सही जगह पर न बोलते हुए ख़ामोश रह जाना,
कई बार गुनाह करने से भी अधिक ख़तरनाक होता है।
क्योंकि जहाँ अन्याय के सामने मौन ओढ़ लिया जाता है,
वहाँ सच की आवाज़ दम तोड़ देती है।
इज़्ज़त, नैतिकता की चादर और तमाम झूठे वादों के आड़ में हम अक्सर अपने भीतर की कुंठाओं को पालते रहते हैं।
यह कुंठा धीरे-धीरे विचारों को विकृत कर देती है,
और यही विकृत मानसिकता केवल व्यक्ति के ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज के पतन का कारण बनती है।
मौन तब तक गुण है, जब तक वह विवेक से जन्म ले;
पर जब वह भय, स्वार्थ या सुविधा की उपज बन जाए, तो वही मौन एक गहरी साज़िश में बदल जाता है।
ऐसी चुप्पी से न तो चरित्र बचता है, न चेतना।
जब लोग बोलना छोड़ देते हैं,
तो सत्ता और असत्य बोलने लगते हैं।
और जब सच कहने वालों की आवाज़ें दबा दी जाती हैं, तो झूठ को सच बनने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता।
इसलिए आवश्यक है कि हम अपने भीतर की निष्ठा को जगाए रखें,
सही समय पर सही बात कहने का साहस बनाए रखें।
क्योंकि खामोश रहकर हम केवल अपने शब्द नहीं खोते, बल्कि धीरे-धीरे अपनी आत्मा भी खो देते हैं।
ख़ुद के सही होने/ग़लत होने का प्रमाण सिर्फ़ स्वयं के पास होता है, सच्चाई आँखें बयाँ करती हैं उसे किसी व्यक्ति/समाज द्वारा पुष्टि की आवश्यकता नहीं होती है।
©Himsudha

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