बिखरी डायरी

Expression of thoughts, Life Experiences, Book Reviews, Analysis and Most importantly a balance between personal life and professional life.

मुझे यह कहना कभी नहीं आया कि मैं प्रेम करता हूं या नहीं।

मैंने रखा बस उसकी छोटी छोटी चीजों का ध्यान
ज़रूरत पड़ी तो चाय और मैगी भी बनाया
ट्रेन लेट हुई तो बैठा उसके साथ घंटों सीढ़ियों पर।

मोबाइल के दौर में लिखे मैंने उसके लिए खत, पर्चियां चिपकाकर किया भेंट किताबों को।

गुस्सा करने पर समझाया नहीं बस सुना उसको
जब आसूं आए तब बस आने दिया और होने दिया मन को हल्का,

भीड़ भाड़ और सड़क पर चलते हुए बिना बताए गाड़ियों के साइड मैं खुद चला और उसको चलने दिया सुरक्षित अपने बाएं से।

थीं कुछ शिकायतें भी लेकिन हंसने हंसाने के क्रम में टाल दिया,
मिली नज़रें जब अचानक से तो फेर ली आंखे, हां देखा ज़रूर लेकिन घूरा नहीं कभी।

लेकिन सच में, मुझे यह कहना कभी नहीं आया कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं या नहीं।

©Him

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