व्यक्ति के जीवन में संघर्ष कई प्रकार के होते हैं फिर चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक हो या फिर मानसिक। आर्थिक और सामाजिक संघर्ष को तो फिर भी दूसरों की मदद से सुलझाया जा सकता है किंतु मानसिक संघर्ष को सुलझा पाना इतना आसान नहीं। व्यक्ति के अंतर्द्वंद कभी कभी उसे इतना झकझोरते हैं कि वह असहाय महसूस करने लगता है।
ऐसे तमाम सवाल जिसे वो खुद से करता है और जबाब जानने का प्रयास करता है जैसे कि सारी बुरी चीज़ें मेरे साथ ही क्यों? वो भी जब आप उम्र के ऐसे पड़ाव पे हो जहाँ आपकी उत्पादकता सर्वोच्च हो। आपकी नकारात्मकता और भी बढ़ने लगती है जब इस भौतिकतावादी समाज मे आप खुद को बचा कर रख रहे हो, आपने किसी का कभी बुरा न किया हो या न चाहा हो बल्कि सदैव अपनी क्षमता अनुसार लोगो के लिए खड़े रहे हो।
सच्चाई और नैतिकता का साथ देने वाले सभी के साथ अच्छा ही होता है और चार्वाक सिद्धांत पे चलने वाले सभी लोगों के साथ बुरा ही इसका किसी के पास कोई प्रमाण नहीं और न ही कोई इसकी शत-प्रतिशत गारण्टी ले सकता है।
ऐसी स्थिति में आप जीवन में कैसे संतुलन बना कर रखें साथ में अपनी क्षमता के अनुरूप अपनी उत्पादकता को बनाये रहे यह बड़ा मुश्किल काम हो जाता है।
ऐसे में यह कहा जा सकता है कि जब आपकी लड़ाई ख़ुद से होने लगती है तब हार-जीत का कोई मतलब नहीं होता। ऐसी स्थिति में दिल-दिमाग-शरीर सबके बीच सामंजस्य ही काम आती है।
जीवन शायद इसी का नाम है की दिन प्रतिदिन इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढते हुए आप खुद को कैसे बेहतर बनाएं और अंधी दौड़ में भागती इस दुनिया की रेस में ना पड़े और अपनी इच्छा अनुसार अपने रास्ते और अपनी मंजिल निर्धारित करें।
P.S- व्याकरण या शाब्दिक त्रुटि पर क्षमा।🙏
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