बिखरी डायरी

Expression of thoughts, Life Experiences, Book Reviews, Analysis and Most importantly a balance between personal life and professional life.

किसी को वास्तव में जानने के लिए
ख़ुद को भूलना पड़ता है।
क्योंकि जब तक ‘मैं’ बचा रहता है,
तब तक सामने वाला
पूरा दिखाई ही नहीं देता।
और यह जानना, यह समझना,
किसी तर्क से नहीं,
ठहराव से आता है
उस ठहराव से,
जहाँ मन भागना छोड़ देता है
और आत्मा सुनने लगती है।
इतना लीन होना एक-दूसरे में
कि यह भी याद न रहे
कि हम दो हैं
कब एक-दूसरे से होकर गुज़र गए,
और कब एक-दूसरे में समा गए,
इसका हिसाब भी न बचे।
यही वह क्षण है
जहाँ संबंध अनुभव बन जाता है,
परिभाषा नहीं।
ऐसे में शारीरिक संबंध भी
केवल देह का उत्सव नहीं रहते,
वे आत्मा के संवाद का
स्वाभाविक विस्तार बन जाते हैं।
आत्मिक निकटता के बिना
देह का स्पर्श अधूरा ही रहता है
वह छूता तो है,
पर पहुँचता नहीं।
जब साँसों की लय
पहले ही एक हो चुकी हो,
जब उपस्थिति मात्र से
मन शांत हो जाता हो,
तभी देह भी
किसी साधना की तरह खुलती है
जहाँ भोग नहीं,
समर्पण प्रधान होता है।
इसलिए सच्चा मिलन
पहले आत्मा में घटता है,
फिर देह में उतरता है।
और जो संबंध इस क्रम को समझ ले,
उसके लिए प्रेम
सिर्फ़ चाह नहीं रह जाता,
वह चेतना का विस्तार बन जाता है।

उस क्षण में
जब आँखें अपने आप बंद हो जाती हैं,
तो देखने का काम
स्पर्श संभाल लेता है।
गर्दन के पास ठहरता हुआ स्पर्श
किसी आम चाह से नहीं,
किसी गहरे अपनत्व से जन्म लेता है
जैसे कोई परिचित धुन
बहुत पास आकर
धीमे से याद दिला दे
कि तुम सुरक्षित हो।
देह के उभार और वक्र
यहाँ आकर्षण का विषय नहीं रहते,
वे तो केवल
उस लय के पड़ाव बन जाते हैं
जहाँ ठहरकर
साँसें एक-दूसरे को पहचानती हैं।
हाथ जब वहाँ टिकते हैं,
तो वे लेने नहीं,
सुनने लगते हैं
देह की उस भाषा को
जो शब्दों से बहुत पुरानी है।
फिर एक खेल-सा आरंभ होता है,
पर वह खेल भी
किसी जीत या अधिकार का नहीं,
दो चेतनाओं के
एक-दूसरे में उतरते जाने का होता है।
साँसों की गति
धीरे-धीरे एक संगीत बन जाती है
कभी तेज़, कभी मंद,
जैसे कोई अदृश्य बाँसुरी
पूरा वातावरण भर रही हो।
और उस लय के साथ
मानो कोई सुगंध फैल जाती है
ऐसी, जो फूलों से नहीं,
दो शरीर-आत्माओं के
एक होने से जन्म लेती है।
उस सुगंध में
दोनों अपने-अपने नाम,
अपनी सीमाएँ,
यहाँ तक कि अपना अलग होना भी
कुछ देर के लिए भूल जाते हैं।
जब मिलन और गहराता है,
तो वह क्रिया नहीं रह जाता,
वह एक अवस्था बन जाता है
जहाँ कुछ किया नहीं जाता,
सब कुछ घटित होता है।
दो शक्तियाँ
अपने-अपने केंद्र छोड़कर
एक ही अनुभूति में विलीन हो जाती हैं,
जैसे दो लौ
मिलकर एक ही प्रकाश बन जाएँ।
उस क्षण में
न शरीर प्रमुख होता है,
न इच्छा
केवल एक गहरा, शांत उन्माद होता है,
जो थकाता नहीं,
बल्कि भीतर तक विश्राम दे जाता है।
और जब सब थम जाता है,
तो शांति बचती है,
जैसे किसी लम्बे संगीत के बाद
अंतिम स्वर भी
हवा में देर तक
कंपन बनकर ठहरा रहता है।
यही वह मिलन है
जहाँ देह साधन बनती है,
और आत्मा अर्थ।
जहाँ प्रेम
केवल महसूस नहीं किया जाता,
जिया जाता है।

© Himanshusudha

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