स्त्री और पुरुष प्राकृतिक और शारीरिक रूप से भिन्न हैं यानि दोनों को शायद अलग-अलग जिम्मेदारी मिली है, जिससे प्रकृति और समाज को सुचारू रूप से चलाने में मदद मिल सके।
इन सबके साथ दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, और शायद एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं है। स्त्री पुरुष न सिर्फ़ एक दूसरे को संपूर्णता प्रदान करते हैं बल्कि दोनों मिलकर उस व्यवस्था को भी सम्पूर्ण बनाते हैं जिसकी जिम्मेदारी उन पर है।
लेकिन हमें इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत है कि सामाजिक प्राणी के तौर पर दोनों में विद्यमान सभी माननीय गुण समान है यानि कि भावनात्मक स्तर पर दोनों की स्थिति बिल्कुल बराबर है।
एक दूसरे की पूरकता को ध्यान में रखते हुए हमें अपने साथी का चयन इस प्रकार करना चाहिए जो आपके स्वभाव, शैली और जीवन के अन्य पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आपको संपूर्णता प्रदान करे। (उदाहरण स्वरूप ख़ुद को संपूर्णता प्रदान करने से तात्पर्य है कि यदि एक अंतर्मुखी है तो दूसरा बहिर्मुखी, एक अधिक धैर्यवान तो दूसरा कम)
रिश्तों की बुनियाद सहजता पर टिकी होती है; जहाँ कोई खामोश रहते हुए भी सिर्फ़ उसका पास होना ही सुखद अनुभूति कराता हो, आप साथ खुलकर रो सके, बेतरतीब बिना कारणों के हँस भी सके। ऐसा होता है तो निश्चित रूप से ऐसे साथी का होना सौभाग्य की बात होगी।
जीवन में साथ रहते हुए कितने भी संघर्ष और दुख भले क्यों न आ जाएँ लेकिन उन कठिन परिस्थितियों में यदि एक सच्चा सहारा भी आपके पास है तो आपके लिए कहीं ना कहीं वह पर्याप्त हो सकता है वहाँ से निकलने ले लिए।
जीवन निर्वाह के लिए अन्य तमाम चीज़ों की और आवश्यकता ज़रूर होती है किंतु उन सभी में रिश्ते ही ऐसे होते हैं जो जीवन पर्यंत निरंतर बने रहते हैं। ऐसे में आप महत्व अन्य भौतिक चीज़ों को देना चाहते हैं या फिर रिश्तों को यह आपके ऊपर निर्भर करता है।
©हिम

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