बिखरी डायरी

Expression of thoughts, Life Experiences, Book Reviews, Analysis and Most importantly a balance between personal life and professional life.



वह हमेशा से कुछ ऐसे रहा,
जैसे कोई भीतर ही भीतर एक सौम्य सा गुलाब लिए घूमता हो
एक ऐसा गुलाब, जिसकी पंखुड़ियाँ उसके स्वभाव में,
और जिसकी सुगंध उसके शब्दों और व्यवहार में समाई हो।
लोग उसे देखते तो बस मुस्कुराते,
जैसे किसी अनकहे सौंदर्य से अचानक सामना हो गया हो।

लेकिन उसकी सुंदरता, उसकी सरलता, उसकी महक
यह सब उतना ही टिकता है
जितना किसी गुलाब का टिकता है,
जब तक वह अपने अस्तित्व से जुड़ा रहे।
जीवन की तीखी उँगलियाँ जब उसे बार-बार
उसकी जड़ से तोड़ती हैं,
तो उसकी भीतर की पंखुड़ियाँ भी धीमे-धीमे
अपनी चमक और अपनी जीवन-ऊर्जा खोने लगती हैं।

कई लोग उसे देखते हैं और कहते हैं,
“तुम तो हमेशा खुशबू फैलाते हो,”
पर वे यह नहीं देख पाते
कि वह खुशबू अब कितनी थकी हुई है।
वह हर दिन अपनी सरलता को संभालता है,
जैसे कोई मुरझाने लगी पंखुड़ियों को हाथों में लेकर
उन्हें फिर से हवा देने की कोशिश करता हो।

सच्चाई यह है कि वह व्यक्ति बहुत ज्यादा टूट चुका है।
हर अनुभव, हर छल, हर अत्यधिक उम्मीद
उसकी एक-एक पंखुड़ी को थोड़ा-थोड़ा छील ले गई है।
वह लोगों के बीच आज भी महकने की कोशिश करता है,
पर भीतर उसे मालूम है
कि उसकी खुशबू अब उतनी प्रफुल्लित नहीं रही।

कभी-कभी उसे लगता है
कि वह भी उसी गुलाब जैसा है
जो बहुत बार तोड़ा जा चुका है।
इतनी बार कि अब वह फिर से खिलना भी चाहे
तो उसके भीतर डर सबसे पहले उग आता है
डर कि इस बार भी शायद
उसका अस्तित्व, उसकी कोमलता, उसकी सुगंध
किसी अचानक आई कठोरता से कुचल दी जाएगी।

और इसीलिए, वह अब थक गया है।
अपनी पंखुड़ियों को बचाते-बचाते,
अपनी सुगंध को बाँटते-बाँटते,
और अपनी कोमलता को साबित करते-करते।
अब उसके भीतर एक अजीब-सी इच्छा जन्म ले रही है
कि शायद उसे थोड़ा-सा मुरझा जाना चाहिए,
थोड़ा-सा खुद में लौट जाना चाहिए।

परंतु उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं होती।
क्योंकि जैसे किसी गुलाब की जड़ में
एक मौन-सी जिद छिपी रहती है
फिर से खिलने की,
फिर से महकने की,
फिर से खुद को पहचानने की
वैसी ही जिद उसके भीतर भी अब भी बाकी है।

हो सकता है आज वह थका हुआ हो,
आज उसके रंग फीके हों,
पर किसी अनजाने मौसम में
जब हल्की-सी धूप और थोड़ी-सी सही हवा मिलेगी,
तब वह व्यक्ति
अपने भीतर छिपी उसी जड़ों की ताकत से
एक नई महक के साथ फिर से उगेगा।

और तब उसकी खुशबू
पहले से कहीं ज्यादा गहरी होगी
क्योंकि उसने हर टूटन, हर मुरझाहट को
अपने भीतर अनुभव की तरह संजो लिया होगा।

©HimSudha

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