सामाजिक प्राणी के तौर पर किसी भी व्यक्ति की पहचान केवल उसकी उपलब्धियों या ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, आचरण और अन्य मानवीय गुणों से होती है।
मनुष्य का आचरण उसके ज्ञान और चेतना के स्तर को स्पष्ट करता है। सामान्यतः यह देखा जाता है कि जिस व्यक्ति के पास वास्तविक ज्ञान/जानकारी होता है, वह अत्यंत विनम्र होता है। इसका कारण यह है कि ज्ञान व्यक्ति को यह समझने की क्षमता प्रदान करता है कि संसार कितना व्यापक है और उसकी स्वयं की जानकारी उस व्यापकता की तुलना में कितनी सीमित है। यह अनुभूति ही उसे विनम्र और सरल बनाती है।
जब कोई व्यक्ति ज्ञान के साथ-साथ विनम्रता को धारण करता है, तो वह समाज में कई बार आदर और प्रशंसा का पात्र बनने लगता है। किंतु अनेक बार प्रशंसा मिलने पर वह असहज महसूस करने लगता है।
इसका कारण शायद यही होता है कि वह व्यक्ति स्वयं को प्रशंसा से परे रखना चाहता है। उसे भय रहता है कि कहीं अत्यधिक प्रशंसा या आदर उसे अहंकार की ओर न ले जाए।
वास्तविक ज्ञानयुक्त प्राणी को यह अनुमान रहता है कि अहंकार कहीं न कहीं विनम्रता को नष्ट कर देता है और विनम्रता के बिना ज्ञान अधूरा हो जाता है। इसलिए वह व्यक्ति भीतर से निरंतर सजग रहता है कि उसकी विनम्रता कहीं प्रशंसा की चमक में धूमिल न पड़ जाए।
इसके विपरीत जिन व्यक्तियों के पास ज्ञान का अभाव होता है/जानकारी सीमित होती है, वे अक्सर अति-उत्साही हो जाते हैं। थोड़ी-सी जानकारी के आधार पर ही वे स्वयं को विद्वान मानने लगते हैं/दिखने का प्रयास करते हैं और कई बार कुतर्क का सहारा लेकर अपनी बात सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।
ज्ञान और विनम्रता का संबंध अभिन्न है। बुद्धिशील प्राणी सदैव विनम्र रहने का प्रयास करता है और प्रशंसा से दूर रहकर अपने आत्म-संयम की रक्षा करने का भी।
विनम्रता ही ज्ञान का सबसे बड़ा आभूषण है। जिस व्यक्ति में यह गुण विद्यमान है, वह स्वयं को निरंतर सुधारते हुए दूसरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है और समाज में कुछ अमूल्य योगदान दे सकता है।
वर्तमान समय में यह प्रवृत्ति तेजी से देखने को मिल रही है कि हर व्यक्ति केवल अपनी बात कहना चाहता है, परंतु सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। धैर्य की यह कमी विशेष रूप से उन लोगों में अधिक दिखाई देती है जिनके पास पर्याप्त जानकारी या समझ का अभाव होता है। ऐसे बुद्धिहीन या सतही सोच वाले प्राणियों से बहस करने के बजाय विवेकशील व्यक्ति प्रायः मौन रहना उचित समझते हैं।
मौन रहना कई बार व्यक्तिगत स्तर पर बुद्धिमत्ता और संयम का प्रतीक माना जा सकता है, किंतु जब यह प्रवृत्ति समाज में व्यापक हो जाती है तो इसके दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। विवेकशील लोगों की चुप्पी ही धीरे-धीरे अज्ञानियों और कुतर्कियों के बोलबाले का कारण बनने लगती हैं।
ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि समाज के शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग समय रहते आगे आए और आवश्यकता पड़ने पर स्पष्ट रूप से सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का साहस दिखाएँ।
यही रवैया ही समाज को संतुलित, जागरूक और स्वस्थ बनाए रखने में मददगार हो सकता है।
©himsudha

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