दोस्त होना एक जिम्मेदारी है!
दोस्ती वह किरदार है जो जीवन के अन्य सभी रिश्तों को समय-समय पर निभाता है।
मां की तरह निस्वार्थ होता है, पिता की तरह धवंस भी दिखाता है, बड़े भाई की तरह समझाता भी है और बहन की तरह पुचकारता भी है।
पर एक दोस्त जब स्वयं के किरदार में होता है तो आपकी सारी कल्पनाओं से परे होकर वह आपके लिए एक ऐसी दुनिया बनाता है जहां ना कोई बंधन होता है, ना कोई सीमा होती है, ना कोई मर्यादा होती है, ना कोई डर होता है, ना कोई संकोच होता है और ना ही आपको बात बात पर कोई टोकने वाला होता है।
वह आपको स्वीकारता है ठीक वैसे जैसे आप खुद की स्वीकार्यता को चाहते हैं।
यदि कुछ अनुपात में कोई अपने मूल स्वरूप में बना रहता है तो कहीं ना कहीं सबसे अहम योगदान उसके दोस्तों का होता है। दोस्त परिवार का सिर्फ बढ़ता स्वरूप नहीं बल्कि कभी-कभी परिवार से भी बढ़कर हो जाता है।
अपने निजी अनुभव से सभी को यही सलाह देना चाहूंगा कि किसी एक मात्र इंसान को अपनी पूरी दुनिया मत बनाइएगा।
हर वक्त, हर समय बाकी सभी रिश्तों के साथ यार दोस्त साथ चाहिए ही चाहिए।
ऐसी संख्या बहुत सीमित होती है अगर मैं तीन-चार भी कह दूं तो शायद अधिक हो जाएगी इसलिए भीड़ मत कमाइए, दोस्ती कमाइए।
संबंधों को ऐसा निभाइए की कोई/कुछ लोग यह कह सके कि आप सच मायने में उनके दोस्त हैं।
जैसे लोग कहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है ठीक वैसे ही दोस्ती की नहीं जाती हो जाती है।
फिलहाल इस मामले में मैं बहुत खुशनसीब हूं मेरे पास दो-तीन ऐसे रत्न मौजूद हैं।

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