आनंदऔर अनुभव
एक बार फिर मैंने समय के कुछ पीछे जाकर, कुछ महीनों बाद फिर से कुछ यादों को निकालने का प्रयास किया है।
आइये आपको एक ऐसे यात्रा वृतान्त के भवसागर में ले चलते है, जो कुछ लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया था, और शायद ही उसे कोई भुला पाया होगा।
कहानी कुछ यूँ है कि अपने कॉलेज के ओर से कुछ अन्य बड़े संस्थान जैसे आई आई टी आदि में सांस्कृतिक कार्यक्रम, कला, ज्ञान विज्ञान, साहित्य या फिर किसी अन्य प्रकार के क्षेत्र में बाक़ी संस्थान से दो दो हाथ करने और वहाँ के दूर से लगने वाले रंगीन जीवन और कुछ दिनों तक स्वतंत्र पूर्वक दिन रात विचरण करने की छूट की कामना के साथ सभी का जाना होता था। जिसमें संस्थान के सीनियर खिलाड़ी के नेतृत्व में जूनियर्स को भी मौका मिलता था। जहाँ ज्यादातर कानपुर जाना होता था।
कहानी कुछ ऐसी ही थी इस बार भी, किंतु इस बार परंपरा तोड़ने का समय था कुछ वो करना था जो शायद पीछे न हुआ था, सभी के दिमाग़ में यही था कि कानपुर ही जाना होगा, जिसको ध्यान रखकर तैयारी शुरू हुई।
कहानी में मोड़ तब आया जब एक नई जगह का नाम सामने लाया गया यानी दिल वालों की जगह दिल्ली, तमाम जद्दोजहद के बाद निष्कर्ष ये निकला कि इस बार कॉलेज की ओर से दो टुकड़ी भेजी जाएगी जो एक कानपुर में धूम मचाएंगी और एक दिल्ली में।
कुछ परंपरावादी विचारधारा के साथ कुछ अन्य लोग भी कानपुर के लिए जाने के तैयार हुए तो वही दिल्ली जाने वालों की संख्या कही ज्यादा सामने दिखी।
वैसे तो पुराने इतिहास के मुताबिक़ कुछ चंद लोंगो के ही जाने की , कुछ शर्तों के साथ परंपरा रही थी।
शर्ते इस बार भी थी, लेकिन शायद इस राम राज्य में थोड़ा औरों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिल गया था।
ट्रेन इलाहाबाद से दिल्ली के लिए रात्रिकाल में चली,पूड़ी सब्जी खाके सब सोये और हम सही सलामत वहाँ अपने योद्धाओं के साथ पहुँचे भी, हौजखास मेट्रोस्टेशन होते हुए आई आई टी कैंपस में प्रवेश हुआ और चार दिनों के इस समय सारणी में सुबह नौ बजे से सायंकाल तक हमें वहाँ के कार्यक्रम में भाग लेकर अपना जौहर दिखाना होता था, और उसके बाद वो एक लंबी टीम अपनी अपनी श्रद्धानुसार छोटी छोटी टुकड़ी में बट जाया करती थी।
फ़िर चाहें विशाल-शेखर के गाने हो, बैंड नाईट हो, कवि सम्मेलन हो या फ़िर कुछ अन्य प्रकार के मनोरंजन युक्त कार्यक्रम।
इसी बीच कुछ घूमने के शौकीन लोग दिल्ली भ्रमण पे भी निकल लिया करते थे, इन्हीं में एक टीम हमारी थी जिसके कुल आठ सदस्य थे जिनका काम दिन भर, मूल काम करके रात्रि भ्रमण पे निकलना था, शुरुआत हमनें जे एन यू की गलियों से किया जहाँ पूरा कैंपस घूमकर उन्हीं गलियों में गाने गुन गुनाकर न जाने कित्ते चक्कर काटे।
किसी महानुभाव ने चाँदनी चौक के पराठे खाने का प्रस्ताव रखा और प्रस्ताव मिला फ़िर देर किस बात की हम वहाँ भी गए, वहाँ छत्तीस क़िस्म के पराठे थे तो लेकिन उसके बाद भी सुल्तानपुर के आदर्श ढ़ाबे के 15 रुपये के पराठे का भी मुकाबला न कर सका, साथ ही हमनें इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन, संसद भवन इन सब जगहों का भ्रमण किया।
इन तीन दिनों के उठापठक और तमाम मौज़ मस्ती के साथ और न जाने कितनी यादों के साथ हमें अब वापस अपने वतन लौटना था रात्रि ग्यारह बजके पचास मिनट पर हमारी ट्रेन थी। चूंकि शाम आठ बजे ही सभी फ्री हो चुके थे तो नौ बजे वहाँ के ग्राउंड में सबको इकठ्ठा होने को कहा गया था जिसके बाद हमें वहाँ से निकलना था।
कहानी में असली मोड़ तो यहाँ आना था, ओला, उबर के जमाने और उसके ऑफर के चक्कर में कुछ लोगों ने कप्तान महोदय से आज्ञा लेकर 9बजे ही निकलकर स्टेशन पे मिलने की बात कही, चूंकि समय हमारे पास पर्याप्त था, इसलिए इसमें कोई समस्या भी नहीं थी और 4-4 के समूह में जाना भी थोड़ा आसान था बजाए 24 लोगो के एक साथ के, कुछ इसी कड़ी में बाक़ी सभी भी इसी ऑफर का लाभ लेकर समय रहते स्टेशन पहुँच चुकें थे, कप्तान महोदय के साथ पाँच अन्य लोग जो बाक़ी देख रेख में लगे थे,
कि सब पहुँच चले फ़िर हम लोग भी निकलते है,
वो आख़िरी कैब जो ग्यारह बजे आ रही थी जिसके बाद भी हमारे पास पचास मिनट थे और शायद हम आराम से पहुँच जाते किँतु वो ड्राइव मुख्य द्वार के बजाय IIT के पिछले गेट पे चला गया जिसे हमारे पास पहुँचने में लगभग आधे घंटे लग गए वो लगते भी क्यों न, ये कोई KNIT थोड़े न था, दिल्ली जैसा शहर और रात्रि का समय जहाँ और कोई विकल्प भी न था,
जैसे तैसे हम भागमभाग करते हुये निकले तो, ट्रैफिक का भी सामना करना पड़ा, हमनें कई जगह ट्रैफिक नियम को तोड़ते हुए 100 km/h तक की स्पीड भी, हमें मंजिल तक न पहुँचा सकी यानी ट्रेन छूट चुकी थी।
इन सबमें जो सबसे दुःख की बात थी वो ये की सभी 24 के टिकट ही हमी के पास थे, हमारे कुछ क्रांतिकारी मित्रों ने chainpulling भी की और पुलिस कर्मियों से लाठी खाने को भी तैयार हुए कि बस हम पहुँच जाए किन्तु कुछ पैतरा काम न आया, जिसके बाद हमारे दिमाग में एक ही विचार था कि कम से कम हम टिकट ही पहुँचा सके जिससे बाकी लोग आसानी से पहुँच सके, हम बचे लोग कैसे भी आ जायेंगे।
इसके बावजूद भी ट्रेन दुबारा पटरी छोड़ रही थी, टिकट हमें S4 तक ले जाना था किंतु हम सब में से एक इंसान ने दौड़ते भागते टिकट भी S7 में खिड़की पे बैठे एक सज्जन तक ही टिकट पहुँचा सका और गाड़ी के स्पीड के साथ भागते हुए उसका मोबाइल नम्बर याद किया और उसे बोला आपको इस टिकट का क्या करना है हम फ़ोन पे बताते है।
भला रहा उस सज्जन का फ़ोन के माध्यम से उन्होंने उस टिकट को हमारे साथियों तक पहुँचा दिया था। यहाँ थोड़ी जान में जान तो आ गयी थी लेकिन समस्या अभी ख़त्म थोड़े न हुई थी।
हम छः में से तीन का मोबाइल का बन्द था, एक के पास डब्बा फ़ोन था, और ओला के चक्कर में मेरा फ़ोन ट्रेन में बैठे साथियों के पास था, कुल मिलाकर एक ही फ़ोन चलती हालात में था जिसका भी बंद होना कुछ ही समय बाद तय था और उसके बाद नई दिल्ली स्टेशन से कोई दूसरी ट्रेन भी न थी। इस समय कुछ लोग अपना आपा खो चुके थे।
किंतु यही जीवन है जहाँ आपको हर वक्त संयम और धैर्य बनाये रखना होता है, कुछ अन्य विषम परिस्थितियों के कारण रात्रि 1बजे दूसरे के माध्यम से टिकट का जुगाड़ किया गया अब हमें आंनद विहार स्टेशन से गाड़ी पकड़नी थी जिसका समय सुबह 5 बजे था, किसी तरह वहाँ पहुँचते ही बचा हुआ फ़ोन भी बंद हो चुका था।
पिछले दो रात्रि से जागने की वजह से सभी की हालात पस्त हो चुकी थी, इन्ही सबके बीच में सभी ज़मीन में पड़े सो चुके थे।
किंतु एक महोदय जो दीवार के सहारे जो अपना फ़ोन चार्ज कर रहे थे वो पेट पर मोबाइल रख कर ही सो गए जिसका परिणाम ये हुआ कि उसी रात ट्रेन के कुछ समय पहले वो फ़ोन भी चोरी हो चुका था। बहुत ढूंढने के बाद भी कुछ न हो सका, सुबह पाँच बजे हम कौन सा FIR या complain करते और अगर जाते भी तो दूबारा ट्रेन छूट जाती।
इत्ती समस्याये कम थी क्या? जो 12000 का और चूना लग चुका था, ख़ैर बड़े मुश्किलों से हमनें अब ट्रेन पकड़ने का निश्चय किया और सब कुछ वही और उसी वक्त भूल जाने का निश्चय किया और पहले निकले सभी टीम सदस्यों को भी इन बातों को अपने पास तक ही रखने को कहा गया जिससे कॉलेज में किसी प्रकार की अफ़रातफ़री न हो और भविष्य में और लोगो को कहीं बाहर जाने से रोका न जाए।
ख़ैर इस घटना को कही चार वर्ष होने वाले है, अभी भी इस घटना का वृतान्त कुछ ही लोगों को पता है, किन्तु इस समय में उस समय की कुछ छायाचित्र को देखते ही पूरी कहानी आँखों के सामने चलने लगी तो सोचा आज क्यों न इसे छोटे रूप में शब्दों में पिरोने की कोशिश की जाए।
जीवन कोई Scripted Story नहीं, हमेशा खुश रहे और हर पल का आनंद लेते हुए संयम और धैर्य के साथ आगें बढ़ते रहे।😊🙌
P.S.- किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए क्षमा याचना।🙏


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