बिखरी डायरी

Expression of thoughts, Life Experiences, Book Reviews, Analysis and Most importantly a balance between personal life and professional life.

एक ऐसा खेल जिसे शायद पूरी दुनिया खेलती है या यूँ कहें वो खेल ख़ुद लोगों को खेलने पर मज़बूर कर देता है।

जी हाँ!!
नाम है ख्वाइशों का खेल!!!
कुछ यूँ कहें तो व्यक्ति का पूरा जीवन कुछ और नहीं ख्वाइशों से भरी एक दुनिया मात्र है,
समय के बढ़ते चक्र के साथ वो सारा दांव पेंच सिर्फ़ ख्वाइशों के लिए ही तो लगाता है फ़िर चाहे वो ख़ुद की हो या किसी और की।

आईये थोड़ा सा आपको इस शब्द के भव सागर में ले चलते है, किसी बच्चे का इस दुनियां में अवतरित होना भी एक ख्वाइशों का ही परिणाम है, माँ बाप उसके अपने पैरों पे खड़े होने से पहले ही न जाने कितने सपनें और ख्वाइशें को और जन्म दे देते है और जरा सा मौका मिलते ही उसे ज़िन्दगी की इस रेस में अपना घोड़ा समझ दाव लगा देते है और सारी देख-रेख इन्हीं ख्वाइशों के साथ ही होती है कि ये एक दिन किसी लंबी रेस में बाज़ी मारेगा।

कोरे कागज की तरह बच्चे की ज़िन्दगी पे समय से पहले बेवजह यूँ ही इत्ता लिख दिया जाता है जिसके बोझ के तले वो दबने लगता है ,
लोग लिखतें भी शायद इसलिए है कि उन्हें लगता है यही एक मात्र उपाय है। क्या ये नहीं हो सकता? कि समय के इस चक्र में वो बच्चा अपने जीवन की डायरी ख़ुद ही भरे।

और इसी क्रम में वो बच्चा 16-17 की उम्र में ही सामान्यतः अपने सपनों की भी बात करने लगता है पर उसे ख़ुद नहीं पता जिसे वो सपना कह रहा जाने अनजाने में वो कितने लोगों की ख्वाइशें मात्र है।

वक़्त गुजरने के साथ मिली समझ और वक़्त के तकाज़े से अब उसी बच्चें की भी ख्वाइशों का जन्म होने लगता है, चंद महीनों में ही उसे यहाँ की भौतिक चीज़े आकर्षित करने लगती है, फिऱ चाहे उसकी शुरुवात खिलौने पाने की इक्क्षा हो या खाने पीने की, ये छोटी छोटी चीज़े उस बच्चें के लिए इतने कम समय में ही इतनी बड़ी बनने लगती कि वो एक बार को अपनी जान दे या किसी की जान ले भी सकता है।

ख्वाइशों के इसी स्तर पे कुछ समय बाद उसे अपनी गैंग यानि यार दोस्त सबसे प्रिय हो जाते है और इसी सबके बीच में उन्हीं माँ-बाप से विद्रोह की भावना शुरू होने लगती है क्योंकि उसे लगता है कि मेरी ख्वाइशों का दमन करने वाले यही लोग है।

कहानी तो अभी शुरू हुई है, मनुष्य का सामाजिक और संवेदनायुक्त होना ही शायद उसे अन्य प्राणियों से अलग बनाता है और इसी सामाजिक परिदृश्य में प्रेम उसके जीवन का एक अभिन्न अंग होता है फ़िर ये प्रेम चाहे किसी व्यक्ति से हो या वस्तु से।

और मध्यावस्था में उसका प्रेम यानी किसी से भावनात्मक लगाव या किसी व्यक्ति विशेष या फ़िर किसी भी अन्य चीज़ से लगाव ऐसे चरम स्तर पे होता है कि अब तक की सारी ख्वाइशें उसे तुच्छ लगने लगती है और उसे लगता है शायद जीवन का सबसे सौंदर्य पूर्ण भाग यही है क्योंकि उसके पास इस समय सौंदर्य, साहस, ऊर्जा शायद सब कुछ अपने चरम स्तर पर होता है किन्तु वो भूल जाता है कि ये खेल अभज लंबा चलने वाला है और इन्हीं सबके बीच ख्वाइशों के इस खेल में वो कुछ समय बाद खुद को पिछड़ा या ठगा हुआ पाता है।

और इस सारी जद्दोजहद के बाद ज़िन्दगी के एक चौथाई भाग गुजार लेने के बाद उसे ध्यान आता है अब उसके जीवन में स्थायित्व की जरूरत है और वो इस भ्रम में पड़ जाता है कि ये स्थायित्व उसके बेहतर कैरियर और सामाजिक प्रतिष्ठा आदि से मिल सकता है और इस प्रकार जानें अनजाने में वो एक बार फ़िर वो एक नई ख्वाइश को जन्म दे चुका होता है…!!

यहाँ से फ़िर अपनी निजी ख्वाइशों के साथ ही घर परिवार की ख्वाइशों द्वारा झोंके जीवन की लम्बी रेस में पुनः शामिल जाता है। तो स्वाभाविक ही है जब रेस है तो कोई जीतेगा या हारेगा।

या यूँ कहें ख्वाइशें ही है या तो मुक़म्मल होंगी या कुछ अधूरी रहेगी। और अग़र इसके बाद भी वो समझने में असमर्थ रहा तो ऐसे ही आगें भी इसी खेल में फंस कर रह जाता है।
और सहजता, ठहराव, संतोषपूर्ण जीवन जैसी विशेष अनुभूतियों से कहीं न कहीं दूर भी हो जाता है।

कुल मिलाकर ये एक ऐसा चक्र है जिसका कोई अंतिम बिंदु ही नहीं है इससे निकलने के लिए उसे तोड़ कर बाहर निकलना ही संभव है।

और सबसे मज़ेदार बात!!
ये खेल इतना रोचक है कि न वो सब इससे निकल पाते है और न ही वो खेल उन्हें निकलने का मौका देता है।।

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