कई बार कोई मकान इसलिए खड़ा नहीं रहता कि उसके सारे स्तंभ मजबूत थे, बल्कि इसलिए कि एक ही स्तंभ अपनी क्षमता से अधिक बोझ उठा रहा था। हम भूल जाते हैं कि दृढ़ता हमेशा समान रूप से वितरित नहीं होती, कहीं न कहीं कोई एक तत्व चुपचाप, अकेले, पूरे ढांचे का भार संभाल रहा होता है। और जब वह एक स्तंभ थककर टूट जाता है, तब हमें पहली बार समझ आता है कि स्थायित्व एक भ्रम था, संतुलन एक धारणा, और गिरना एक अनिवार्य सत्य।
टूटन सिर्फ़ संरचना को नहीं तोड़ती, वह हमारे भीतर बसे प्रतिमानों को भी ध्वस्त कर देती है।
फिर कोई कमरा पुराना कमरा नहीं रहता
दीवारें केवल दीवारें नहीं रह जातीं,
वे स्मृतियों की राख ढोने वाले पात्र बन जाती हैं।
प्रकाश वही होता है, पर अर्थ बदल जाता है;
हवा वही चलती है, पर स्पर्श अपरिचित हो जाता है।
हम महसूस करते हैं कि असल में टूटता घर नहीं,
हमारे भीतर की किसी गहरी व्याख्या का अंतिम सूत्र होता है।
और फिर, शुरूआत का विचार भी एक तपस्या जैसा हो जाता है।
फिर से आरंभ करना
यही वह प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य अपनी ही परतों का परीक्षण करता है:
क्या छोड़ना है?
क्या साथ रखना है?
और कौन-सा कठोर सत्य अब उसके भीतर स्थायी रहेगा?
क्योंकि पुनर्निर्माण सिर्फ़ निर्माण नहीं है
यह एक स्वीकार है कि पहले जो था,
वह अपरिवर्तनीय रूप से बदल चुका है।
और जीवन का दर्शन यही बताता है कि
जो वैसा कभी नहीं लौट सकता,
उसे लौटाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए;
बल्कि उस रिक्ति में एक नई संभावना ढूँढनी चाहिए।
कई बार सबसे बड़ा वेदांत यही है
कि मनुष्य अपने ही ढहे हुए मकान की पहली ईंट
पूरी जागरूकता से, बिना भ्रम के रख दे।
क्योंकि सत्य यह है
गिरने के बाद ही हम वास्तविक आकार ग्रहण करते हैं,
और जो आकार टूटन के बाद बनता है,
वह पहले से अधिक वास्तविक, अधिक सच, और अधिक अपना होता है।
© Himsudha

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