बिखरी डायरी

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उस शाम भीड़ में उसका अचानक दिखाई देना किसी साधारण संयोग की तरह नहीं था; वह अधिक किसी रहस्य की अनकही परत जैसा था, जिसे समय ने तीन वर्षों तक अपने भीतर छुपाकर रखा हो और ठीक उसी क्षण अनायास खोल दिया हो, जब मन सबसे कम तैयार हो। उम्र के साथ उसके चेहरे पर चमक नहीं बढ़ी थी बल्कि वह किसी पुराने रहस्य की तरह और गहरी, और सम्मोहक हो गई थी, जैसे अच्छी तरह छुपा हुआ नशा अचानक अपना असर दिखा दे।

मैं वहीं ठिठक गया।
आंखें जैसे किसी अदृश्य शक्ति से थाम ली गईं।
भीड़ की आवाजें धीमी होकर एक सुरहीन गूँज में बदल गईं।
सामने खड़ी वह एक चेहरा नहीं, बल्कि किसी भूले हुए संसार का द्वार थी जहाँ मेरे ही भटके हुए वर्षों की प्रतिध्वनियाँ घूम रही थीं।

उस पल ऐसा लगा जैसे समय की दिशा उलट रही हो।
जैसे मैं वर्तमान में नहीं, बल्कि किसी समानांतर जगत में खड़ा हूँ जहाँ स्मृति और यथार्थ एक ही क्षण में एक-दूसरे के भीतर समा जाते हैं।

मेरी हृदयगति ने अस्वाभाविक उछाल लिया। शरीर अपनी ही धड़कनों को समझ नहीं पा रहा था और मन किसी आध्यात्मिक कंपन्न की तरह कांपने लगा था। तीन वर्षों की दूरी एक झटके में इतने पास आकर खड़ी हो गई थी कि लगा शायद वे कभी बीते ही नहीं थे; उनका बहना शायद एक भ्रम था, और वह भ्रम अब टूट रहा था।

उसकी आँखों में एक गहरी स्थिरता थी ऐसी स्थिरता, जो वक्त से नहीं, किसी छुपे हुए अनुभव से जन्म लेती है। और उसी स्थिरता में एक क्षणिक कंपन भी था, जो मुझे कह रहा था कि यह मिलना अनायास नहीं है। इसके पीछे कोई राज़ है कोई अदृश्य खिंचाव, जो हम दोनों को बिना बताए इस भीड़ में एक-दूसरे के सामने ले आया है।

मैंने महसूस किया कि भीतर कोई द्वंद उठ रहा है।
न शब्दों का, न तर्कों का—
बल्कि अस्तित्व का।

ऐसा लगा जैसे मेरे भीतर कोई प्राचीन यायावर बैठा हो, जो वर्षों से किसी संकेत की प्रतीक्षा कर रहा था। और यह क्षण यह अचानक का मिलन उसी संकेत की तरह सामने उभरा हो: अचरज से भरा, असमझ, परंतु अत्यंत परिचित।

उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी, पर उसमें इस बार कोई अनकहा बोझ भी था जैसे किसी ने जीवन के रहस्यों को फुसफुसाकर उसे सौंप दिया हो और उसने उन्हें चुपचाप स्वीकार लिया हो। और मैं… मैं उन रहस्यों की सुगंध को दूर से ही महसूस कर पा रहा था।

उसके पास पहुँचते हुए मुझे लगा कि शायद यह कोई वास्तविक दृश्य नहीं है, बल्कि मेरे भीतर की कोई अनुभूति बाहर आकार ले रही है। पांव ज़मीन पर थे, पर मन किसी और आयाम में। यह मिलना किसी सामान्य मानवीय अनुभूति के दायरे में नहीं आता था। इसमें कुछ अतिरिक्‍त था कुछ ऐसा, जिसे भाषा पकड़ नहीं सकती।

वह पास थी, फिर भी पहुँच से बाहर।
जैसे धुंध में उकेरी गई कोई आकृति कोमल, गहन, और क्षणभंगुर।
उसकी उपस्थिति एक नज़र में एक अनुभूति थी और दूसरी नज़र में रहस्य का गहरा साया।

वक्त कुछ क्षण के लिए स्थिर हो गया था।
जैसे दुनिया अपनी चकरी रोककर केवल हम दोनों के लिए एक छोटा-सा मंच बना रही हो, जिस पर एक दृश्य बिना किसी संवाद के, सिर्फ़ अनुभूतियों में लिखा जा रहा था।

और फिर उतना ही सरल, उतना ही रहस्यमय, वह क्षण टूट गया।
उसने हल्के से मुस्कुराया ऐसा लगा मानो वह मुस्कान किसी अनकहे अध्याय की अंतिम पंक्ति हो।
एक पंक्ति जिसे पढ़कर मन थोड़ी देर तक ठहरा रहता है, पर आगे बढ़ना सीख लेता है।

वह भीड़ में विलीन होने लगी।
और मैं उसी स्थान पर ठहरा रहा जैसे किसी अद्भुत घटना का शेष कंपन अभी भी शरीर के भीतर गूँज रहा हो।

तभी भीतर एक गहरी समझ उतरी
कि यह घटना किसी वापसी का वादा नहीं थी,
किसी प्रेम की पुनःस्थापना नहीं,
किसी पुनर्मिलन का प्रारंभ भी नहीं।

यह बस एक ठहराव था।
एक अदृश्य विराम जहाँ जीवन ने मुझे क्षण भर के लिए रोककर यह एहसास कराया

कि कुछ लोग हमारी यात्रा की मंज़िल नहीं होते।
वे केवल इतना करने आते हैं कि हम अपने भीतर छिपे धूल-धूसरित भावों को झाड़ सकें,
अपनी अधूरी स्मृतियों को एक आकार दे सकें,
और फिर उसी शांत स्वीकार के साथ आगे बढ़ सकें
जिसके बिना यात्रा कभी पूर्ण नहीं होती।

उसका मिलना किसी अध्याय की वापसी नहीं था वह केवल यह बताने आया था कि मेरा रास्ता कहीं और है…
और वह?
वह मेरी कहानी की मंज़िल नहीं,
बल्कि उस कहानी में रखा गया एक बेहद रहस्यमय, बेहद खूबसूरत ठहराव था।

एक ऐसा ठहराव जो जीवन को तो नहीं बदलता पर मन की गति को एक पल के लिए अवश्य रोक देता है।

©Himsudha

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