बिखरी डायरी

Expression of thoughts, Life Experiences, Book Reviews, Analysis and Most importantly a balance between personal life and professional life.

सच है कि जिन चीज़ों को व्यक्त करने के लिए इस मंच का चयन किया था उसका साहस कभी जुटा ही नहीं पाया लेकिन अब 2024 पर भी मिट्टी डालने का समय आ गया है।

किसी संवेदना/सहारा जैसी किसी बात का कोई उद्देश्य नहीं बस मन/मस्तिष्क में बैठे तमाम अंतर्कलहों/विचारों को अंतिम रूप से व्यक्त करने का है।

एक आखिरी खत
पार्ट एक:-

मैं इस साल को यूं ही खामोशी से गुजरते हुए देखना चाहता था लेकिन काफी जद्दोजहद के बाद फैसला किया है एक अंतिम खत मां के नाम लिखूंगा; अपने अंतर्द्वंद्व को ख़त्म करते हुए वो सब कुछ जो शायद मैं अंतिम समय कह पाता।

कभी कभी दिमाग़ सोचता है कि कोई इस दुनिया से कैसे जाता है? आपका कोई अपना अज़ीज़ यूं पलक झपकते चला जाता है और आप जान नहीं पाते, समझ नहीं पाते कि हुआ क्या?

दुनिया में अगर कुछ भी निश्चित है तो वो है मौत। ज़िंदगी कुछ और नहीं बल्कि खुद के रोने के साथ इस दुनिया में आगमन से लेकर दूसरों के रोने के साथ वापसी के बीच का सफर है।

स्त्री पुरुष द्वारा संतान उत्पत्ति की चाह स्वयं की इच्छा होती है फिर चाहे वो संतान सुख की अनुभूति के लिए हो या अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए अथवा कुछ और। किंतु एक तरीके से उसके परवरिश की नैतिक जिम्मेदारी उस दंपत्ति की होती है सिर्फ़ इसलिए कि उस संतान को इस दुनिया में लाने का निर्णय उनका स्वयं का था।

ऐसे में हर मां-बाप अपनी संतान को स्वयं से ज्यादा सुख, सुविधा और अन्य जरूरतों की पूर्ति पर अधिक ध्यान देते हैं, इन सबके बीच मायने ये रखता है कि जब किसी परिवार के पास दो वक्त की रोटी खाने के सिवा कुछ न हो और फिर भी वह अपने संघर्ष और मेहनत से खुद का और अपनी आने वाली पीढ़ी का जीवन स्तर/उत्पादकता बढ़ाने के लिए तत्पर रहता है तो नैतिक रूप से उनकी सराहना अवश्य की जानी चाहिए।

बदलते परिवेश और आधुनिकता के दौर में नवीन पीढ़ी ने संघर्ष और संवेदनशीलता के रास्ते से हटते हुए अधिकतर चीजों के लिए दोषारोपण का रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है और अपने जीवन को हर मामले में तुलनात्मक बनाकर रखा हुआ है।

परिवार/घर उसमें रह रहे लोगों से होता है वरना वह ईंट से बनी दीवारों का मकान होता है। मकान को घर बनाने, उसे संजोने और समय-समय पर उसे उद्दीपित करने का काम हमेशा घर की स्त्रियों ने ही किया है। पुरुष जो ख़ुद को हमेशा अस्त-व्यस्त पाता है उसे घर की ज़िम्मेदारी न ही मिले तो बेहतर है। पितृसत्तात्मक सत्ता जिसका वर्चस्व सदियों से रहा है और जिसने आर्थिक गतिविधियों की ज़िम्मेदारी उठाई रखी उसने सब कुछ इसी को समझा। अन्य पारिवारिक एवं घरेलू कामों में दिन रात लिप्त स्त्रियों के कामों को कोई तवज्जों दी ही नहीं। पर आज संसाधनों के उचित वितरण से लेकर हर क्षेत्र में समान प्रतिनिधित्व मिलने पर पुरुषवादी सोच रखने वाले समाज का सिंहासन हिलने लगा है।

ऐसे में हर व्यक्ति अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव, संघर्ष या यूँ कहे इस जीवनरूपी कुरूक्षेत्र में अनेक महाभारत जैसे युद्ध लड़ता है जिसमें द्वंद्व भी है, डर भी है और न जाने कितनी अन्य लड़ाई है जिससे लड़ना ही है ऐसे में सभी का परिणाम सुखद या जीत का होगा, ऐसा कहां संभव है ऐसे में कुछ लड़ाई लड़ी ही इसलिए जाती है जो आपके जज्बे, धैर्य, सहनशीलता की परीक्षा के लिए होती है सरल शब्दों में कहें तो कुछ जंग जीत-हार के लिए नहीं बल्कि इसलिए लड़ी जाती हैं कि लोग आपके सिर्फ़ लड़ाई में बने रहने के लिए ही जाने।

आज के परिवेश में ऐसी सैकड़ों बीमारियां हो चुकी है जिसके साथ व्यक्ति अपना जीवनयापन, अपनी दैनिक दिनचर्या अन्य जरूरी कामों के साथ कर रहा है लेकिन कैंसर उसमें से एक ऐसी बीमारी है जिसको लेकर समाज में एक अजीब किस्म का डर है जिसके बारे में लोग बात तक नहीं करना चाहते और उस व्यक्ति एवं उसके परिवार पे इस बीमारी का एक अलग मानसिक दबाव पड़ता है जिसमें समाज का भी ठीक ठाक योगदान होता है। इस बीमारी से जल्द अवगत होने पर इससे पूर्णत शायद इजात मिल सकता है अन्यथा जीवन संघर्षमय हो जाता है ।

वहीं इस बीमारी को लेकर लोगों में सही जानकारी का काफी अभाव भी है, इस बीमारी का अत्यधिक खर्चीला और न्यूनतम रिकवरी रेट भी डर का अहम कारण है।

दूसरा पहलू प्राइवेट संस्थानों ने कैंसर के नाम पे एक नया बाजार खड़ा कर दिया है जहां इलाज कराना सामान्य परिवारों के लिए बेहद मुश्किल काम है। कुछ अस्पताल जो सरकार द्वारा या फिर सब्सिडी के तौर पर इलाज कर रहे है वहां पर मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई है कि डॉक्टर्स और मरीज दोनो के लिए एक नया संघर्ष है, जहां इलाज में विलम्ब तो होता ही है साथ में इससे होने वाले अन्य साइड इफेक्ट्स के साथ अन्य पर्याप्त जानकारी से भी मरीज अछूता रह जाता है। जिससे अधिकतर लोग अपने जीवन को वापस सामान्य स्थिति में ला ही नहीं पाते।

शेष आगे फिर…!

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