बिखरी डायरी

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यह एक आम धारणा भी है और अनुभव भी कि औरतें मर्दों की तुलना में ज्यादा रोती हैं। जरा-जरा-सी बात पर उन्हें रोना आ जाता है। खुशी में, गम में और कई मर्तबा असमंजस में भी औरतें रोती हैं और अपने मनोभावों को व्यक्त करती हैं। लेकिन आदमी कम रोते हैं। कई बातों पर जब उनका रोना स्वत: फूट रहा होता है, वे जोर लगाकर रुदन को रोक लेते हैं। उन्हें अगर किसी बात पर रोना ही होता है, तो वे एकांत में जाकर रोते हैं। और ऐसा सिर्फ हिंदुस्तान के मर्द नहीं, दुनियाभर के मर्दों के साथ है। एक तरह से यह साबित करता है कि पूरी दुनिया पितृसत्तात्मक रही है। जो समाज जितना ज्यादा पितृसत्तात्मक रहा है, जहां मर्दों की जितनी ज्यादा तूती बोलती है, वहां मर्द उतना ही कम रोते हैं।
यह मगर तय है कि मर्दों को भी उतना ही रोना आता है, जितना औरतों को आता है। कई बार जब शराब के असर में मर्दों पर पितृसत्ता का हिस्सा होने के अहसास का प्रभाव ढीला पड़ जाता है, तो मर्द भी फूटकर रोते हैं। मैंने शराब पीकर बड़े-बड़े दिलेर मर्दों को रोते देखा है। कुछ मर्द अतिसंवेदनशील होते हैं। पीने के बाद उन्हें किसी भी बात पर रोना आ जाता है और वे रोने का कोई मौका नहीं गंवाते क्योंकि पीने के बाद रोने का अपना सुख है।
अगर मर्दों को रोते हुए देखना है, तो सिनेमाघर उसके लिए सबसे उपयुक्त जगह है। हॉल के अंदर क्योंकि अंधेरा होता है, मर्द सबसे छिपाकर रो सकते हैं। हालांकि मैं उसे कई मर्तबा कह चुका हूं कि आदमियों के रोने में बुरा कुछ नहीं है। आंसू निकलना एक रासायनिक प्रक्रिया है और इसका किसी के कमजोर होने या स्ट्रॉग होने से कोई ताल्लुक नहीं । शायद आसपास का जीवन और विषम से विषम परिस्थितियों और फिल्में देख (जिनमें मर्दों को रोते हुए कम ही दिखाया जाता है) के मर्दों का अपना रोना छिपाने के पीछे समाज का ही हाथ है। आप गौर कीजिएगा किसी लड़के के गिरकर रोने पर आसपास के अंकल या आंटी द्वारा उसे कैसे चुप करवाया जाता है। पहला ही वाक्य होता है – ‘अरे बेटा, तुम तो बहादुर हो, लड़का होकर भी रोते हो?’ लड़के के बाल मन में यह बैठ जाता है कि अगर उसे बहादुरी दिखानी है, तो रोना नहीं है। दूसरों के सामने तो कतई नहीं। रोना पुरुष होने के स्वभाव के प्रतिकूल मान लिया गया। दूसरी ओर लड़कियों के रोने पर ऐसा कुछ नहीं होता। घरों में कई बार मांएं और दादियां ही बोल देती हैं- ‘उसे अकेले छोड़ दो। रोकर जी हल्का हो जाएगा, तो अपने आप चुप हो जाएगी।’
इस तरह लड़कियों को बचपन से ही रोना अपने लड़की होने के अनुकूल लगने लगता है। इसलिए वे बेझिझक रोती हैं। बेबसी में रोती हैं, गम और खुशी में रोती हैं, असमंजस में रोती हैं, डर में, कल्पना में, अतीत को याद कर और भविष्य के बारे में सोचते हुए, वे किसी भी बात पर रो लेती हैं और हल्की हो जाती हैं। पुरुष सब दबाकर रखता है और इसलिए हमेशा खिंचा रहता है, भारी बना रहता है। रोना आने पर ओबामा भी पब्लिक के सामने ही रो पड़े थे। कपिलदेव को भी हम फूटकर रोते हुए देख चुके हैं। आप अगर पुरुष हैं तो कभी आजमा के देखें, जरा-सा रोने से छोटे नहीं हो जाओगे, हलके जरूर हो सकते हो।।

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