बिखरी डायरी

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हर व्यक्ति का अपना संघर्ष होता है जो कभी तुलनात्मक नहीं हो सकता। संघर्ष करना भी बहुत जरूरी है आपको जीवन का एक नया आयाम मिलता है पर कुछ संघर्ष एक यात्रा की तरह आपके जीवन में आते हैं जिनकी कोई मंजिल नहीं दिखती।

व्यक्ति अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव, संघर्ष या यूँ कहे इस जीवनरूपी कुरूक्षेत्र में अनेक महाभारत जैसे युद्ध लड़ता है जिसमें द्वंद्व भी है, डर भी है और न जाने कितनी अन्य लड़ाई है जिससे लड़ना ही है ऐसे में सभी का परिणाम सुखद या जीत का होगा, ऐसा कहां संभव होगा। ऐसे में कुछ लड़ाई लड़ी ही इसलिए जाती है जिसमें आपके जज्बे, धैर्य, सहनशीलता आदि की परीक्षा होती है सरल शब्दों में कहें तो कुछ जंग जीत-हार के लिए नहीं बल्कि इसलिए लड़ी जाती हैं कि लोग आपके सिर्फ़ लड़ाई में बने रहने के लिए ही जाने।

आज के परिवेश में ऐसी सैकड़ों बीमारियां हो चुकी है जिसके साथ व्यक्ति अपना जीवनयापन अपनी दैनिक दिनचर्चा एवं अन्य जरूरी कामों के साथ कर रहा है लेकिन कैंसर उसमें से एक ऐसी बीमारी है जिसको लेकर समाज में एक अजीब किस्म का डर है जिसके बारे में लोग बात तक नहीं करना चाहते और उस व्यक्ति एवं उसके परिवार पे इस बीमारी का एक अलग मानसिक दबाव भी पड़ता है जिसमें समाज का भी ठीक ठाक योगदान होता है। इस बीमारी से जल्द अवगत होने पर इससे पूर्णरूपेण इजात मिल सकता है अन्यथा जीवन संघर्षमय हो जाता है ।

वहीं इस बीमारी को लेकर लोगों में सही जानकारी का काफी अभाव भी है, इस बीमारी का अत्यधिक खर्चीला और न्यूनतम रिकवरी रेट भी डर का अहम कारण है।
दूसरा पहलू प्राइवेट संस्थानों ने कैंसर के नाम पे एक नया बाजार खड़ा कर दिया है जहाँ इलाज कराना सामान्य परिवारों के लिए बेहद मुश्किल काम है। कुछ अस्पताल जो सरकार द्वारा या फिर सब्सिडी के तौर पर इलाज कर रहे है वहां पर मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई है कि डॉक्टर्स और मरीजो दोनो के लिए एक नया संघर्ष है जहां इलाज में विलम्ब तो होता ही है साथ में इससे होने वाले अन्य साइड इफेक्ट्स के अलावा अन्य पर्याप्त जानकारी से भी मरीज अछूता रह जाता है जिससे अधिकतर लोग अपने जीवन को वापस सामान्य स्थिति में ला ही नहीं पाते।

माँ को कैंसर से जूझते हुए लगभग तीन साल हो गए थे, अपनी तकलीफ़ों को दरकिनार कर जीवन को हमेशा नया मोड़ देने की उनकी आदत बहुत पुरानी थी लेकिन इस बार जीवन संघर्ष कुछ ऐसा था कि दोनों की इस जंग में उनकी हार लगभग निश्चित हो चुकी थी।

इस बीमारी के शुरुआती दौर में ही पता चल पाने की संभावना कम ही होती है अन्यथा कि आप अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहते हुए निरंतर चेकअप कराते हो। जैसा कि सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में कहाँ ही हो पाता है। जुलाई 2021 में अचानक से ये बात सामने आयी कि इनको बच्चेदानी(Ovary) का कैंसर हो सकता है इस बात की वास्तविक पुष्टि और सारे जाँच पड़ताल करते लगभग 30-35 दिन और गुजर गए। 50 वर्ष की उम्र तक कभी कोई बीमारी न होने के बाद अचानक से ऐसी असाध्य बीमारी का सामने आना दर्दनाक तो था ही साथ में आश्चर्यजनक भी।

बात जब निजी संबंधों के जीवन से संबंधित हो तो व्यक्ति अपनी हैसियत से ज्यादा ही कोशिश करता है। परिस्थिति की गंभीरता और जल्द राहत पाने के उद्देश्य से दिल्ली के एक प्रतिष्ठित हॉस्पिटल में सर्जरी हुई जो 6-7 घंटे तक चली। कोरोना के दौर में डॉक्टर्स, अस्पताल और आस पास के परिवेश के हिसाब से ये सब चीजें आपको थोड़ा और असहज कर देती हैं।

फिर जब आपको यह लगता है इन सबसे शायद आगे के रास्ते आसान हो जाएं तो आप सब्र रखना बेहतर समझते हैं। चार हफ्ते दिल्ली में अस्पताल का यह सफर शायद दर्द कम ही देता अगर 15 दिन बाद आई बायोप्सी की रिपोर्ट पॉजिटिव न आती।

पर समय कठिन हो तो परीक्षा भी कठिन ही होती है। इन सबके बावजूद तीसरे स्टेज के कैंसर की पुष्टि हुई। जिसमें सर्जरी के बाद कीमोथेरेपी की सलाह दी गई,
सर्जरी के 1 महीने भी सही से नहीं हुए कि कीमोथेरेपी की शुरुआत हुई अब आगें के इलाज के लिए हर महीने दिल्ली जाना और वहाँ के प्राइवेट अस्पतालों का खर्चा लंबे समय तक उठा पाना मुश्किल था।

इसलिए आगें का सफर टाटा मेमोरियल अस्पताल से शुरू हुआ। सर्जरी के बाद के आवश्यक 6 सेशन जैसे थमने का नाम लेता। आगें की जाँच-पड़ताल से ये पुनः पुष्टि हुई कि इसने अपना घर बदल दिया है यानी शरीर के अन्य हिस्से में फैलने लगा है और जिसको रोकने के लिए कीमोथेरेपी के साथ अब टारगेटेड थेरैपी भी शुरू करनी पड़ेगी। और फ़िर हर 21 या 28 दिन बाद बनारस जाने और कीमोथेरेपी कराने का ये सिलसिला अनवरत जारी हो गया। यह सब सुनने समझने में बिल्कुल कहानी की तरह लग सकता है पर जब उल जलूल विचारों, अंतर्द्वंद्व और अवसादों इन सब से आप घिरने लगते हैं तो ये सफ़र मुश्किल लगने लगता है । पर इन्हीं के बीच आप को फिर से ख़ुद को संभालकर चलने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं होता।

इन परिस्थितियों ने ज़िन्दगी को देखने का दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल दिया था, हम जहाँ अपने जीवन में क्या पढ़ना है? क्या पहनना है ? आदि चीज़ों तक का निर्णय नहीं ले पाते और इन्हीं बीच आपको अचानक से किसी के ज़िन्दगी संबंधित निर्णय लेने पड़े तो आपके पैरो तले जमीन खिसकने लगती है। पर जो इन संघर्षों को चेहरे पर तनिक भी सिकन आये ख़ुद झेल लेता हो, अपनी जिंदादिली से कठिन परिस्थितियों में भी और उठ खड़े होता हो, और अधिक उत्साह के साथ अपने जीवन को नई दिशा देता हो तो आपका काम बस सहयोग करना हो जाता है और ऐसा व्यक्तित्व ही उस व्यक्ति को और महान बनाता है, माँ उसी का उदाहरण थी, जितना ही संघर्ष कठिन होता गया,
“माँ ने ज़िन्दगी को ये हर दफ़ा महसूस कराया कि वो एक माँ है।”

दो से अधिक सालों में लगभग पचास कीमो सेशन और उसके तमाम साइड इफेक्ट्स के साथ कई चीज़े जिसे शब्द देना बेहद मुश्किल है लेकिन इसके बावजूद अपनी लगभग उसी दिनचर्या को बनाये रखते हुए, साथ में अपने पेशे को जारी रखना आसान हो या न हो, माँ का चलना निरन्तर जारी था, सुबह समय से उठना, काम धाम निपटाकर स्कूल जाना और वापस आकर फ़िर से वही प्रक्रिया। माँ बाप के छोटे सपने होते हैं या फ़िर होते ही नहीं, संयुक्त परिवार का हिस्सा होने से व्यक्तिगत इच्छाओं का लगभग अन्त सा हो जाता है, अपने बच्चों की शादी के साथ वह कहीं बाहर अकेले रहना चाहती थी, बहुत मुश्किल से उनके समक्ष बहन की शादी हो सकी थी,

उनके देखभाल और साथ से ज़्यादा मेरे लिए दुनिया की कोई चीज़ बड़ी नहीं थी उन्हें इस बात पर गर्व भी था, व्यक्तिगत जीवन की बहुत चीज़ों को मैंने छोड़ भी दिया और बताना उचित नहीं समझा, माँ बाप कितने भी परेशान या संघर्ष में क्यों न हो बच्चों के सपने और सुख को सर्वोपरि रखते हैं लेकिन फ़िर बच्चों का क्या कर्तव्य हैं अपने सपनों के लिए उन्हें अकेले छोड़ देना ? नहीं, मैं ये सब बकवास को नहीं मानता, दुनिया की सारी चीज़ों को मैं माँ के लिए इन्तजार करा सकता हूँ/था, और किया भी और मुझे अपने निर्णयों पर तनिक भी पछतावा नहीं फ़िर चाहे नौकरी छोड़ी हो, IIT न जाने का निर्णय किया हो या फ़िर कुछ और।


कैंसर किसी मरीज को निशाना नहीं बनाता, एक पूरे परिवार को निशाना बनाता है। तकरीबन तीन साल से इससे लड़ते हुए माँ को हंसते रोते, टूटते बिखरते और फिर से हंसते देखा था बीमारी का तो नहीं पता पर माँ का हौसला इतना बड़ा था कि उसके सामने अन्य सभी चीज़ों का कद बौना हो गया था हमें तो सिर्फ़ उसके साथ खड़े रहना और ख़ुद के और उनके चेहरे पर हँसी बरकार रखनी थी हमने कितना प्रयास किया कितना नहीं इसका हिसाब अब कौन ही करे।


आज भी मैं उस पूरी रात को याद नहीं करना चाहता क्योंकि उस काली रात का मंज़र मेरी आँखों के सामने सिर्फ़ तैरता है, उस रात हौसला टूट चुका था, दर्द ने सब्र के बाँध तोड़ दिए थे, जिसकी गोद में सर रख के बड़ा हुआ था उसको पूरी रात अपने गोद में लिटाए रखा था, समय और परिस्थिति के सामने विवश था, “बाबू हमको बचा लो, जान निकल जाएगा” ये वाक्य मेरी स्मृतियों के ख़त्म होने के साथ ही शायद मस्तिष्क में कौधना बंद करेगा।

रात्रि के अंतिम पहर में दर्द की उस उच्चावस्था में मैंने भोलेनाथ से ये प्रार्थना कि हे महादेव(माँ भोलेनाथ को बहुत मानती थी) इस दर्द से इन्हें मुक्ति दो और मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि इस मुक्ति का अर्थ महादेव क्या निकाल लेंगे।

कभी कभी दिमाग़ सोचता है कि कोई इस दुनिया से कैसे जाता है? आपका कोई अपना अज़ीज़ यूं पलक झपकते चला जाता है और आप जान नहीं पाते, समझ नहीं पाते कि हुआ क्या? ऐसा ही हुआ था मैं जान चुका था कि साँसे थम चुकी हैं लेकिन सीपीआर दे रहा था, बची थी सिर्फ़ औपचारिकता। समय को इतना क्रूर नहीं होना चाहिए कि एक बच्चे से वो न सिर्फ़ सब कुछ छीन लें बल्कि दुनिया के प्रति उसका दृष्टिकोण भी बदल दे, इन सब घटनाओं के लिए दुनिया के किसी भी शब्दकोश में कोई शब्द नहीं हैं जो कुछ भी सही सही व्यक्त कर सके, हो तो बताइएगा जिस बच्चें ने अपनी आँखों के सामने अपनी माँ के प्राण जाते हुए देखा हो और उसी से फ़िर उस मृत शरीर को पैक कराने से लेकर बिना अश्रु बहाए ले जाने जो कहा जाए, शायद करना पड़ता है पुरुष होने के फायदे भी हैं तो नुकसान भी,

मौत तो निश्चित है कौन यहाँ सदा रहने को आया है लेकिन विचारहीनता/शून्य की अवस्था क्या हो सकती है उसको महसूस किया जा सकता है जब दो मृत शरीर एक साथ हो जहाँ एक में सांस न हो और एक में बस सांस ही हो, क्योंकि मृत शरीर को आग लगाना कोई संस्कार तो हो सकता है लेकिन उस बच्चे के लिए? जो स्वयं आग भी लगा रहा हो।


माँ ने जन्म भी दिया था, पहली शिक्षक भी थीं और आज भी हैं मैं उन्हें अपने साथ लेकर चलता हूँ, और जब तक सांसें हैं उनका साथ रहेगा भी। मेरी सारी अवधारणाएं और कहानियाँ अलग हैं(जीवन को लेकर,  माँ की मार को लोग प्रसाद समझते हैं, जितने भी समय तक साथ रहा उन्होंने किसी बच्चे पर कभी हाथ उठाया ही नहीं, डांट ही पर्याप्त हुआ करती थी(ज़रूरत उसकी भी शायद ही कभी पड़ती थी)।


आज पांच सितंबर है, लोग अपने शिक्षक और गुरू को याद कर रहे हैं और मैं अपनी माँ को, और सिर्फ़ आज नहीं हर दिन करता हूँ।

©हिम

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