मां,
नानी अब और रोने लगी है, उसकी हड्डियों के साथ नसे भी दिखने लगी है, पिछले महीने मिलने गया था तो पता चला अब उसका रक्तचाप भी बढ़ जाता है, हर दिन तुम्हारे पास जाने को बोलती है, हां वहीं जहां बड़े मामा, नाना और तुम चली गई बिना बताए, मैं उसको अब रोकना भी नहीं चाहता, अब जब भी जाता हूं दोनों गालों पर हाथ रखकर बच्चों की तरह रोने लगती है फ़िर जब बुढ़ापे की थकान उसके चेहरे पर छा जाती है तो ख़ुद छुप हो जाती है, मेरे जाने का मन अब कम करने लगा है लोगों को संभालते संभालते मैं पत्थर हो तो गया हूं पर उसको देखकर मेरी आत्मा झकझोर उठती है,
पता है मैं अब पांच बजे उठने लगा हूं नहीं तो फ़िर सोया ही रह जाता हूं, देर से उठूं तो मिट्टी के चूल्हे में अब कोई चाय नहीं रखता इसलिए रोज ख़ुद ही बनाने की आदत डाल लिया हूं, घर ख़ुद से न पहुंचूं तो अब कोई फोन नहीं करता, हां! खाना अभी भी वहीं ढका रखा रहता है पर कभी देर हो जाए तो कोई इंतज़ार नहीं करता।
नौकरी करने अभी भी नहीं गया हूं, कभी कभी सोचता हूं किसके लिए और क्यों करूं? पर शायद कुछ दिन में करने भी लगूं, मैं तो तुम्हारे पास ही आना चाहता था लेकिन एक पागल वैद्य ने पता नहीं कई महीनों तक न जाने क्या क्या पिलाए रखा, कुछ दिनों से अब मैंने वो कड़वी घूंट पीना बंद कर दिया है।
मैंने एक जादुई दुनिया से कुछ दिनों का करार कर लिया है, वो काम जो अधूरे रह गए हैं उसको पूरा कर मैं वहीं आ जाऊंगा, तुम्हें पता है लड्डू अब पांच महीने का हो गया है कई बार तो उसको देखकर ही तुम्हारी याद जाती वो अपनी मां पर ही गया है और उसकी मां तो तुम्हारी ही बेटी है, मैंने सोच रखा है जब भी बोलना शुरू करेगा उससे पहला शब्द नानी ही बुलवाने का प्रयास करूंगा।
अरे! याद है वो लड़की जिससे तुम कभी कभी वीडियो कॉल पर बात किया करती थी, इसी साल फरवरी में उसके घर वालों ने शादी कर दी, शादी से पहले कंधे पर सर रखकर खूब रोई थी, जैसे मैं तुम्हारे गोद में सर रख के रोता था कुछ दिनों बाद उसे बहुत फोन करने का प्रयास किया लेकिन अचानक से तुम्हारी तरह बिना बनाए वो भी चली गई। मैं ढूंढने नहीं गया, जब तुम नहीं लौट रही तो उसके लौटने की क्या उम्मीद करूं मैं,
लेकिन जैसे मैंने तुम्हारी हर चीज़ को सहेज कर रखा है वैसे उसके भी सामानो को, वैसे तो सामान आंधी-तूफान, जलभराव में गुम भी हो सकते हैं पर यादें आख़िरी साँस तक रहती है तो मैंने इनको तुम्हारे उसी लोहे के बक्से में रखकर वही पुराना ताला लगा दिया हूं,
लेकिन मैं अब थोड़ा सा बदल गया हूं मां…….!
Too be Continued….!
बिखरी डायरी
Expression of thoughts, Life Experiences, Book Reviews, Analysis and Most importantly a balance between personal life and professional life.
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