बिखरी डायरी

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रेत की मछली एक ऐसी कहानी है जो पाठक को मानवीय रिश्तों की जटिलता, विश्वासघात, और स्त्री की पीड़ा के गहरे अनुभवों से रूबरू कराती है। यह उपन्यास अपनी सादगी और भावनात्मक तीव्रता के कारण पाठकों को प्रभावित करता है, लेकिन इसे पढ़ना आसान नहीं है।

रेत की मछली उपन्यास, कांता भारती द्वारा रचित, एक स्त्री के वैवाहिक जीवन के बाद की त्रासदियों और भावनात्मक संघर्षों की गहन कहानी है। यह उपन्यास उनके पूर्व पति धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध उपन्यास गुनाहों का देवता के जवाब में लिखा गया माना जाता है, जो उनके निजी जीवन के अनुभवों पर आधारित है।

कहानी एक ऐसी महिला की है, जो अपने घर, परिवार के खिलाफ जाकर प्रेम विवाह करती है और उसके बाद ससुराल में सुखद भविष्य की कल्पना करती है। वह अपने नए जीवन में सुंदरता और प्रेम की आशा के साथ कदम रखती है, लेकिन उसका सपना धीरे-धीरे टूटने लगता है। उपन्यास का कथानक सामाजिक दुविधाओं, विश्वासघात और भावनात्मक दर्द के इर्द-गिर्द घूमता है। कहानी में एक जंगली बेल का बिंब प्रमुख है, जो नायिका के ससुराल में उगती है और उसकी सारी खुशियों को नष्ट कर देती है। यह बेल नायक की मुंहबोली बहन का प्रतीक मानी जाती है, जिसके साथ नायक का अनुचित संबंध दर्शाया गया है और जो नायिका के जीवन को पूरी तरह से तहस-नहस कर देता है।

अगर रेत की मछली को गुनाहों का देवता के जवाब के रूप में देखा जाए तो गुनाहों का देवता में चंदर का चरित्र धर्मवीर भारती का आत्मचित्रण है, और सुधा उनकी पहली पत्नी कांता भारती का।
रेत की मछली इस कहानी को कांता भारती के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है, जिसमें चंदर की कमजोरियों और दोगले चरित्र को उजागर किया गया है।

कहानी के आधार पर कई समीक्षकों का मानना भी है कि यदि रेत की मछली में 10% भी सत्यता है, तो यह धर्मवीर भारती की छवि पर एक गंभीर सवाल उठाता है।

यह कहानी स्त्री-विमर्श का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जो प्रेम, विश्वासघात और सामाजिक बंधनों के बीच एक महिला की पीड़ा को उजागर करता है। यह पाठकों को गहरी चिंता, अकेलापन और असहनीय भावनात्मक तनाव का अहसास कराता है।
रेत की मछली न केवल कांता भारती के निजी अनुभवों की अभिव्यक्ति है, बल्कि यह गुनाहों का देवता के चरित्र चंदर के आदर्शवादी चित्रण के दूसरे पहलू को भी सामने लाता है। यह उपन्यास पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि प्रेम और विवाह के पीछे की वास्तविकता कितनी जटिल और दर्दनाक हो सकती है।

वैसे तो चाहे पुरुष हो या महिला उसके कई चेहरे हो सकते हैं उसका वास्तविक चेहरा क्या है यह अनुमान लगा पाना मुश्किल है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस समाज में पुरुष होने के बहुत नाजायज फायदे रहे हैं/हैं ठीक उसी स्थिति में होने पर समाज का नज़रिया पुरुष और स्त्री के अनुसार बदल जाता है।

अंत में निदा फ़ाज़ली के एक शेर के साथ अपनी बात ख़त्म करूंगा कि:

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना कई बार देखना।

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