दोस्तों! मेरा नाम है हिमांशु सुधा, कहानियां सुनाता हूँ!(Nilesh Mishra Style )
कहानी संख्या:- 1
गर्मी के मौसम का वह अंतहीन सा दिन धीरे-धीरे शाम में ढल रहा था। हवा सूखकर खुरदुरी हो चुकी थी, जैसे किसी ने प्रकृति के गले में धूल भर दी हो। सूरज, जो पूरे दिन अपने ताप के अहंकार में जलता रहा था, अब क्षितिज पर उतरते हुए अपनी पराजय स्वीकार कर रहा था। पराजित सूरज की उस धुंधली-सी रोशनी में शहर एक अजीब-सी चुप्पी ओढ़े खड़ा था एक ऐसी चुप्पी, जो बाहर से ज़्यादा भीतर सुनाई देती है।
मन में भी ठीक ऐसा ही कोई निर्जन प्रदेश उग आया था। विचारों की परतें, थकान की परछाइयाँ और न बोली गई बातों की टीस… सब मिलकर मन को एक अंतहीन रेगिस्तान बना चुकी थीं। ऐसा लगता था जैसे कल्पनाएँ भी पसीने की तरह सूख गई हों और भावनाएँ भी गर्मी की तरह थक चुकी हों।
उसी सूनेपन के बीच, अचानक एक ठंडी लहर चली एक ऐसी हवा, जो मौसम के नियमों जैसी नहीं थी। वह हवा किसी प्राकृतिक घटना की तरह नहीं, किसी उपस्थिति की तरह महसूस हुई धीमी, गहरी और भीतर उतर जाने वाली।
और फिर, वह आई।
किसी किताब में लिखे सत्य की तरह नहीं;
किसी प्रार्थना की तरह नहीं;
बल्कि किसी पुराने स्मृति के पुनर्जन्म की तरह।
जैसे आकाश की अनंत ऊँचाई से एक सर्द धुन धरती पर गिर पड़ी हो, और वह धुन मेरे भीतर जगह बनाती चली गई। उसकी उपस्थिति जितनी कोमल थी, उतनी ही अचूक संवेदनाओं पर बिना अनुमति कब्ज़ा करती हुई। एक अनकही शीतलता थी उसमें, जो स्पर्श न करते हुए भी छू जाती थी। उसकी मुस्कान में किसी अधूरी कविता की मिठास थी, और उसकी सादगी में किसी पुराने सत्य की ईमानदारी।
उसी क्षण, मन के भीतर फैला हुआ शोर धीमा होने लगा मानो वर्षों बाद कोई हाथ भीतर रखी हुई रेत को थामने के लिए आगे आया हो।
उससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, यह अनुभूति पनपने लगी कि जैसे लम्बे समय से बिछड़ा कोई अपना, मौन की पगडंडी से चलकर फिर लौट आया हो। जैसे लंबे इंतज़ार की घड़ी अब अपने अंतिम चक्र में हो थकी, पर राहत देती हुई।
उस शाम की ठंडी हवा, जो पहली बारिश का संकेत देती है, इस बार आँसुओं का परिचय भी बनी।
लेकिन वे आँसू पुराने आँसुओं से अलग थे।
वे हार की भाषा में नहीं, मुक्त होने की भाषा में गिर रहे थे।
उनमें पीड़ा की कठोरता नहीं थी; उनमें एक तरह की पारदर्शिता थी जैसे मन का बोझ पिघलकर तरल हो रहा हो। गालों तक पहुँचते-पहुँचते वे आँसू किसी मृत अंत की तरह नहीं गिरते थे; उनमें दिशा थी, एक धीमी-सी यात्रा, जैसे वे किसी और जगह पहुँचकर अर्थ बन जाना चाहते हों।
और फिर, उसकी उंगलियों का स्पर्श…..
इतना हल्का जैसे हवा ने उधार लिया हो;
और इतना गहरा कि मन ने उसे हमेशा के लिए रख लिया।
वह स्पर्श किसी उपचार जैसा था
जैसे शरीर के पसीने को सुखाती हुई सर्द हवा आत्मा की थकान को भी शांत कर सकती है।
जैसे किसी के कोमल आगोश में समा जाने भर से, भीतर के रेगिस्तान में पहली बूंद गिर सकती है।
गर्मी जब अंत की ओर होती है, और हवा में पहली बारिश की आहट घुलती है, तभी मौसम बदलता है। यह परिवर्तन प्रकृति का नहीं, मन का भी होता है। मन उसी पल समझता है कि राहत का आना हमेशा किसी बड़े शोर के साथ नहीं होता कभी-कभी इसका स्वर इतना धीमा होता है कि सिर्फ वही सुन सकता है जो लंबे समय तक अकेला रहा हो।
शायद मैं भी ऐसे ही अकेलेपन के लंबे मार्ग पर चल रहा था विचारों की भीड़ में घिरा, फिर भी भीतर से सूना। और ठीक उसी थकान के मध्य वह आई पहली बारिश की बूंद की तरह, जो सूखी मिट्टी को भिगोने नहीं, बल्कि उसे नया अर्थ देने उतरती है।
उसी अनुभूति, उसी परिवर्तन और उसी अदृश्य राहत की कहानी है यह।
यह कहानी किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस क्षण की है
जो जीवन में बहुत कम आता है,
और जब आता है, तो एक थके हुए दिल की समूची दुनिया बदल देता है।
©Himsudha
बिखरी डायरी
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