो संतान सुख की अनुभूति के लिए हो या अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए अथवा कुछ और। किंतु एक तरीके से उसके परवरिश की नैतिक जिम्मेदारी उस दंपत्ति की होती है सिर्फ़ इसलिए कि उस संतान को इस दुनिया में लाने का निर्णय उनका स्वयं का था।

    ऐसे में हर मां बाप अपनी संतान को स्वयं से ज्यादा सुख, सुविधा और अन्य जरूरतों की पूर्ति पर अधिक ध्यान देता है। इन सबके बीच मायने ये रखता है कि जब किसी परिवार के पास दो वक्त की रोटी खाने के सिवाए कुछ न हो और फिर भी वह अपने संघर्ष और मेहनत से खुद का और अपनी आने वाली पीढ़ी का जीवन स्तर और उद्पादकता बढ़ाने के लिए तत्पर रहता है। नैतिक रूप से उनकी सराहना इस मामले में की जानी चाहिए।

    बदलते परिवेश और आधुनिकता के दौर में नवीन पीढ़ी ने संघर्ष और संवेदनशीलता के रास्ते से हटते हुए अधिकतर चीजों के लिए दोषारोपण का रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है और अपने जीवन को हर मामले में तुलनात्मक बना कर रखा हुआ है।

    क्या मानव मात्र का जीवन मिलना ही अनमोल नहीं? जिसे हम अपने संस्कार, संस्कृति, संघर्ष, संवेदनशीलता से इसे एक नया आयाम दे सकते हैं। जिम्मेदारियों से भागती ये युवा पीढ़ी जो सिर्फ़ अब भौतिकतावादी चीजों में ही अपना जीवन देखता है उसे अपने पूर्वजों के ऋणी होने का एहसास कब और कैसे होगा।

    मैं भी ख़ुद को इसी युवा पीढ़ी की फ़ेहरिस्त में रखता हूं। गांव के ही बुजुर्गों की कहावत है कि व्यक्ति कहीं भी पहुंच जाए उसे अपनी जड़े नहीं भूलनी चाहिए क्योंकि वो ही उसे जमीन से जोड़े रखने का काम करती है। आपके सम्बंध और आपकी व्यवहारकुशलता ही इस जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है जो शाश्वत रहती है बाक़ी चीजे समय और परिवेश से बदलती रहती हैं।

    उम्र बढ़ने के साथ जब व्यक्ति परिपक्व होता जाता है तो उसे प्रौढ़ावस्था में बड़ो की बोझिल लगने वाली बातें न सिर्फ़ बेहतर समझ आने लगती हैं बल्कि उनके प्रति उनका नज़रिया भी बदलने लगता है।

    मध्यम वर्गीय परिवार जन्म के बावजूद ईश्वर और परिवार की तरफ से कभी कोई कमी महसूस नहीं हुई बल्कि आवश्यकता से अधिक समस्त चीज़ों की प्रतिपूर्ति की गई। पर समय समय पर पूर्व की प्रथम और दूसरी पीढ़ी के संघर्षों की कहानियां बताई जाती रहीं हैं जिससे हम सभी प्रदत्त सुविधाओं का दोहन न करें।

    अइया(पिता जी की दादी) जिनका सानिध्य मिला तो पर उनको करीब से ज्यादा अनुभव करने का मौका नहीं मिला सिवाए उनकी व्यक्तिगत घटनाओं और कहानियों के सुनने के। परंतु अम्मा(दादी) को देखने समझने और उनके साथ वक्त बिताने का समय खूब मिला, थी तो वो निरक्षर ही पर अपने काम के प्रति लगन, निष्ठा और मेहनत उन्हें अलग बनाता है। सुबह भोर होते ही उठने से लेकर फिर रात्रि को सोने के बीच का समय उनका सिर्फ़ पारिवारिक गतिविधियों में ही गुजरता था। दैनिक सामग्री की व्यवस्था उसका संरक्षण और उसका उचित वितरण इतना आसान नहीं जब आपके पास लोगों की संख्या सामान्य परिवारों से ज्यादा हो।


    घर उसमें रह रहे लोगों से होता है वरना वह ईंट से बनी दीवारों का मकान होता है। मकान को घर बनाने, उसे संजोने और समय समय पर उसे उद्दीपित करने का काम हमेशा घर की स्त्रियों ने ही किया है। पुरुष जो ख़ुद को हमेशा अस्त-व्यस्त पाता है उसे घर की ज़िम्मेदारी न ही मिले तो बेहतर है। पितृसत्तात्मक सत्ता जिसका वर्चस्व सदियों से रहा है और जिसने आर्थिक गतिविधियो की ज़िम्मेदारी उठाई रखी उसने सब कुछ इसी को समझा। अन्य पारिवारिक एवं घरेलू कामों में दिन रात लिप्त स्त्रियों के कामों को कोई तवज्जों दी ही नहीं। पर आज संसाधनों के उचित वितरण से लेकर हर क्षेत्र में समान प्रतिनिधि मिलने पर पुरुषवादी सोच रखने वाले समाज का सिंहासन हिलने लगा है।

    Too be Continued…… Wait for full letter 🙏

  • व्यक्ति के जीवन में संघर्ष कई प्रकार के होते हैं फिर चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक हो या फिर मानसिक। आर्थिक और सामाजिक संघर्ष को तो फिर भी दूसरों की मदद से सुलझाया जा सकता है किंतु मानसिक संघर्ष को सुलझा पाना इतना आसान नहीं। व्यक्ति के अंतर्द्वंद कभी कभी उसे इतना झकझोरते हैं कि वह असहाय महसूस करने लगता है।
    ऐसे तमाम सवाल जिसे वो खुद से करता है और जबाब जानने का प्रयास करता है जैसे कि सारी बुरी चीज़ें मेरे साथ ही क्यों? वो भी जब आप उम्र के ऐसे पड़ाव पे हो जहाँ आपकी उत्पादकता सर्वोच्च हो। आपकी नकारात्मकता और भी बढ़ने लगती है जब इस भौतिकतावादी समाज मे आप खुद को बचा कर रख रहे हो, आपने किसी का कभी बुरा न किया हो या न चाहा हो बल्कि सदैव अपनी क्षमता अनुसार लोगो के लिए खड़े रहे हो।

    सच्चाई और नैतिकता का साथ देने वाले सभी के साथ अच्छा ही होता है और चार्वाक सिद्धांत पे चलने वाले सभी लोगों के साथ बुरा ही इसका किसी के पास कोई प्रमाण नहीं और न ही कोई इसकी शत-प्रतिशत गारण्टी ले सकता है।
    ऐसी स्थिति में आप जीवन में कैसे संतुलन बना कर रखें साथ में अपनी क्षमता के अनुरूप अपनी उत्पादकता को बनाये रहे यह बड़ा मुश्किल काम हो जाता है।
    ऐसे में यह कहा जा सकता है कि जब आपकी लड़ाई ख़ुद से होने लगती है तब हार-जीत का कोई मतलब नहीं होता। ऐसी स्थिति में दिल-दिमाग-शरीर सबके बीच सामंजस्य ही काम आती है।

    जीवन शायद इसी का नाम है की दिन प्रतिदिन इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढते हुए आप खुद को कैसे बेहतर बनाएं और अंधी दौड़ में भागती इस दुनिया की रेस में ना पड़े और अपनी इच्छा अनुसार अपने रास्ते और अपनी मंजिल निर्धारित करें।

    P.S- व्याकरण या शाब्दिक त्रुटि पर क्षमा।🙏

  • यह एक आम धारणा भी है और अनुभव भी कि औरतें मर्दों की तुलना में ज्यादा रोती हैं। जरा-जरा-सी बात पर उन्हें रोना आ जाता है। खुशी में, गम में और कई मर्तबा असमंजस में भी औरतें रोती हैं और अपने मनोभावों को व्यक्त करती हैं। लेकिन आदमी कम रोते हैं। कई बातों पर जब उनका रोना स्वत: फूट रहा होता है, वे जोर लगाकर रुदन को रोक लेते हैं। उन्हें अगर किसी बात पर रोना ही होता है, तो वे एकांत में जाकर रोते हैं। और ऐसा सिर्फ हिंदुस्तान के मर्द नहीं, दुनियाभर के मर्दों के साथ है। एक तरह से यह साबित करता है कि पूरी दुनिया पितृसत्तात्मक रही है। जो समाज जितना ज्यादा पितृसत्तात्मक रहा है, जहां मर्दों की जितनी ज्यादा तूती बोलती है, वहां मर्द उतना ही कम रोते हैं।
    यह मगर तय है कि मर्दों को भी उतना ही रोना आता है, जितना औरतों को आता है। कई बार जब शराब के असर में मर्दों पर पितृसत्ता का हिस्सा होने के अहसास का प्रभाव ढीला पड़ जाता है, तो मर्द भी फूटकर रोते हैं। मैंने शराब पीकर बड़े-बड़े दिलेर मर्दों को रोते देखा है। कुछ मर्द अतिसंवेदनशील होते हैं। पीने के बाद उन्हें किसी भी बात पर रोना आ जाता है और वे रोने का कोई मौका नहीं गंवाते क्योंकि पीने के बाद रोने का अपना सुख है।
    अगर मर्दों को रोते हुए देखना है, तो सिनेमाघर उसके लिए सबसे उपयुक्त जगह है। हॉल के अंदर क्योंकि अंधेरा होता है, मर्द सबसे छिपाकर रो सकते हैं। हालांकि मैं उसे कई मर्तबा कह चुका हूं कि आदमियों के रोने में बुरा कुछ नहीं है। आंसू निकलना एक रासायनिक प्रक्रिया है और इसका किसी के कमजोर होने या स्ट्रॉग होने से कोई ताल्लुक नहीं । शायद आसपास का जीवन और विषम से विषम परिस्थितियों और फिल्में देख (जिनमें मर्दों को रोते हुए कम ही दिखाया जाता है) के मर्दों का अपना रोना छिपाने के पीछे समाज का ही हाथ है। आप गौर कीजिएगा किसी लड़के के गिरकर रोने पर आसपास के अंकल या आंटी द्वारा उसे कैसे चुप करवाया जाता है। पहला ही वाक्य होता है – ‘अरे बेटा, तुम तो बहादुर हो, लड़का होकर भी रोते हो?’ लड़के के बाल मन में यह बैठ जाता है कि अगर उसे बहादुरी दिखानी है, तो रोना नहीं है। दूसरों के सामने तो कतई नहीं। रोना पुरुष होने के स्वभाव के प्रतिकूल मान लिया गया। दूसरी ओर लड़कियों के रोने पर ऐसा कुछ नहीं होता। घरों में कई बार मांएं और दादियां ही बोल देती हैं- ‘उसे अकेले छोड़ दो। रोकर जी हल्का हो जाएगा, तो अपने आप चुप हो जाएगी।’
    इस तरह लड़कियों को बचपन से ही रोना अपने लड़की होने के अनुकूल लगने लगता है। इसलिए वे बेझिझक रोती हैं। बेबसी में रोती हैं, गम और खुशी में रोती हैं, असमंजस में रोती हैं, डर में, कल्पना में, अतीत को याद कर और भविष्य के बारे में सोचते हुए, वे किसी भी बात पर रो लेती हैं और हल्की हो जाती हैं। पुरुष सब दबाकर रखता है और इसलिए हमेशा खिंचा रहता है, भारी बना रहता है। रोना आने पर ओबामा भी पब्लिक के सामने ही रो पड़े थे। कपिलदेव को भी हम फूटकर रोते हुए देख चुके हैं। आप अगर पुरुष हैं तो कभी आजमा के देखें, जरा-सा रोने से छोटे नहीं हो जाओगे, हलके जरूर हो सकते हो।।

  • IIT_DELHI

    आनंदऔर अनुभव

    एक बार फिर मैंने समय के कुछ पीछे जाकर, कुछ महीनों बाद फिर से कुछ यादों को निकालने का प्रयास किया है।

    आइये आपको एक ऐसे यात्रा वृतान्त के भवसागर में ले चलते है, जो कुछ लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया था, और शायद ही उसे कोई भुला पाया होगा।

    कहानी कुछ यूँ है कि अपने कॉलेज के ओर से कुछ अन्य बड़े संस्थान जैसे आई आई टी आदि में सांस्कृतिक कार्यक्रम, कला, ज्ञान विज्ञान, साहित्य या फिर किसी अन्य प्रकार के क्षेत्र में बाक़ी संस्थान से दो दो हाथ करने और वहाँ के दूर से लगने वाले रंगीन जीवन और कुछ दिनों तक स्वतंत्र पूर्वक दिन रात विचरण करने की छूट की कामना के साथ सभी का जाना होता था। जिसमें संस्थान के सीनियर खिलाड़ी के नेतृत्व में जूनियर्स को भी मौका मिलता था। जहाँ ज्यादातर कानपुर जाना होता था।

    कहानी कुछ ऐसी ही थी इस बार भी, किंतु इस बार परंपरा तोड़ने का समय था कुछ वो करना था जो शायद पीछे न हुआ था, सभी के दिमाग़ में यही था कि कानपुर ही जाना होगा, जिसको ध्यान रखकर तैयारी शुरू हुई।

    कहानी में मोड़ तब आया जब एक नई जगह का नाम सामने लाया गया यानी दिल वालों की जगह दिल्ली, तमाम जद्दोजहद के बाद निष्कर्ष ये निकला कि इस बार कॉलेज की ओर से दो टुकड़ी भेजी जाएगी जो एक कानपुर में धूम मचाएंगी और एक दिल्ली में।

    कुछ परंपरावादी विचारधारा के साथ कुछ अन्य लोग भी कानपुर के लिए जाने के तैयार हुए तो वही दिल्ली जाने वालों की संख्या कही ज्यादा सामने दिखी।
    वैसे तो पुराने इतिहास के मुताबिक़ कुछ चंद लोंगो के ही जाने की , कुछ शर्तों के साथ परंपरा रही थी।

    शर्ते इस बार भी थी, लेकिन शायद इस राम राज्य में थोड़ा औरों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिल गया था।

    ट्रेन इलाहाबाद से दिल्ली के लिए रात्रिकाल में चली,पूड़ी सब्जी खाके सब सोये और हम सही सलामत वहाँ अपने योद्धाओं के साथ पहुँचे भी, हौजखास मेट्रोस्टेशन होते हुए आई आई टी कैंपस में प्रवेश हुआ और चार दिनों के इस समय सारणी में सुबह नौ बजे से सायंकाल तक हमें वहाँ के कार्यक्रम में भाग लेकर अपना जौहर दिखाना होता था, और उसके बाद वो एक लंबी टीम अपनी अपनी श्रद्धानुसार छोटी छोटी टुकड़ी में बट जाया करती थी।

    फ़िर चाहें विशाल-शेखर के गाने हो, बैंड नाईट हो, कवि सम्मेलन हो या फ़िर कुछ अन्य प्रकार के मनोरंजन युक्त कार्यक्रम।

    इसी बीच कुछ घूमने के शौकीन लोग दिल्ली भ्रमण पे भी निकल लिया करते थे, इन्हीं में एक टीम हमारी थी जिसके कुल आठ सदस्य थे जिनका काम दिन भर, मूल काम करके रात्रि भ्रमण पे निकलना था, शुरुआत हमनें जे एन यू की गलियों से किया जहाँ पूरा कैंपस घूमकर उन्हीं गलियों में गाने गुन गुनाकर न जाने कित्ते चक्कर काटे।

    किसी महानुभाव ने चाँदनी चौक के पराठे खाने का प्रस्ताव रखा और प्रस्ताव मिला फ़िर देर किस बात की हम वहाँ भी गए, वहाँ छत्तीस क़िस्म के पराठे थे तो लेकिन उसके बाद भी सुल्तानपुर के आदर्श ढ़ाबे के 15 रुपये के पराठे का भी मुकाबला न कर सका, साथ ही हमनें इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन, संसद भवन इन सब जगहों का भ्रमण किया।

    इन तीन दिनों के उठापठक और तमाम मौज़ मस्ती के साथ और न जाने कितनी यादों के साथ हमें अब वापस अपने वतन लौटना था रात्रि ग्यारह बजके पचास मिनट पर हमारी ट्रेन थी। चूंकि शाम आठ बजे ही सभी फ्री हो चुके थे तो नौ बजे वहाँ के ग्राउंड में सबको इकठ्ठा होने को कहा गया था जिसके बाद हमें वहाँ से निकलना था।

    कहानी में असली मोड़ तो यहाँ आना था, ओला, उबर के जमाने और उसके ऑफर के चक्कर में कुछ लोगों ने कप्तान महोदय से आज्ञा लेकर 9बजे ही निकलकर स्टेशन पे मिलने की बात कही, चूंकि समय हमारे पास पर्याप्त था, इसलिए इसमें कोई समस्या भी नहीं थी और 4-4 के समूह में जाना भी थोड़ा आसान था बजाए 24 लोगो के एक साथ के, कुछ इसी कड़ी में बाक़ी सभी भी इसी ऑफर का लाभ लेकर समय रहते स्टेशन पहुँच चुकें थे, कप्तान महोदय के साथ पाँच अन्य लोग जो बाक़ी देख रेख में लगे थे,
    कि सब पहुँच चले फ़िर हम लोग भी निकलते है,

    वो आख़िरी कैब जो ग्यारह बजे आ रही थी जिसके बाद भी हमारे पास पचास मिनट थे और शायद हम आराम से पहुँच जाते किँतु वो ड्राइव मुख्य द्वार के बजाय IIT के पिछले गेट पे चला गया जिसे हमारे पास पहुँचने में लगभग आधे घंटे लग गए वो लगते भी क्यों न, ये कोई KNIT थोड़े न था, दिल्ली जैसा शहर और रात्रि का समय जहाँ और कोई विकल्प भी न था,

    जैसे तैसे हम भागमभाग करते हुये निकले तो, ट्रैफिक का भी सामना करना पड़ा, हमनें कई जगह ट्रैफिक नियम को तोड़ते हुए 100 km/h तक की स्पीड भी, हमें मंजिल तक न पहुँचा सकी यानी ट्रेन छूट चुकी थी।

    इन सबमें जो सबसे दुःख की बात थी वो ये की सभी 24 के टिकट ही हमी के पास थे, हमारे कुछ क्रांतिकारी मित्रों ने chainpulling भी की और पुलिस कर्मियों से लाठी खाने को भी तैयार हुए कि बस हम पहुँच जाए किन्तु कुछ पैतरा काम न आया, जिसके बाद हमारे दिमाग में एक ही विचार था कि कम से कम हम टिकट ही पहुँचा सके जिससे बाकी लोग आसानी से पहुँच सके, हम बचे लोग कैसे भी आ जायेंगे।
    इसके बावजूद भी ट्रेन दुबारा पटरी छोड़ रही थी, टिकट हमें S4 तक ले जाना था किंतु हम सब में से एक इंसान ने दौड़ते भागते टिकट भी S7 में खिड़की पे बैठे एक सज्जन तक ही टिकट पहुँचा सका और गाड़ी के स्पीड के साथ भागते हुए उसका मोबाइल नम्बर याद किया और उसे बोला आपको इस टिकट का क्या करना है हम फ़ोन पे बताते है।

    भला रहा उस सज्जन का फ़ोन के माध्यम से उन्होंने उस टिकट को हमारे साथियों तक पहुँचा दिया था। यहाँ थोड़ी जान में जान तो आ गयी थी लेकिन समस्या अभी ख़त्म थोड़े न हुई थी।

    हम छः में से तीन का मोबाइल का बन्द था, एक के पास डब्बा फ़ोन था, और ओला के चक्कर में मेरा फ़ोन ट्रेन में बैठे साथियों के पास था, कुल मिलाकर एक ही फ़ोन चलती हालात में था जिसका भी बंद होना कुछ ही समय बाद तय था और उसके बाद नई दिल्ली स्टेशन से कोई दूसरी ट्रेन भी न थी। इस समय कुछ लोग अपना आपा खो चुके थे।

    किंतु यही जीवन है जहाँ आपको हर वक्त संयम और धैर्य बनाये रखना होता है, कुछ अन्य विषम परिस्थितियों के कारण रात्रि 1बजे दूसरे के माध्यम से टिकट का जुगाड़ किया गया अब हमें आंनद विहार स्टेशन से गाड़ी पकड़नी थी जिसका समय सुबह 5 बजे था, किसी तरह वहाँ पहुँचते ही बचा हुआ फ़ोन भी बंद हो चुका था।

    पिछले दो रात्रि से जागने की वजह से सभी की हालात पस्त हो चुकी थी, इन्ही सबके बीच में सभी ज़मीन में पड़े सो चुके थे।
    किंतु एक महोदय जो दीवार के सहारे जो अपना फ़ोन चार्ज कर रहे थे वो पेट पर मोबाइल रख कर ही सो गए जिसका परिणाम ये हुआ कि उसी रात ट्रेन के कुछ समय पहले वो फ़ोन भी चोरी हो चुका था। बहुत ढूंढने के बाद भी कुछ न हो सका, सुबह पाँच बजे हम कौन सा FIR या complain करते और अगर जाते भी तो दूबारा ट्रेन छूट जाती।

    इत्ती समस्याये कम थी क्या? जो 12000 का और चूना लग चुका था, ख़ैर बड़े मुश्किलों से हमनें अब ट्रेन पकड़ने का निश्चय किया और सब कुछ वही और उसी वक्त भूल जाने का निश्चय किया और पहले निकले सभी टीम सदस्यों को भी इन बातों को अपने पास तक ही रखने को कहा गया जिससे कॉलेज में किसी प्रकार की अफ़रातफ़री न हो और भविष्य में और लोगो को कहीं बाहर जाने से रोका न जाए।

    ख़ैर इस घटना को कही चार वर्ष होने वाले है, अभी भी इस घटना का वृतान्त कुछ ही लोगों को पता है, किन्तु इस समय में उस समय की कुछ छायाचित्र को देखते ही पूरी कहानी आँखों के सामने चलने लगी तो सोचा आज क्यों न इसे छोटे रूप में शब्दों में पिरोने की कोशिश की जाए।

    जीवन कोई Scripted Story नहीं, हमेशा खुश रहे और हर पल का आनंद लेते हुए संयम और धैर्य के साथ आगें बढ़ते रहे।😊🙌

    P.S.- किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए क्षमा याचना।🙏

    “Travel is an investment in yourself.”
  • एक ऐसा खेल जिसे शायद पूरी दुनिया खेलती है या यूँ कहें वो खेल ख़ुद लोगों को खेलने पर मज़बूर कर देता है।

    जी हाँ!!
    नाम है ख्वाइशों का खेल!!!
    कुछ यूँ कहें तो व्यक्ति का पूरा जीवन कुछ और नहीं ख्वाइशों से भरी एक दुनिया मात्र है,
    समय के बढ़ते चक्र के साथ वो सारा दांव पेंच सिर्फ़ ख्वाइशों के लिए ही तो लगाता है फ़िर चाहे वो ख़ुद की हो या किसी और की।

    आईये थोड़ा सा आपको इस शब्द के भव सागर में ले चलते है, किसी बच्चे का इस दुनियां में अवतरित होना भी एक ख्वाइशों का ही परिणाम है, माँ बाप उसके अपने पैरों पे खड़े होने से पहले ही न जाने कितने सपनें और ख्वाइशें को और जन्म दे देते है और जरा सा मौका मिलते ही उसे ज़िन्दगी की इस रेस में अपना घोड़ा समझ दाव लगा देते है और सारी देख-रेख इन्हीं ख्वाइशों के साथ ही होती है कि ये एक दिन किसी लंबी रेस में बाज़ी मारेगा।

    कोरे कागज की तरह बच्चे की ज़िन्दगी पे समय से पहले बेवजह यूँ ही इत्ता लिख दिया जाता है जिसके बोझ के तले वो दबने लगता है ,
    लोग लिखतें भी शायद इसलिए है कि उन्हें लगता है यही एक मात्र उपाय है। क्या ये नहीं हो सकता? कि समय के इस चक्र में वो बच्चा अपने जीवन की डायरी ख़ुद ही भरे।

    और इसी क्रम में वो बच्चा 16-17 की उम्र में ही सामान्यतः अपने सपनों की भी बात करने लगता है पर उसे ख़ुद नहीं पता जिसे वो सपना कह रहा जाने अनजाने में वो कितने लोगों की ख्वाइशें मात्र है।

    वक़्त गुजरने के साथ मिली समझ और वक़्त के तकाज़े से अब उसी बच्चें की भी ख्वाइशों का जन्म होने लगता है, चंद महीनों में ही उसे यहाँ की भौतिक चीज़े आकर्षित करने लगती है, फिऱ चाहे उसकी शुरुवात खिलौने पाने की इक्क्षा हो या खाने पीने की, ये छोटी छोटी चीज़े उस बच्चें के लिए इतने कम समय में ही इतनी बड़ी बनने लगती कि वो एक बार को अपनी जान दे या किसी की जान ले भी सकता है।

    ख्वाइशों के इसी स्तर पे कुछ समय बाद उसे अपनी गैंग यानि यार दोस्त सबसे प्रिय हो जाते है और इसी सबके बीच में उन्हीं माँ-बाप से विद्रोह की भावना शुरू होने लगती है क्योंकि उसे लगता है कि मेरी ख्वाइशों का दमन करने वाले यही लोग है।

    कहानी तो अभी शुरू हुई है, मनुष्य का सामाजिक और संवेदनायुक्त होना ही शायद उसे अन्य प्राणियों से अलग बनाता है और इसी सामाजिक परिदृश्य में प्रेम उसके जीवन का एक अभिन्न अंग होता है फ़िर ये प्रेम चाहे किसी व्यक्ति से हो या वस्तु से।

    और मध्यावस्था में उसका प्रेम यानी किसी से भावनात्मक लगाव या किसी व्यक्ति विशेष या फ़िर किसी भी अन्य चीज़ से लगाव ऐसे चरम स्तर पे होता है कि अब तक की सारी ख्वाइशें उसे तुच्छ लगने लगती है और उसे लगता है शायद जीवन का सबसे सौंदर्य पूर्ण भाग यही है क्योंकि उसके पास इस समय सौंदर्य, साहस, ऊर्जा शायद सब कुछ अपने चरम स्तर पर होता है किन्तु वो भूल जाता है कि ये खेल अभज लंबा चलने वाला है और इन्हीं सबके बीच ख्वाइशों के इस खेल में वो कुछ समय बाद खुद को पिछड़ा या ठगा हुआ पाता है।

    और इस सारी जद्दोजहद के बाद ज़िन्दगी के एक चौथाई भाग गुजार लेने के बाद उसे ध्यान आता है अब उसके जीवन में स्थायित्व की जरूरत है और वो इस भ्रम में पड़ जाता है कि ये स्थायित्व उसके बेहतर कैरियर और सामाजिक प्रतिष्ठा आदि से मिल सकता है और इस प्रकार जानें अनजाने में वो एक बार फ़िर वो एक नई ख्वाइश को जन्म दे चुका होता है…!!

    यहाँ से फ़िर अपनी निजी ख्वाइशों के साथ ही घर परिवार की ख्वाइशों द्वारा झोंके जीवन की लम्बी रेस में पुनः शामिल जाता है। तो स्वाभाविक ही है जब रेस है तो कोई जीतेगा या हारेगा।

    या यूँ कहें ख्वाइशें ही है या तो मुक़म्मल होंगी या कुछ अधूरी रहेगी। और अग़र इसके बाद भी वो समझने में असमर्थ रहा तो ऐसे ही आगें भी इसी खेल में फंस कर रह जाता है।
    और सहजता, ठहराव, संतोषपूर्ण जीवन जैसी विशेष अनुभूतियों से कहीं न कहीं दूर भी हो जाता है।

    कुल मिलाकर ये एक ऐसा चक्र है जिसका कोई अंतिम बिंदु ही नहीं है इससे निकलने के लिए उसे तोड़ कर बाहर निकलना ही संभव है।

    और सबसे मज़ेदार बात!!
    ये खेल इतना रोचक है कि न वो सब इससे निकल पाते है और न ही वो खेल उन्हें निकलने का मौका देता है।।

  • पुस्तक समीक्षा – डार्क हॉर्स

    स्थान- पुरानी दिल्ली मुखर्जीनगर,

    मुखर्जी नगर की वास्तिवकता से अवगत तो नहीं हूँ, किन्तु इस किताब ने 180 पेज पढ़ने तक वहाँ की ज़िन्दगी को वही की गलियों से मानो जीवन्त दर्शन कराया हो।

    कहानी का सार कुछ यूं रहा कि देश के कोने कोने से निकल अपने ख़्वाबों को साकार करने उसी वजीराबाद, नेहरूविहार, इन्द्रविहार के छोटे से कमरे में कैद होकर इतिहास रचने का बेड़ा और आँखों में लाल बत्ती का सपना लिए अपना डेरा जमाया।

    कुछ सांसारिक मोहमाया का शिकार भी हुए यानि दिल्ली की हवा उन्हें भी लगी और बत्रा चौराहे पर सिगरेट के धुएं से दुनिया और देश का नक्सा की कला के साथ संजीवनी बूटी समझ कुछ ने बोतले भी तोड़ी तो वही कुछ को गांव में बाबू जी के कर्ज़ लिए पैसे और कुछ को माँ द्वारा बेच दी जमीनों ने उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति उत्साहित बनाये रखा।

    इन्हीं सबके साथ समय बीतता गया, कुछ पीटी निकाल, मेन्स तक पहुँचकर, आखिरी लड़ाई में लटक गए तो कुछ पहले ही। लेकिन उनमें एक बार और उठकर चल देने का जज्बा भी था और ख़ुद पर भरोसा भी।

    शायद इसलिए कहा भी गया है,
    सिविल सेवा की तैयारी करने वाले से ज्यादा भयंकर आशावादी मानव का संसार मे कही भी मिलना मुश्किल है।

    अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा के बीच बढ़ते द्वंद ने आपसी तकरारें बढ़ाई और कई लोगों से फॉर्म में हिंदी भाषा माध्यम चुनवाकर भी उन्हें अंग्रेज़ी में सवाल पूछकर बाहर कर दिया गया था, क्या उनके ज्ञान का मूल्यांकन सिर्फ़ भाषा से ही करना उचित था आज भी अंग्रेज़ी और हिंदी के बीच ऐसी न जाने कैसी अवधरणा बनी हुई है, अंग्रेज़ी वाला ज्यादा ज्ञानी और हिंदी वाला कम।

    ख़ैर इन्हीं सबके साथ वो लक्ष्मण रेखा भी आई जब कइयों को वापस अपने सपनो को उन्हीं बोरो और झोलों में कैदकर ले जाना था, कुछ ने तो एग्जाम पास कर मानो चाँद पर तिरंगा फहराया हो और कई लोगों ने इस सिविल के रेस से ही न जाने अलग मंजिल जैसे पत्रकारिता, स्टेट सर्विसेज या लेखन या अन्य किसी सम्मानीय जगहों पर पहुँच चुके थे।

    वही कुछ असफ़ल लोगों को अपने प्रयासों पर फ़क्र था और शायद उनकी ज़िंदगी में एक ठहराव भी, उन्हें कभी कभी लगा भी होगा कि उन्हें द्वारा लिए निर्णय ग़लत निकले लेकिन जीवन की वास्तविकता में हम जाने अनजाने में न जाने कितने निर्णय गलत लेते है, लेकिन वही निर्णय हमें गिरकर उठना सिखाते है और इस व्यवहारिक संसार में ज़िन्दगी को सादगीपूर्ण जीने का जो अनुभव देते है उसे हम कहीं और से नहीं पा सकते है। और इसलिए
    दुनिया की न जाने कितनी बातें जान समझकर, आँख बंद कर दौड़ती भागती दुनिया में वो कई असफ़ल लोग उन अज्ञानी लोगों से कही ज्यादा सफ़ल और खुश थे।

    शायद सही ही कहा गया है कि


    ज़िन्दगी आदमी को दौड़ने के लिए कई रास्ते देती है, जरूरी नहीं कि सब एक ही रास्ते दौड़े।
    जरूरत है कि कोई एक रास्ता चुन लो और उस ट्रैक पर दौड़ चलो, रुको नहीं दौड़ते रहो।
    क्या पता तुम किस दौड़ के “डार्क हॉर्स” साबित हो जाओ।।

  • इंजीनियरिंग का पहला साल

    स्मृतियां

    Content- 18+ (Keep calm and be patience)😅

    Episode -1


    यादों के उन्हीं झरोखों के क्रम में आगें बढ़ता हूँ,
    आगें की कहानी में थोड़ा सहूलियत बरतने की जरूरत है और मैं उसका ध्यान रखते हुए आगें बढ़ रहा हूँ आप सब पढ़िए और आनंद लीजिये और उन यादों को ताज़ा करिए-
    बच्चा जब होश संभालना शुरू करता है तब उसे छोटे छोटे प्रलोभन दिये जाते है जैसे बेटा! दसवीं में अच्छा कर लो फिर सही हो जाएगा, उसके बाद बारहवीं कर लो उसके बाद सब सही हो जाएगा।
    यहाँ तक तो फिर भी पता होता है अच्छा पहले ये, फिर ये करना है, असली दिक्कत तो इसके बाद आती है अब करें तो क्या करें, उसे तो कुछ पता होता नहीं, फिर उसके आस पास के लोग उसका भविष्य तय कर देते है, बेटा मैथ्स है तो इंजिनीरिंग कर लो, बायो है तो MBBS और आर्ट है तो कॉमर्स, ये बताते तो ऐसे है जैसे साला Nestle ki Maggi hai दो मिनट में बनकर तैयार ख़ैर….!!!
    मैं शायद कुछ इसी बातों में था बारहवीं करी, अब इंजीनियर बनना है क्यों मालूम नहीं, मुझे तो नहीं पता था, बाकियों का पता नहीं, अब इसका ये भी मतलब नहीं कि इंजिनीरिंग करके पछतावा कर रहा, नहीं भाई साहब जिंदगी में किये अपने किसी काम पर कोई पछतावा नहीं है, किसी को थोड़े न सिद्ध करना है हमें की हम कौन है और क्या है…!!
    खैर आगे बढ़ते है इसी इक्क्षा के साथ हम आगें बढ़े और हमारे देश के शिक्षा मंत्री के कुछ अहम फैसलों ने अंत मे जैसे तैसे सुल्तानपुर शहर में एक सरकारी इंजीनियरिंग संस्थान KNIT में जगह प्रदान की इसमें उस समय एक ही अच्छी बात लगी थी कम से कम सरकारी तो है(बाकी सपनें तो सबने बड़े बड़े ही देखें थे)।
    अब भाई साहब, झोला बोरा पैक करके बोलेरों में भरकर पहुँचे सुल्तानपुर घर से लगभग 100 किलोमीटर ही था।देखते ही लगा । अरी साला!!! कहीं ग़लत तो नहीं आ गए, चारों ओर जंगल ही जंगल लेकिन वहाँ के लोगो ने अहसास कराया बेटा एकदम सही जग़ह आये हो ।20 अगस्त 2014 दोपहर का समय- फॉर्म वाम भरकर गए वही नोटबंदी जैसी लाइन PNB में लगाकर जैसे तैसे घण्टों बाद पसीनें से तर बदर कई हज़ार रुपये घर वाले एक साथ दे दिए कि बेटा मेरा Enginner बनेगा ये वही घर वाले है जो पारले जी बिस्किट के लिए 2 रूपए भी न देते थे कभी!!
    इन्हीं बैंको के लाइन में सबसे पहला इंसान मिला जो आगें चलकर मथुरा Yogesh Sharma नाम से जाना गया, इन सब के बाद भेजा गया ओल्ड Vs चौहान साहब, मार फ़ोन वोन दौड़ाए और बोले जाओ ऊपर के पहले कमरे में यानी(VF-01).पहुँचने के बाद पहके से रह रहे भाई का नाम भी Himanshu Pratap ही निकला थोड़ा बहुत बात आगें बढ़ने ही वाली थी कि
    तभी आतंकवादियों के संगठन जैसा झुंड चिल्लाते हुए हॉस्टल में प्रवेश किया वो फर्स्ट ईयर बाहर निकल, कुछ ने तो बड़े सम्मान सूचक शब्दों के साथ बाहर निकाला, इससे पहले की कुछ समझ आता भाई बोला कपड़े पहनो और नीचे चलो, बाकी चीज़े मैं तुम्हें बाद में समझाता हूँ।
    नीचे आया तो देखा ये सब लोग अपने को कल्ट सभ्यता के लोग बताकर, ऑडिशन के लिये आये थे, चिल्ला चिल्ला के पूछ रहे क्या आता है “मैं सोचा ऐसे कौन पूछता है भाई”, दिन भर का थका हारा, न खाया न पीया, साला फॉर्मल पहनाकर टाई लगाकर और मुंडी नीचे करवा कर पूछ रहे हो क्या आता है, बोल क्या आता है- गाना, डांस, एक्टिंग, मैं सोचा भाई पानी पूछ लें चक्कर आ रहा है और वैसे भी अपने को कुछ नहीं आता, मना करने पर क्या हाल हो रहा था सबको पता था मैं भी बस बचने के लिए न्यूज़ पेपर पढ़ दिया जिससे रिजेक्ट हो सकू।
    4 घण्टों की एक जद्दो जहद ने ऐसा आलम बनाया कि उस दिन मुझे लगा “अब अपुन नहीं बचेगा”……!!!
    ख़ैर इन सबके बाद अगले दिन सुबह क्लास जाने की जानकारी के लिए Same Branch, आज़मगढ़ के ही एक मेरी ही तरह मासूम सी सकल रखने वाले Prabhat Ranjan एक बन्दे से मुलाक़ात हुई बाद में पता चला बस इसकी शक्ल ही मासूम है सिर्फ़।
    उसी दिन शाम में ही संगम नगरी से पाड़े जी के लड़के (2nd Room Partner) और दो आर्मी Background वाले लौंडो :- शायराना अंदाज़ रखने वाला बरेली के हुसैन साहब का बेटा Sahil D Hussain और अलीगढ़ के एक हरामी Neeraj Singh से भी हो चुकी थी।
    अगले दिन सुबह क्लास जाने के लिए तैयार सभी लोग:- मस्त व्हाइट शर्ट, स्मोक ग्रे पैंट और लाल टाई, बालों में तेल लगाकर उसे एकदम चिपका कर लाइन में लगकर और मुंडी नीचे करके भेड़ो की तरह चल दिये और हमें सुरक्षा प्रदान कर रहे गॉर्ड साहब (आज तक मुझे समझ में नहीं आया वो क्यों रहा करते थे जब उनके होने न होने का कोई फायदा नहीं होता था) हाथ में डंडा लिए पीछे-पीछे।
    लाइन न्यू VS पर थोड़ी देर ठहरती थी और रामानुजम होते हुए आगें।असली जंग तो रमन के सामने से PNB तक की होती थी जाते टाइम तो हम कभी कभी बच भी जाते थे लेकिन भाई साहब लौटते टाइम मानो “भूखा शेर शिकार का इंतज़ार कर रहा हो”, सर पे बैग रख कर मुंडी नीचे करके जब हमें दौड़ाया जाता था तो लगता था कि इससे अच्छा हम धावक ही बन जाते, वो हमारे महान सीनियर्स सम्मान के साथ भाग (…..) बोला न भाग सुनाई नहीं देता एक बार में (…..)|
    ये लोग हमारा बड़ा ही ध्यान रखते थे जित्ता शायद अपना ख़ुद का भी न रखते रहे होंगें….!!

    Episode – 2


    Intraction के इसी दौर में Cultural Counsil में जो बेचारे CSA जाते थे वो हॉस्टल आकर सारी चीज़ें Explain करते थे और बाकी लोगों के ज्ञान में वहाँ से बृद्धि होती थी।
    कुछ सीनियर तो साला 5 रुपये ऑटो का किराया देकर गोमती किनारे ले जाकर अपना खुद की भड़ास को जब भाड़े के रूप मे वसूलते थे न फ़िर लगता था अब आगे से अपुन को बाहर ही नहीं जाना है।
    जैसा कि मैंने पहले एपिसोड में मैंने बताया था कि सीनियर्स को हमारी बड़ी चिंता रहती थी, ये हमारे पढ़ाई लिखाई से लेकर स्वास्थ्य(BP, Sugar, Migraine, Frequency) की जानकारी भी लेते थे ये तो शुक्र मनाओ सिर्फ जानकारी ही लेते थे कहीं कॉलेज में उपकरण उपलब्ध होता तो क्वालिटी(Canteen) पर चाय पीते पीते साला वही पूरा चेकउप भी हो जाता। खैर शुक्र मनाओ इंजीनियरिंग कॉलेज था मेडिकल नहीं।
    ये लोग बड़े धार्मिक प्रवित्ति के भी होते थे पूछते थे कि कभी वेद, पुराण, कुरान, बाइबिल, कुछ पढ़ा है या कोई धार्मिक सीरियल ही देखा हो, मना करने पर तत्काल प्रभाव से शुरू करने का ज्ञान देते थे और बोलते थे सिर्फ़ थ्योरी पर ध्यान नहीं उन ज्ञान वर्धक चीज़ों को दैनिक जीवन मे इस्तेमाल भी करो(Practical is more Important than theory in B tech life.)
    बाबा ढाबा की 20 रुपये की maggi और कोल्ड ड्रिंक की लालच दे कर काफी पुण्य वाले काम भी करा लेते थे जैसे क्रिकेट ग्राउंड, बास्केट बॉल, वॉलीवोल कोर्ट सब साफ करा लेते थे और तो और साला ये निकम्मा फाइनल ईयर इत्ता असाइनमेंट लिखवाया है जित्ता हमनें अपने खुद के चार साल में नहीं लिखे। लेकिन कुछ महारथी हमारे बीच में भी ऐसे होते थे जो 50 पेज लिख कर हज़ारों का चूना लगा देते थे। ये लोग उन्हीं से सही रहते थे।
    सबसे तगड़ा Intraction तो रामानुजम कोर्ट यार्ड में “सिक्स ए साइड के मैच” के समय पहले “विक्रम जीत सर” की टेक्निकल कमेंट्री जिसका मुकाबला आज के आकाश चोपड़ा और जतिन सप्रू भी नहीं कर सकते है और उसके बाद का समय मतलब भाई I can’t Explain सिर्फ महसूस कर सकते है अगर किसी का पाला पड़ा हो तो।
    इन्हीं सबके बीच पहला Sessional आ गया अंग्रेजी में हाथ तंग तो पहले से ही था पर ऐसी बुरी हॉल होगी सोचा नहीं था ख़ैर दोष सिर्फ मेरा ही नहीं था इकोलॉजी वाली Mam का उस दिन पढ़ाने का मन तो था नहीं क्यों कि उस दिन बारिश हो गयी थी और सब लोग क्लास चले गए तो उन्होंने सबके सामने कॉपी चेक कर दी और भाई साहब इज़्ज़त का जो फालूदा हुआ, बिना पढ़े उन्होंने 00/15 दिया, किसी ज़माने में 15/15 लाने वाला लौंडा इस बार सिर्फ़ fail ही नहीं था, अपना सम्मान भी खो चुका था। और किसी लड़की के रिजेक्शन से भी कही ज्यादा इस समय अंग्रेज़ी दर्द दे रही थी।
    इन्हीं सबके साथ कहानी आगे बढ़ रही थी धीरे-धीरे लोगों को सब समझ आने लगा था सब थोड़ा स्थिरता की ओर बढ़ रहे थे।CS-IT वालों के पास एक आधुनिक किस्म का हथियार हुआ करता था जिसे लैपटॉप कहा जाता था जिसका इस्तेमाल Multipurpose होता है, इसके इस्तेमाल के अधूरे ज्ञान ने हमें प्रथम वर्ष में थोड़ी दिक्क़ते जरूर दी, लेकिन उसके बाद इसनें खासकर इन दो ब्रांच के लोगों को कभी किताबो से रूबरू होने का मौका ही नहीं दिया।बेचारे सब इत्ता पढ़ाकू थे कि जगह-जगह से सर्च करके सब सैकड़ो जीबी का Study Material एकत्रित कर रखें थे जिसमें सिर्फ एक ही सेमेस्टर का नहीं बल्कि अगले सेमेस्टर का भी पाठ्यक्रम मौजूद होता था।
    अब धीरे धीरे इन सबका क्रेज फ़ीका पड़ने लगा था और अब कुछ और Councils का आगमन हॉस्टल में आना शुरू हो चुका था जो Personlity Development की बात किया करते थे आगे देखते है कैसा रहा डेवलपमेंट…!!

    Episode -3

    Personality Development के नाम पर, अब हर कोई इसी बात का हवाला देना शुरू कर चुका था कि ज़िन्दगी में कुछ अलग करना चाहते हो तो आओ सीखो और नहीं तो चूतिया हो और चूतिया ही बने रहोगें।
    इसलिए अब ISTE, CSI, LIT, ME, IEI जैसे लोग आए “मण्डल Sir “कहते थे We are the best, “काव्यकर सर्” का सम्बन्ध ME वालों से ज्यादा था, और सबसे महत्वपूर्ण “शामद सर” की हिंदी और “योगेश सिंह सर्” की अंग्रेज़ी सुनकर ऐसा मन मोहा भले ही कुछ समझ नहीं आया हो ऐसा लगा( MaybeThis is the best). शायद इसलिए भी कि अंग्रेजी ने जो डर पैदा किया था वो और हिंदी से अपना पुराना लगाव था, यहाँ दोनों भाषाओं को साथ लेकर चल सकने का स्कोप था, बाकी जगहों के टेक्निकल चीज़ों से अपना दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था।
    लेकिन भाई साहब!!! इनकी मार्केटिंग स्किल देख कर ऐसा लगा कि अपना पोडक्ट कैसे बेचा जाता है और वही से मुझे बाद में समझ आया कि जो दिखता है वही बिकता है, बेहद ही जबरदस्त अनुभव था वो।
    अंग्रेजी के डर से मैंने अपने एक नए समुदाय की खोज भी कर ली थी यानी हिंदी मीडियम के लोगों की। जो पहले Sessional के बाद 5 लोंगो की एक समिति भी बनी और इस भयंकर रोग से निकलने के लिए हमने कई योजनाओं पर विचार विमर्श भी किया।
    लेकिन इन पिछले 3 या 4 महीनों में कॉन्फिडेंस जो हिल गया था कि अंदर से आवाज़ ही नहीं निकलती थी लगता था साला तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया है उस चार दिवारी के अंदर सब कुछ कर सकते थे लेकिन बाहर कुछ भी नहीं। हमें आज़ादी कब मिलेगी, अभिव्यक्ति की स्वन्त्रता कब मिलेगी, कब हम इन जंगलो में स्वछंद विचरण कर पायेंगे। ख़ैर ये सब का भी दौर निकला सबकी ओपिंग हो गयी, सब जग़ह जाकर अलग अलग अनुभव मिला ।
    लेकिन एक बात अग़र मंडल सर या आयुष सर् में से कोई भी मिला तो बोलूँगा सर् वो ISTE के 200 रुपये मेरे वापस कर दो निर्मल बाबा ने बताया है मेरी कृपा वही से रुकी है, शायद इसलिए मैंने स्लिप भी फ्रेम करा कर रखी है अभी तक!!
    अब बारी थी Engineering जीवन के पहले सेमेस्टर की, हर पहली चीज़ में कुछ खास बात होती ही है इसमें भी जरूर रही होंगी।
    ठीक इससे पहले 11 नवंबर 2014 को मेरा एक ऐसे डॉक्टर के साथ Appoinment हुआ जिसके दवाओं के साइड इफ़ेक्ट से मैं आज तक नहीं उबर पाया हूँ, खैर ये मामला थोड़ा व्यक्तिगत है इसकी चर्चा न करें तो बेहतर होगा😅
    और इसी महीने में 22 नवंबर को पड़ा 19वां जन्मदिन, पिछले 18 सालों में शायद कभी मुझे जन्मदिन भी न याद रहा हो, मनाने की बात तो दूर रही, लेकिन इस बार उन 18 सालों की कसर एक साथ पूरी हुई, इत्ते लात पड़े की पूरी आधारसिला हिल गयी, इसी दिन एक साथ इत्ते सुख औऱ दुख दोनों एक साथ मिलने का अद्भुत अनुभव हुआ।
    और इसी बीच हमारे साथियों ने कई आन्दोलन भी किये खाने और पानी को लेकर लेकिन शाम को जब कान के नींचे चौहान साहब ने दो तड़कता भड़कता दिया तो वही खाना पांच स्टार होटल का लगने लगा सबको।
    फिर आया दिसंबर का पहला सप्ताह और हॉस्टल में पसरा सन्नाटा, ये वहीं हॉस्टल था जिसे 1 मिनट की लाइट जाने पर VG & VF के एक दूसरे के परिवार की याद आ जाती थी। लेकिन अब यहाँ ऐसा लगा जैसे सिर्फ लाशें रहती हो…..ये खौफ था एग्जाम का………!!!

    Episode -4


    पहले वर्ष के कहानी का अंतिम पड़ाव उन सभी यादों को इन आँखों में समेटने का वक्त जिससे अब शायद कोई अछूता नहीं था।
    जैसे तैसे लोगों ने परीक्षा के भयंकर दौर से अपने आप को बाहर निकाला और शीत कालीन छुट्टियों का आनन्द लेने घर गए लेकिन उन्हें क्या मालूम था वो ख़ुशी आते ही ग़मो में परिवर्तित होने वाली है जी हाँ पहले सेमेस्टर के परिणामों में Mechnics में 50℅ से ज्यादा लोगों की बैक लगी, मेरे खुद की ब्रांच में 55 में 30 लोग fail हुये थे किंतु कोई दूबारा पेपर नहीं देना चाहता था, इसलिए सरकारी अस्पतालों जैसी लाइन लगाकर सब अपनी समस्याएं लिए मास्टर साहब के केविन पहुँचे, साहब हमको ये हो गया था, हमको ये, कुछ महिला मित्रों ने तो सीधा ब्रम्हास्त्र ही चला दिया और उनके चार छे अश्रु धाराओं ने उनकी नैय्या तुरन्त ही पार लगा दी।कुछ हम जैसे लोग खूब मलाई मक्ख़न भी लगाए (जिसे वहाँ की भाषा में कुछ और कहा जाता है), खैर बच तो हम भी गए उस दिन, लेकिन हमारे कुछ मित्र बेचारे अभी भी उबर नहीं पाए थे। और उन्हें अगले साल फिर से युद्ध में शामिल होना पड़ा।
    अगले सेमेस्टर में जापान से लौटे फिजिक्स के प्रोफ़ेसर शरण साहब की क्लास में बस इलेक्ट्रान चक्कर ही लगाता रह गया और उनकी आवाज़ पहले बेंच पर बैठें बन्दे तक भी न पहुँचती थी, लेकिन सबको तो हुसैन Ma’am से फिजिक्स और Electroincs मिश्रा Ma’am से पढ़ना था शरण साहब को भला कौन देखना और सुनना ही चाहता था।
    इसी दौर में ब्लैक स्मिति शॉप में एक महाशय भी थे जिन्होंने पूरा छः महीना “कोयला सेन्टर में करो ” इसी में गुजार दिया।
    और इसी दौर में इन सामाजिक चेतनाओं के साथ दिल्ली की राजनीति में एक नया चेहरा मफलर मैन केजरीवाल की एंट्री भी हुई थी जिसने हमारे वर्ष खत्म होते होते अपने भी संकट खत्म कर लिया था और इन भाई साहब के समर्थन में हमने बताशे भी बाटे थे ख़ैर ये तो उस समय की ही बात है।
    इन सबके बाद क्लास जानें कि परम्परा और बंक मारने की प्रथा भी शुरू हो चुकी थी जिसके लिए कभी कभी 9:30 बजे तो हॉस्टल का गेट भी बंद कर दिया जाता था, इन बंक का जायजा लेने चौहान साहब कभी कभी हॉस्टल भी आ जाते थे और इसी का शिकार एक बार शरद भाई भी हुए उनके बार बार दरवाजा खटखटाने के बाद भी दरवाज़ा न खोलने पर कहा जाना है- “कौन है बे beep beep” कहते हुए दरवाज़ा खोलना और जैसे ही दरवाज़ा खुला जब तक उन्हें कुछ समझ आता उनके कान के नींचे दो तड़कता भड़कता पड़ चुका था। और वो नई दुनिया का सैर कर रहे थे।
    इस कहानियों में NEW VS हॉस्टल कैसे अछूता रहता वहाँ भी हमारा फर्स्ट ईयर ही तो रहता था, वहाँ के लोग बड़े शौक़ीन मिज़ाज के लोग थे, उन्हें वहां के बाथरूम में नहाने में मज़ा तो आता नहीं था, उनका जुड़ाव सीधा प्रकृति से हुआ करता था और उन पानी की टंकियों से बाल्टी से पानी निकाल कर नहाना और कमरों में भी पानी डालना उन्हें इत्ता भारी पड़ेगा उन्हें इसका कोई अंदेशा नहीं था, पांडेय जी तो Main Gate बंद करके लाइट ऑफ करके जब अंदर घुसे (जैसे हिंदी बॉलीवुड में हीरो विलेन के घर मे घुस कर मेंन गेट बंद कर देता है) और एक एक के बालों में हाथ डाल डाल कर चेक किए और जिसका भी भीगा हुआ बाल पाए उन सबको चुन चुन के बहुत पेले, यहाँ तक की बात तो समझ आती है, अगले दिन जो नुकसान के नाम पर फ़ालतू हज़ारो का फाइन ठोके थे न (अपनी जेब भरने के लिए) लोगों का उसके बाद से नहाने से विश्वास ही उठ गया।
    इन तमाम कांडों के साथ यह पहला वर्ष अंतिम चरण में था और एक बार फिर दूसरा सेमेस्टर आ चुका था, पहले सेमेस्टर के झटकों से सब काफी कुछ सीख चुके थे और इस बार काफी तैयारी के साथ एग्जाम हॉल में जाने वाले थे, और वो समय भी आया और लोगों ने अपनी परीक्षाओं को खत्म करके अपने वतन वापसी करने वाले थे जिनके चेहरे पर अलग ही ख़ुशी थी, इससे भी ज्यादा ख़ुशी शायद इस बात थी की घर से लौटने के बाद हम भी सीनियर होंगे और उन तमाम ख्वाबो को अंज़ाम देने की तमन्ना लिए बैठे हुए थे, लेकिन उन्हें क्या पता था, ख़्वाब तभी तक ख़्वाब होते है जब तक आँखे बंद रहती है।
    और सबकी विदाई एक अलग अंदाज एक सम्मेलन के साथ जिसमें सबने अपने अनुभवों को साझा किया था और थोड़े से खान पान से अन्त हुआ जो IT ब्रांच का संगठन था जिसे MECHINICAL वाले ISI की तरह दूसरे संगठन की संज्ञा दिया करते थे।
    और इस प्रकार ये पूरा वर्ष जीवन की न जाने कितनी घटनाओ के साथ अपने ढ़लान को प्राप्त कर चुका था।

    पहले साल के अन्त में आते आते पहली बार कॉलेज में cultural Fest अनुभूति में लोंगो ने कुर्शी, मेज़ ,बेंच, पानी डालने से लेकर न जाने कित्ते काम किये बस इस उम्मीद में कि ये नेशनल लेवल फेस्ट है और जहाँ पर हमारे कॉलेज के लोग ही छुट्टी समझ घर निकल लेते थे, ख़ैर पहली बार फरवरी के अन्तिम सप्ताह में लोगों ने गजेंद्र वर्मा की गीतों पर अगर खूब झूमा तो बारिश ने मुमताज नसीम और दिनेश रघुवंशी की कविताओं को CSA हॉल तक सीमित कर दिया गया जहाँ हम जैसे प्रथम वर्ष के प्रताड़ित लोंगो को ही घुसने का मौका नहीं मिला, जिन्होंने न जाने कितने सपने देखे थे, कोई बाहर से ही तो संसद और राज्यसभा के तरह विशेष टिकट पाए लोगों के फ़ोन की रेकॉर्डिंग से ही काम चलाना पड़ा।
    2 लाइन्स कुछ यूँ थी- “Ghar se nikali to thi mene socha na tha itni muskil mulakat ho jayegi,kya khabar thi ki mosam badal jayegaor raste me barsat ho jayegi”….!!
    और वो लास्ट डे की dj नाईट ने पूरे साल भारतीय वेश भूसा में रहने वाले देवी देवताओं को एक दिव्य शक्तियों की प्राप्ति हुई, और सबने उसका प्रदर्शन बड़े जोर शोर से किया, परिणाम बाज़ी देवियों ने ही मारी, और ऐसे रूप देखने को मिले जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की हो। हम जैसे लोगो को अन्य समुदाय(Senoirs) ने ज्यादा आकर्षित किया, हम सब ने उस दिन सुंदरता के कुछ असली रूप देखे जिसे शास्त्रों में कामवासना कहा गया है।
    कई देवताओं को अपनी राधा के प्राप्ति का आभास भी हुआ पर उन्हें कौन बताए राधा तो कृष्ण को न मिली थी।

    इंतज़ार था अगले वर्ष किसी नवीन कहानियों और तमाम उठा पथक की।



    Happy Ending of First year 🤗

  • School Days Memories

    स्मृतियां

    यादोंकेकुछझरोखोंकेसाथ

    Part -1

    आज भी जब उन दिनों की याद आती है, तो लगता है कि वो लम्हें कितने हसीन थे।

    दिल करता है फिर से उन्हीं लम्हों, उन्हीं अधूरी गलियों, और उन्हीं शोरगुल वाले पलो में कही खो जाने को।

    जब ठीक से होश संभाला, जब से चीज़े याद रह सके ऐसी स्थिति आयी-
    आज दिमाग़ पर जोर डालते हुए याद आये उन लम्हों को एक छोटा सा रूप देने का प्रयास……!!

    सभी समस्याओ से परे, न कोई इक्क्षा, न कोई आकांक्षा, न ही कोई स्वार्थ, न किसी से बैर, न ही किसी से दोस्ती, अपनी दुनिया का मस्ताना और खुले आसमान में परिंदों की तरह उड़ने का वो दौर.

    सुबह में माँ की गालियों से जगाया जाना, दूबारा सो जाने पर पापा के आने से तुरन्त उठ बैठना और फिर दैनिक क्रिया कलापों के बाद, उन बन्द दीवारों में दिन भर के लिए कैद हो जाने के लिए अपने आप को मानसिक तौर पर तैयार करना।

    स्कूल जाने के लिए कभी मना न करना, और उसके बाद घर वालों द्वारा 1 रुपए देकर (मानो पूरी दुनिया इसी एक रुपये में मिल गयी हो।)
    एक ही बाइक पर तीन लोगों को बिठा कर घर से दूर एक विद्या मंदिर कहे जाने वाले दीवारों के बीच छोड़ आना.

    जहाँ पहुँचने के बाद जब वो बूढ़ा शेर (दुर्गविजय सिंह जी) उस तीसरे मंजिल से हाथ मे टेलीफोन लिए उतरता था तो सारा प्रांगड़ खाली हो जाया करता था।

    वही कभी देवभास्कर जी जैसे सहज व्यक्त्वि से तो कभी राजबली जी (वेस्टइंडीज निवासी-Part time Electrician) जैसे योध्वाओ से पाला भी पड़ता था।

    थोड़ा वक्त गुजरा और विभिन्न प्रकार के उपकरणों से लैश आलराउंडर हरीराम जी ने रेखागणित का ज्ञान बड़े प्रेम से दिया जो बाद में सामाजिक विज्ञान से लेकर संस्कृत जैसी विषयो तक अपनी धवस भी जमायी।

    उन 6 घंटो की अवधि में हमेशा उस मध्यावकास का इंतज़ार और वो गोलचक्कर वाले झूले और ज्यादा मन होने पर उन सरकते हुए स्लाइडर का इंतज़ार करना ही बेहद प्रिय हुआ करता था!

    गिरते उठते सीखते उन छोटे हाथ पाँव को अब लाल रंग की एवन साईकल मिल चुकी थी जो अपनी सीट को आगे की तरफ झुकाकर बस कहने को गद्दी पर बैठ कर साईकल चलाकर जाने लगा था।

    शाम में जल्दी के चक्कर में लाइन से अलग साईकल खड़ा करने पर, श्यामबिहारी का लाइन के बीच में साईकल डाल देना और शाम को वापस आकर उसे ढूँढना मेरी वाली कहाँ(साईकल कुछ और नहीं) है?

    अब वो समय भी आ गया था जब हमें बस ख़ाकी रंग के आधे पैंट से मुक्ति मिल चुकी थी अब हमें वो नीली पट्टी भी अपने कंधे पर नही लगानी थी जो कभी पैंट गिर जाने के लिए लगाई जाती थी।

    स्कूल जाना अब ज़िन्दगी का हिस्सा था, और अब जाने में कोई संकोच भी नहीं होता था, क्लास में सबसे पहले पहुँचकर पहली बेंच पर बैठने का वो जुनून, फिर चाहे सर्दी हो या गर्मी, बरसात हो या आँधी तूफान, फिर चाहे बुखार हो या कुछ और घर वालो के मना करने पर भी अब तो स्कूल रोज ही जाना था।

    इसी बीच जंगल मे एक नए प्राणी ने कदम रखा जिसे आगे चलकर उस राजगद्दी पर काबिज़ होना था नाम था राजेन्द्र सिंह जी जो कही न कही थोड़ा बहुत आधुनिकता से लैश तो थे और यहाँ पर साम्राज्य का विभाजन करके अलग अलग क्षेत्र प्रदान किया गया।

    कुछ नए आयाम सामने आना शुरू हुए और अब
    बाहर खुले मैदान में बिठाकर सबको वो घंटो भर तक ज्ञान श्लोक, सूक्तियां, दोहे, प्रार्थना करना, मुख्य समाचार मिलना शुरू हुआ। शुरू हुआ सांसद, प्रधानमंत्री का चुनाव भी जिसमें एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हुई।

    शुरू हुआ एक नया दौर स्वाध्याय और सहपाठ का साथ में संस्कृतज्ञान परीक्षा का भी और साथ ही अब इस जंग में कुछ नए योद्धाओं का आगमन भी हो गया था जो पहले से अपराजित सेनापति को हटाकर युद्ध का कार्य भार संभालना शुरू कर चुके थे।

    इन सबके बीच जयराम जी द्वारा दिया गया वो शारीरिक और नैतिकशिक्षा का ज्ञान, जिनके आँखों के कोने में वो कीचड़ हमेशा मिला करता था और ग़लती से अगर उन्होंने अगर अपनी घड़ी उतार कर मेज़ पर रख दी तो समझ लो आज तो किसी की सामत आ चुकी है।

    इन्हीं बीच क्लास छोड़कर विज्ञान मेला और सांस्कृतिक प्रश्नमंच जैसी गतिविधियों ने थोड़ा कुछ अलग करने की भी दिशा प्रदान की। भारतीय इतिहास में प्रचलित वैदिक गणित का द्वारा बड़े बड़े अंको से खेलने का सुनहरा मौका भी प्राप्त हुआ।

    ‌कहानी आ पहुँची इस सदी के सबसे खतरनाक व्यक्तित्व से रूबरू होने का जिसका नाम था देवसरण जी सुबह का नहाया भले ही न याद हो लेकिन राम और बालक के रूप नींद में भी याद होने लगे थे वरना कौन अपने कान और नाभि को दांव पर लगायेगा।

    ‌साथ ही में एक अजीबो गरीब आत्मा का भी मूक दर्शन हुआ जिसको ध्यान करते करते आँसू बहा देने की कला प्राप्त थी, रोज कॉपी के दस पन्ने भरने ही थे वरना बेवजह ही मार खाने की तैयारी हो जाती थी…..!!

    समय आया था अब अपने मन मुताबिक़ विषय का चयन(संस्कृत, कंप्यूटर, कला )कर नए युग में प्रवेश का……!!!

    Part -2

    कहानी का अगला पड़ाव,

    समाज की आधुनिकता को देखते हुए कुछ लोगों ने कंप्यूटर, पूर्वजो की सलाह पर(नम्बर ज्यादा मिलते है) उन्होंने संस्कृत और गणित से घृणा करने वालों ने कला का चयन किया।
    और उन तमाम पुरानी दोस्ती के बीच इन फ़ालतू वैकल्पिक विषयों ने दरार डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

    A1,B1,C1 के नए अंग्रेज़ी के इन अक्षरो ने अलग अलग लोगों से मुलाक़ात भी कराई,

    जिनमें से कुछ अनोखे व्यक्तित्व हुआ करते थे क्लोरोमिन्ट(Nick name- जो तब तक सूत्र सुनते थे जब तक बंदा भूल न जाये और वो मस्त हाथों पर चिपकाकर डस्टर की दनादन बौछार किया करते थे मानो बीवी का गुस्सा बच्चों पर उतार रहे हो)।
    दूसरे भाई साहब विश्वकर्मा जी के सुपुत्र(ब्लैक मैन) भौतिकी के सवाल न साल्व करने पर इत्ता कान घुमा देते थे कि जब तक लाल रंग न उत्पन्न हो जाये।
    और सबके पसंदीदा अनोखा अंदाज रखने वाले माननीय दूबे जी ohho संस्कृत के ज्ञाता(गुस्से में ये बच्चा ज्यादा भिन भिन करबा न तो एक तमाचा पड़ी ठीक होए जाबा येह नाते शांत रहा)
    सबसे शान्त अपने काम धाम से मतलब नए नए बने हॉस्टल के वार्डन राम-लक्मन जी जिसने इस गोल मटोल और पुराने पड़े इतिहास को खांगलने का काम बख़ूबी किया।
    और सबसे खतरनाक इंसान तो मस्त मौला मस्तराम जी सबकी अंग्रेजी सुधारने में लगे रहे(जिनके पास कहानियों का बेहतरीन संकलन भी होता था)।

    अगले वर्ष दसवीं को देखकर सबलोगों ने कोचिंग की तरफ भी रुख मोड़ा कुछ साथी अल्फानगर शर्मा जी की शरण मे पहुँचे तो ज्यादा लोगों ने अनुभव युक्त प्रभु श्रीराम की शरण लेने का फैसला लिया।
    प्रभु के दाएं हाथ के एक अँगुली टेढ़ी हुआ करती थी शायद इसलिए जिससे वो बच्चों के कानों में उंगली फसा कर आगे खींच सके, हाथ न पहुँचने पर डस्टर और चाक फेंककर मारने का भी उनका अभ्यास बेहतरीन था।

    नए और निर्णायक वर्ष को देखते हुए घर वालों के कहने की बस दसवीं में अच्छा कर फिर सब सेट और साथ ही नई छात्रवृति योजना (80+ तो 11th & 12th फ्री) ने लोगों को सब कुछ दांव लगाने पर मज़बूर किया।

    सुबह कपकपी ठंड में भी बस आँखे खुली रखकर सुबह 6 बजे साईकल से वहाँ पहुँचकर फिर स्कूल और वापस घर आकर वही सब घिसा-पिटा सारी समस्याएं कराधान पर आकर रुक जाती थी अगर ये सवाल बन जाएं तो समझो किला फ़तह।

    जनवरी में प्री बोर्ड का एग्जाम और फ़िर घर बैठ पढ़ने की सलाह के साथ बन्द हुआ स्कूल आने का सिलसिला-

    ज़िन्दगी ऐसे बहुत से अनुभव होते है जो पहली बार होते है तो इंसान कुछ पल के लिये सहम सा जाता है
    मार्च का महीना सेन्टर GGIC बोर्ड के एग्जाम का वो पहला दिन जहाँ न तो अपना कमरा था, न स्कूल का, न तो स्कूल की बेंच थी न ही अपने कमरे की मेज और कुर्सी, जहाँ
    एक रूम में चार चार परीक्षक थे, कलम गिरने पर भी उठा कर देने वाले लोग थे खैर वो 3 घंटा भी गुजरा और बाहर आकर उन जाने पहचाने चेहरो को देखने के बाद जान में जान आयी ।
    किंतु कुछ को कुछ विशेष चेहरों के दीदार की जरूरत थी, किंतु समाज की कुछ अवधारणानाओ ने उन्हें हमसे अलग कर रखा था।

    ये सिलसिला भी धीरे धीरे खत्म हुआ और अब समय था लगाए पेड़ से फल खाने का (30 मई दोपहर 1 बजे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सोनू कैफ़े रामनगर)

    समय बदला और कुछ इतिहास के पन्ने भी और कई नामों को एक नई पहचान और कुछ को समाचार पत्रों में जग़ह भी मिली। कुछ दिनों बाद ये हलचल भी फ़ीकी पड़ी और अब समय था एक नए तकनीकि और वैज्ञानिक युग में प्रवेश का।

    एक महीने के विराम बाद नया संकट उभरा,अब क्या मैथ्स or बायो? जहाँ मैथ्स का मतलब इंजीनियर और बायो का मतलब डॉक्टरी बता दिया गया था।

    Part -3

    कहानी अब एक नई मोड़ पर आ चुकी थी….!!

    बचपन में माँ-बाप ने जिन नन्हें पौधों को लगाया था अब वो प्रौढा अवस्था में आ चुके थे, जिनको अब इस नवीन समाज में विज्ञान एवं तकनीक के साथ खाद और पानी देना था जिससे वो मधुर फलों के साथ जंगल में उभरते नई प्रजाति(अंग्रेजी माध्यम के लोग) के लोगों के सामने सिर्फ खड़े ही नहीं अपितु अपने आप को मजबूत और अपना अस्तित्व बनाए रख सके।

    दसवीं नामक जंग में हार जीत के फैसले के बाद अपने विवेक स्वरूप सबने फ़ैसले(Maths or Bio) लिए और नए वेद और पुराण जैसे ग्रंथो के अध्ययन के लिए अपने आप को मानसिक रूप से तैयार भी।

    इधर मैं भले ही 2 कदम से सीमा रेखा पार न कर पाया हूँ किंतु प्रदर्शन सम्मानजनक समझ कर पिता जी ने अब नई बुलेट(BSA साईकल) वो भी हरे रंग की एक बार को तो लगा शायद लाल से हरा रंग मानो अपनी जिंदगी का सिग्नल भी अब ग्रीन हो गया है लेकिन वो ये नहीं बताए बेटा कुछ शहरों में कोई सिंग्नल सिस्टम नहीं है वहाँ कोई नियम और कानून नहीं।

    इस साम्राज्य के बेहतर प्रदर्शन ने दूसरे राष्ट्रों की जनता को अपने साथ होने के लिए मजबूर किया और कई नवीन सैनिकों की सेना में भर्ती हुई जो अपने यहाँ के कुशल सैनिक मानें जाते थे किंतु अगला युद्ध तो अब 2 वर्ष बाद होना था तब तक सबको अपनी अपनी धार मजबूत करनी थी।

    सैनिकों के विभिन्न क्षेत्रों के शिक्षण के लिए अब नए गुरुजनों की नियुक्ति हुई
    6 अस्त्रों से लैश अनसुलझी गणित को सुलझाने की जिम्मेदारी(और भई को दी गयी जो बाहरी अध्यापको से शिक्षा(Coaching) के धुर विरोधी थे)।

    ग्रंथो जैसी किताबों को भौतिकी पढ़ाने के लिए(गाइड मास्टर को जग़ह मिली जिनसे वो गाइड अग़र ले ली जाए तो भौतिकी का ‘भ’ भी न बोल पाए, निरीक्षक महोदय सामने बैठे हो तो हाथ पाँव भी काँपने लगते थे)।

    जिंदगी में कौन सा केमिकल लोचा कम था जो विभिन्न केमिकल अभिक्रियाओं को बताने तिवारी जी के बेटे आ गए (भाई साहब इत्ता छापाते थे कि हाथ से उंगलिया अलग हो जाये फिर भी उनको एक्स्ट्रा समय की जरूरत पड़ ही जाती थी)

    और ‘स’ को ‘फ़’ बोलने वाले गबराल प्रभु बड़े मेहनती थे वो अलग बात है साला उनकी सुनता कौन था उनके लेक्चर के दौरान नोकिया 2600 जैसे नवीनतम फ़ोन का इस्तेमाल जो एक नई दुनिया का ज्ञान बाट रहा था,हम जैसे क्रिकेट प्रेमी तो बैग में छोटा रेडियो भी रखते थे।

    दो दो रुमाल रखने वाले छोटे सिंह साहब(सुअर कही के) जिन्हें अगले वर्ष ही गद्दी संभालने का मौका भी मिला, साहित्य से लाबालब भरे रहते थे।

    और इन सभी के साथ अब नया नया उभरता वयस्क लड़ाई, इश्क़, अन्य तमाम काम करना भी शुरू कर चुका था, हॉस्टल सुविधा से अन्य क्रिया कलापों को काफी मदद भी मिलने लगी थी।

    इन सब बीच और हम जैसे कुछ लोग बिना पैर ज़मीन पर रखे, बिना ब्रेक लगाए घर तक साईकल रेसिंग की प्रतिस्पर्धा भी किया करते थे।

    राजनैतिक परिपेक्ष में इस साम्राज्य(JBIC) में कुछ हलचले हुई और वहाँ का राजा(RS) अब उपनिवेशवाद(English medium) की ओर आकर्षित हुआ और गद्दी त्याग दी और आनन फानन में वहाँ के प्रधानमंत्री(Manager) ने वहाँ के सेनानायक(SS) को ही गद्दी दे दी जिसका दुष्परिणाम सामने ही था, लोग निरंकुश हो गए।

    और इस प्रजा ने सभाओं में सू सू ,हो हो, भरे मैदान में पटाखो को जलाना, दिनदहाड़े दूसरों की खाद्य सामग्री निकाल कर खाने जैसे न जाने कित्ते गुनाहों को अंजाम दिया। नए नए कप्यूटर पढ़ाने आये तिवारी साहब को तो एक मार मार नारा ही रास्ता बदलने पर मज़बूर कर दिया ।

    और इन्हीं परिस्थितियों में एक फ़िर जंग का सामना हुआ और इस बार युद्ध स्थल फत्तेपुर का वो मैदान था जहाँ से लड़ाई करके पाँच मिनट में वायु के वेग से लौटेते हुए सबको अपने अपने निजी व्यक्तिगत चाँद का दीदार करना भी होता था।

    और इस जंग का परिणाम इत्ता भयंकर रहा कि सभी लोग न जाने इन हवा की वादियों में कहाँ खो गए।

    मानो जिंदगी की ज़िम्मेदारी, उनके व्यक्तिगत संघर्षो ने उन्हें कहीं दबा दिया हो।
    और अब तक उस सभ्यता और संस्कृति के लोगों को उनके एकसाथ उसी जोश और पागलपन के साथ नहीं देखा जा सका है।

    “वो भी एक दौर था ये भी एक दौर है”…..कि पंक्तियों के साथ अपने इस संस्करण को यही समाप्त करता हूँ।
    शायद आज भी सबको वो दिन, वो लम्हें याद है लेकिन वक़्त की इस करवट ने उन्हें ऐसे मोड़ पर आने के लिए मजबूर कर दिया है।

    शुक्रिया सभी का इस खूबसूरत ज़िन्दगी का हिस्सा होने के लिए।😊

    Disclaimer- there are lots of grammatical errors plz avoid 🙏

    Disclaimer – कहानी का प्रस्तुतिकरण संक्षेप में।
    इस्तेमाल किये व्यंग सिर्फ यादों को ताज़ा करने के लिए किसी को ठेस पहुचाना नहीं , किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा याचना🙏

  • Thanks for joining me!

    Good company in a journey makes the way seem shorter. — Izaak Walton

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