हम अपनी प्रेमिका से उतना ही प्यार करते हैं जितना दोस्तों से,
शायद दोस्तों से अधिक ही। लेकिन यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि दोनों रिश्तों का आधार और उन्हें निभाने का तरीका अलग होता है।
गर्लफ्रेंड/प्रेमिका के साथ का रिश्ता संवेदनाओं, जिम्मेदारियों और भावनाओं का अधिक गहन रूप होता है,
जबकि दोस्तों के साथ का रिश्ता सहजता, खुलेपन और अपनापन लिए हुए चलता है।
जीवन में दोनों ही रिश्तों की ज़रूरत अलग-अलग तरह से होती है,
इसीलिए किसी एक के लिए दूसरे को छोड़ देना या नज़रअंदाज़ कर देना
कभी भी सही नहीं हो सकता,
दोस्त और प्रेमी दोनों ही हमारे जीवन को सहारा देते हैं,
हमें ऊर्जा और संतुलन प्रदान करते हैं।
दोनों की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ही जीवन के लिए अनिवार्य हैं।
जीवन की पूर्णता इन्हीं रिश्तों के सामंजस्य से संभव हो सकती है।
आजकल अक्सर यह बहस छिड़ी रहती है कि
“एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते।”
मैं इस बात को नहीं मानता।
दोस्ती का कोई धर्म, जाति या लिंग नहीं होता।
यह केवल विश्वास, भावनाओं और पारदर्शिता पर टिकी होती है।
हाँ, इतना ज़रूर है कि यदि आप किसी को दोस्त मानते हैं
तो उसे उसी नज़र से देखना पड़ेगा।
अगर दोस्ती के भीतर छिपकर कोई और भावना
विशेषकर आकर्षण या वासनात्मक विचार आने लगे,
तो फिर वह दोस्ती नहीं रह जाती,
बल्कि रिश्ते का रूप बदल जाता है।
सच्ची दोस्ती की पहचान यही है कि
उसमें न कोई स्वार्थ हो,
न कोई छुपा एजेंडा।
वहाँ केवल अपनापन हो,
विश्वास हो,
और जीवन के हर सुख-दुख में साथ निभाने की मंशा।
असल में, रिश्तों की खूबसूरती इसी में है
कि वे अपने-अपने दायरे और महत्व में स्वीकारे जाएँ।
दोस्त और प्रेमी दोनों की ज़रूरतें अलग-अलग हैं,
लेकिन जीवन में दोनों का होना हमें संतुलन प्रदान करता है।
जैसे शरीर और आत्मा, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं,
वैसे ही दोस्ती और प्रेम भी जीवन की यात्रा के पूरक हैं।
इन बातों को जितना बेहतर हम समझ पाएंगे,
हमारा जीवन उतना ही सहज और सुंदर होगा।
ज्ञान तभी सार्थक होता है जब वह
जीवन के अनुभवों और रिश्तों के समन्वय से जुड़ जाए।
मनुष्य तभी संपूर्णता की ओर बढ़ सकता है
जब वह रिश्तों को समझे, निभाए और संतुलन बनाए।
अन्यथा जीवन कूपमंडूकता
अर्थात संकीर्णता और सीमित सोच की स्थिति में ही रह जाएगा।
रिश्तों का असली अर्थ केवल नाम देने या बहस करने में नहीं,
बल्कि उन्हें सच्चाई, ईमानदारी और संतुलन के साथ जीने और निभानें में है।
यही समझ इंसान को परिपक्व बनाती है,
और उसका जीवन संपूर्णता की ओर अग्रसर करती है।
©himsudha

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