भाग एक:-
……ऑफिस से सुबोध जब उस दिन फ़िर घर लेट पहुंचा, उसे पता था उसने दिव्या को फ़िल्म दिखाने का वादा किया है उसे यह भी पता था आज फिर से ताने मिलेंगे, गुस्से को झेलना होगा; मनाना भी पड़ेगा(एक दूसरे के साथ समय बिताने की बातों को कई दिन से टाल रहा था) पर आज वह ग्लानि की मुद्रा में नहीं था, सभी बातों को सुनकर नजरअंदाज करते हुए, कमरे में चला गया
क्योंकि आज वह अपनी नौकरी गवां बैठा था(कई दिनों से चीज़ें ठीक न होने पर झल्लाकर इस्तीफा सौंप आया था), उसके लिए मानो धरती सूनी हो चुकी थी कुछ खोने से कहीं ज्यादा कठिन होता है शुरू से शुरू करना, डर इसका भी था कि इसका असर व्यक्तिगत संबंधों पर भी पड़ेगा, अभी तक तो सिर्फ समय की पाबंदियां हुआ करती थी अब उसे आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ेगा।
पत्नी प्रेमिका बन जाए ऐसा कम ही हो पाता है, उसके हिस्से में उम्मीद के पूरे होने से ज्यादा त्याग आता है, संबंधों की असली परीक्षा वैसे कठिन समय में ही होती है। कभी न होने वाले इस अप्रत्याशित व्यवहार को भांपते हुए पत्नी ने स्थिति का समझने का प्रयास किया((स्त्रियां चाहे गुस्से में हो या फिर दुखी लेकिन उन्हें लोगों का मन पढ़ना पुरुषों से बेहतर आता है)।
दिव्या ने पूछा सब ठीक है? सुबोध ने कहा बहुत हो गया था, नौकरी छोड़ दी मैंने, उसे पता था इस नौकरी की कितनी जरूरत थी उसे इस समय लेकिन अगर उसने छोड़ देने का फैसला लिया तो ये भी पता होगा कि कितनी समस्याएं भी है उससे।
लाख दुखों का पहाड़ टूट पड़े पर यदि इंसान का जीवनसाथी उससे कहे कोई बात नहीं हम मिलकर देख लेंगे, तुमको दिक्कत थी छोड़ दिया बात खतम ऐसे समय पर उसे जो विश्वास मिलता उससे वह महसूस करता है समय आने पर दुनिया की कोई भी जंग जीत लेगा। हालात को समझते हुए क्यों? थोड़ा सोच लेते के सवालों में उलझने के बजाए दिव्या ने आगे बढ़ने पर जोर दिया। सुबोध खाने के मूड में नहीं था ऐसे में किसे ही भोजन परवाह होगी पर बुरी से बुरी हालत में भी चाय के लिए कम ही मना करता था, दिव्या ने बोला खाना नहीं खाना तो चाय ही पी लो कपड़े बदलो मैं आती हूं।
दिव्या वापस दो कप चाय के साथ लौटी (ऐसे में सुबोध चाय के साथ सिगरेट भी पीना चाहता था वो कभी कभी ही पीता था लेकिन घर पर कभी नहीं) विचारों के समर में डूबे इंसान को प्रेम से बाहर निकाला जा सकता है बातों के क्रम में अपने व्यक्तिगत जीवन को और गहनता प्रदान करते हुए एक दूसरे की अश्रुधाराओं के साथ एक दूसरे में समाहित हो गए।
पुरुष कितना भी टूटा हो अपनी पसंदीदा स्त्री की बाहों में होने के बाद सब भूल जाता है और वहां रहते हुए दुनिया जीत लेना उसके लिए आसान नजर आता है। इन सबके बीच नीचे सरकते हुए सुबोध दिव्या की गोद में सो गया। सुबोध के बालों में हाथ फेरते हुए दिव्या भी कुछ सोचने लगी थी।
भाग दो:-
सब कुछ पास हो तो साथ होने की जिम्मेदारी कम समझ आती है पर अगर अचानक से जब सब कुछ छूटने लगे तो फिर साथ होने की जिम्मेदारी का एहसास होने लगता है यही सोचते सोचते दिव्या को कब नींद आ गई पता नहीं चला। सुबह उठकर दीवार पर टंगी घड़ी को देखा सुबोध अभी तक सो रहा है ऑफिस के लेट हो रहा है जैसे उसने जगाने के लिए उसके सर पर हाथ फेरा उसके शरीर में एक कंपन सा उत्पन्न हो गया, इन सबके बीच सुबोध की आंख खुल गई थी इतने में दिव्या ने अपने विचारों को परिवर्तित करते हुए बोला उठो चाय पी लो मैं बना कर लाती हूं।।
दिव्या ने शादी के बाद आगे की पढ़ाई को जारी रखा था, उसे क्रिएटिव काम बहुत पसन्द थे जैसे पेंटिंग करना, कुछ लिखना वैसे भी वह पीएचडी करना चाहती थी संभवतः इस साल उसे कहीं दाखिला लेना भी था। सुबोध ने सोचा भी यही था कि मैं ऑफिस और तुम पढ़ाई दोनों साथ रहकर उसी शहर में कर लेंगे।
ऐसा नहीं है कि घर के सारे काम पर एक मात्र अधिकार दिव्या का ही था, सुबोध सप्ताह की छुट्टी पर जब पहले की तरह वादा करने के बाद उसको बाहर घुमाने या फिल्म दिखाने नहीं ले जा पाता था तो दिव्या के लिए उसके मनपसंद का खाना बनाता था फिर दोनों टेबल पर बैठकर लैपटॉप में कुछ देखते हुए या फिर किसी विषय पर बात करते हुए खाना खाते थे।
दिव्या को सुबोध से शिकायतें भी थी पर जब सुबोध व्यस्त समय के बीच कुछ न कुछ उसके लिए बिना बताए करता था तो वो सब भूल जाती थी, पिछले ही महीने दिव्या ने शादी बाद अपना पहला जन्मदिन मनाया था, जन्मदिन सप्ताह के वीक डेज में था तो दोनों की सहमति से कुछ खास करने की बातों को छुट्टी के दिन लिए टाल दिया गया था।
बदकिस्मती कहें या प्राकृतिक प्रक्रिया दिव्या का जन्मदिन इस बार उसके पीरियड्स साइकल के बीच में पड़ा, सुबोध की एक खास बात थी कि वो अंतर्मुखी या अपने जीवन संघर्षों में कितना भी व्यस्त क्यों न हो वह दिव्या की हर छोटी छोटी बातों का ध्यान रखता था। रात में एक सिर्फ पेस्ट्री खिलाकर बर्थडे की शुभकामनाएं देते हुए दोनों सो गए थे।
सुबह का चाय, नाश्ता उस दिन सुबोध ने खुद बनाया, लाख मना करने के बाद दिव्या किचेन में साथ ही थी, स्त्री संसार की ईश्वर द्वारा निर्मित सबसे खूबसूरत क्रिएशन है बशर्ते उसे ठीक तरह से समझ लिया जाए। जाते जाते सुबोध ने बोला कोशिश करूंगा कि आज मैं घर जल्दी आ जाऊं, तुम एक काम करना दोपहर का खाना बाहर से खा लेना।
दिव्या को सुबोध के साथ शहर आए अभी कुछेक दो तीन महीने ही हुए थे इसके पहले वो शादी बाद अपने घर या ससुराल वाले शहर में ही थी। धीरे धीरे सुबोध अपने काम और व्यक्तिगत जीवन के बीच सामंजस्य बनाने का प्रयास कर रहा था, पर निजी कंपनियों के मालिकों को लोगों का सुकून कहां ही पसंद होता है इंसान किसी अस्पताल के बेड पर भी लेटा हो तो उससे मिलकर पहले तो Get well Soon तो बोलेंगे लेकिन लौटते हुए उसे ये बता आयेंगे कि You are still on the way, Finish it Soon, You know We are already too late for the Deployment.
भाग तीन
ख़ैर ऑफिस पहुंचने के पहले रात में ही सुबोध ने अपनी पत्नी के खास दिन के लिए कुछ सरप्राईज के बारे में सोच रखा था उसे पता था वो दूर रहेगा ऐसे में उसने आज के लिए अपना दिल और दिमाग़ घर पर छोड़ जाने लिए सोचा।
जाने से पहले रात में स्टडी रूम में जाकर उसने ऑनलाइन मंगाई सादे लेटर्स में से कुछ पर उसके लिए कुछ अपनेपन के शब्द लिखे और साथ में बाकी पन्नो के माध्यम से पूरे दिन की दिनचर्या को प्लान किया था और उन पन्नों को अलग अलग जगह रखकर कुछ घंटों के समयांतराल पर फोन पर बता बता कर सरप्राइस देने का प्लान किया।
स्टडी टेबल के अलग अलग दराज में सुबोध ने अलग अलग पन्नों को रखा हुआ था, ऑफिस पहुंचने के तुरंत बाद सुबह के 10:00 बजे के आसपास दिव्या को कॉल किया और स्टडी रूम में जाने के लिए बोला, पहले तो झुंझलाहट में दिव्या बोली तुम खुद की चीजों पर भी ध्यान नहीं हमेशा जल्दी में रहते हो पर फिर उसके प्यार से आग्रह करने पर की वह ऑफिस से संबंधित कुछ जरूरी कागज वहीं भूल गया है कृपया वह उसे फोन पर भेज दे।
थोड़ी देर के लिए इंसान भले ही गुस्से या झुंझलाहट में क्यों न हो किंतु प्यार और अपनेपन में इन क्षणिक चीजों को जल्दी भूल जाता है, दिव्या ने जब रूम में जाकर दराज खोला तो उसे गुलाब के छोटे गुलदस्ते के साथ एक पत्र हाथ लगा, पहले तो एकदम अचंभित हो उठी ऊपर की एक लाइनों पर उसकी निगाह जाने से उसे अनुमान हो गया था फिर भी उसने सुबोध को जब फोन किया और पूछा तो उसने सिर्फ़ इतना जवाब दिया कि तुम्हारे लिए किचेन में मैं थोड़ी सी चाय बचाकर आया हूं उसे गर्म करके इस पत्र को बालकनी में रखे गमलों के बीच जाकर पढ़ो, जिसमें उगे उन नन्हें पौधों के सृजनकार हम दोनों हैं और जहां हमें उनके साथ एक दूसरे की ख़ुशबू भी आती है।
सुबोध के ऑफिस जाने के बाद दिव्या आलस वश जाकर बेडरूम में लेट गई थी और वहीं उसकी आंख भी लग गई थी कुछ घंटों बाद जब फोन की आवाज बजी तब वह उठी थी। पत्र मिलने के बाद जैसा उसमें लिखा था उसका पालन तो उसे करना ही था, दिव्या के लिए इस तरीके का शायद पहला अनुभव था दोनों की शादी को 1 साल होने वाले थे किंतु दोनों एक दूसरे को लगभग 2 साल से जान रहे थे, क्योंकि विवाह पारिवारिक माध्यमों से हुआ था इसलिए शादी के पहले बहुत सहजता हर चीज को लेकर दोनों में नहीं बन पाई थी बस कुछ मुलाकातों और बातों का सिलसिला ही ज्यादातर चला था। शादी के बाद हनीमून के लिए बड़ी मुश्किल से समय निकालकर दोनों भारत के दूसरे कोने एक आईलैंड गए थे, दुनिया भर के थकान और तमाम व्यस्ताओं के बीच मुश्किल से दो-चार दिन पूर्णरूप से उन्होंने एक दूसरे के साथ गुजारे थे, वहां से लौटने के कुछ दिन बाद दिव्या अपनी मायके चली गई थी और सुबोध वापस अपने ऑफिस के लिए नए शहर।
शादी के पहले वाले जन्मदिन यानी पिछले साल सुबोध ने अपनी शुभकामनाओं के साथ कुछ उपहार भेजा था लेकिन इस बार का यह अनुभव उसके लिए जितना सुखद, सुकून भरा था उतना ही आश्चर्यचकित करने वाला भी, जब किसी से ज्यादा उम्मीद न हो और वो अचानक से उम्मीदों की कल्पना शीलता को भी लांघ जाएं तो फिर उन भौतिक चीजों का मूल्य ही ख़त्म हो जाता है जो सबसे खास और आकर्षक बन जाता है उस व्यक्ति के द्वारा किए गए सारे प्रयत्न और कुछ प्रेम के शब्द।
सुबोध ने पत्र कुछ इस प्रकार लिखने का प्रयास किया था कि दिव्या को यह एहसास हो कि इस पल में सुबोध उसके बगल वाली कुर्सी पर ही है। कई बार इंसान करीब रहकर भी दूर होता है और दूर रहकर भी बेहद करीब इतना करीब की उसकी शारीरिक अनुपलब्धता का ख़्याल ही नहीं रहता उसके शब्द कानों में गूंजते रहते हैं और उसकी सांसे अंतरात्मा को छूती रहती हैं बस फ़र्क सिर्फ़ इस बात का होता है कि किसको क्या महसूस कराया जा रहा है।
Dear Divya!
माफ़ करना इस समय मैं तुम्हारे पास शारीरिक रूप से नहीं हूं लेकिन मेरे शब्द, मेरे एहसास, मेरी भावनाएं सब कुछ मैं उन्हीं सिलवटों के बीच छोड़ कर आया हूं, आज मैं उस आलिंगन से मुक्त ही नहीं होना चाहता था, मैंने सोचा था अपने हाथों से चाय और सैंडविच बनाने के बाद मैं तुम्हारे बालों को भी संवार दूंगा तुम कहती तो चोटी नहीं तो जूड़ा भी मैं ही लगाता, मुझे पता है दो दिन से तुमने बाल भी नहीं धोए हैं। तुम्हारी नाराजगी जायज है, आज मुझे तुम्हारे साथ वहीं तुम्हारे बगल होना चाहिए था। हमारी शादी को 1 साल होने वाले हैं और मुझे पता है कि जितना समय मुझे तुम्हें देना चाहिए उतना मैं शायद अभी नहीं दे नहीं पाता। हां पर अपनी तरफ से कोशिश पूरी करता हूं। मैं हर दिन तुम्हारे साथ रहते हुए एक व्यक्ति के तौर पर शांत और सहज होता जा रहा हूं, इन भयंकर निराशा के विकराल में तुम्हारी गोद समुद्र का वह किनारा है जहां लहरें आकर शांत हो जाती हैं और दुनिया के सारे दुखों को मैं तुम्हारी बाहों में आने के बाद भूल जाता हूं, तुम्हारे कंधे मेरे लिए अतिरिक्त भुजाओं की तरह हैं, हमारे जीवन के यात्रा की यह महज शुरूआत है और यह यात्रा जीवन पर्यंत चलने वाली है, अंत में तुमसे यही कहना चाहूंगा यह डगर चाहे कितनी भी अच्छी या बुरी क्यों ना हो मैं ना तुमसे आगे ना पीछे बल्कि तुम्हारे साथ तुम्हारे बगल तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेते हुए यूं ही चलता रहूंगा।
तुम्हारा शुभ!
सुबोध एक संवेदनशील और अच्छे व्यक्तित्व का इंसान है इस बात का अंदाजा दिव्या को शुरू से था, बचपन में पिता को खो देने के बाद उसके ऊपर जिम्मेदारियां का बोझ जल्दी आ गया और अन्य पारिवारिक झंझावाते निश्चित रूप से शोभन के जीवन को प्रभावित करती रहती हैं। दिव्या को इन पहलू से कोई शिकायत नहीं थी, सबको साथ लेकर चलना तो व्यक्ति के व्यक्तित्व को ही झलकाता है।
किंतु आज इस अप्रत्याशित व्यवहार से अपनेपन की जिस भावना का प्रमाण सुबोध ने दिया था वह शायद दिव्या के कल्पनाओं से परे था यह सब सोचते हुए उसके आंख से आंसुओं की धारा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह इस समय बस सुबोध को गले लगाकर बच्चें की तरह उसकी भुजाओं के बीच कुछ समय के लिए समा जाना चाहती थी। इतने में सहसा उसके फोन की घंटी फिर बजी वह भागकर फोन के पास पहुंची तो देखा सुबोध का ही दोबारा फोन आया था और पूछने पर कुछ खाया पिया या नहीं के साथ अन्य सवालों के जवाब में अपने अश्रुओं पर थोड़ा लगाम देते हुए दिव्या सिर्फ थैंक यू सो मच फॉर एवरीथिंग ही बोल पाई थी बाकी बातों को मुलाक़ात तक टाल देना उचित समझा।
इससे पहले की बात खत्म होती सुबोध ने फिर से टेबल के दूसरे दराज को खोलने को कहा, दूसरा दराज थोड़ा बड़ा था इसलिए बचे सारे पन्नों के साथ कुछ चीजों को सुबोध ने एक साथ रख दिया था, पहले बार की तुलना में दिव्या के चेहरे पर अबकी आशा की एक किरण दिखाई दे रही थी जहां उसे एक पन्ने पर फ्रिज में उसके पसन्द की रखी ढ़ेर सारी चॉकलेट की सूचना, बेडरूम के दराज में वॉर्म हीटिंग pad की लोकेशन मिली तो आखिरी और अंतिम पन्ने पर लिखा था उसका लंच उस तक कितने बजे पहुंचेगा की भी के सूचनाएं उपलब्ध थी।
इन सब चीजों को देखते हुए दिव्या स्तब्ध थी और उसके आंख में अश्रु,
दिव्या अपने सारे दर्द भूल चुकी थी और उसका ध्यान अब दीवार पर टंगी सिर्फ़ उस घड़ी पर था जहां वह सुबोध के आने का इंतज़ार कर रही थी….और यह इंतजार ऐसा था जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।।।
शेष आगे……!!!
©बिखरी डायरी by Him

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