बिखरी डायरी

Expression of thoughts, Life Experiences, Book Reviews, Analysis and Most importantly a balance between personal life and professional life.

School Days Memories

स्मृतियां

यादोंकेकुछझरोखोंकेसाथ

Part -1

आज भी जब उन दिनों की याद आती है, तो लगता है कि वो लम्हें कितने हसीन थे।

दिल करता है फिर से उन्हीं लम्हों, उन्हीं अधूरी गलियों, और उन्हीं शोरगुल वाले पलो में कही खो जाने को।

जब ठीक से होश संभाला, जब से चीज़े याद रह सके ऐसी स्थिति आयी-
आज दिमाग़ पर जोर डालते हुए याद आये उन लम्हों को एक छोटा सा रूप देने का प्रयास……!!

सभी समस्याओ से परे, न कोई इक्क्षा, न कोई आकांक्षा, न ही कोई स्वार्थ, न किसी से बैर, न ही किसी से दोस्ती, अपनी दुनिया का मस्ताना और खुले आसमान में परिंदों की तरह उड़ने का वो दौर.

सुबह में माँ की गालियों से जगाया जाना, दूबारा सो जाने पर पापा के आने से तुरन्त उठ बैठना और फिर दैनिक क्रिया कलापों के बाद, उन बन्द दीवारों में दिन भर के लिए कैद हो जाने के लिए अपने आप को मानसिक तौर पर तैयार करना।

स्कूल जाने के लिए कभी मना न करना, और उसके बाद घर वालों द्वारा 1 रुपए देकर (मानो पूरी दुनिया इसी एक रुपये में मिल गयी हो।)
एक ही बाइक पर तीन लोगों को बिठा कर घर से दूर एक विद्या मंदिर कहे जाने वाले दीवारों के बीच छोड़ आना.

जहाँ पहुँचने के बाद जब वो बूढ़ा शेर (दुर्गविजय सिंह जी) उस तीसरे मंजिल से हाथ मे टेलीफोन लिए उतरता था तो सारा प्रांगड़ खाली हो जाया करता था।

वही कभी देवभास्कर जी जैसे सहज व्यक्त्वि से तो कभी राजबली जी (वेस्टइंडीज निवासी-Part time Electrician) जैसे योध्वाओ से पाला भी पड़ता था।

थोड़ा वक्त गुजरा और विभिन्न प्रकार के उपकरणों से लैश आलराउंडर हरीराम जी ने रेखागणित का ज्ञान बड़े प्रेम से दिया जो बाद में सामाजिक विज्ञान से लेकर संस्कृत जैसी विषयो तक अपनी धवस भी जमायी।

उन 6 घंटो की अवधि में हमेशा उस मध्यावकास का इंतज़ार और वो गोलचक्कर वाले झूले और ज्यादा मन होने पर उन सरकते हुए स्लाइडर का इंतज़ार करना ही बेहद प्रिय हुआ करता था!

गिरते उठते सीखते उन छोटे हाथ पाँव को अब लाल रंग की एवन साईकल मिल चुकी थी जो अपनी सीट को आगे की तरफ झुकाकर बस कहने को गद्दी पर बैठ कर साईकल चलाकर जाने लगा था।

शाम में जल्दी के चक्कर में लाइन से अलग साईकल खड़ा करने पर, श्यामबिहारी का लाइन के बीच में साईकल डाल देना और शाम को वापस आकर उसे ढूँढना मेरी वाली कहाँ(साईकल कुछ और नहीं) है?

अब वो समय भी आ गया था जब हमें बस ख़ाकी रंग के आधे पैंट से मुक्ति मिल चुकी थी अब हमें वो नीली पट्टी भी अपने कंधे पर नही लगानी थी जो कभी पैंट गिर जाने के लिए लगाई जाती थी।

स्कूल जाना अब ज़िन्दगी का हिस्सा था, और अब जाने में कोई संकोच भी नहीं होता था, क्लास में सबसे पहले पहुँचकर पहली बेंच पर बैठने का वो जुनून, फिर चाहे सर्दी हो या गर्मी, बरसात हो या आँधी तूफान, फिर चाहे बुखार हो या कुछ और घर वालो के मना करने पर भी अब तो स्कूल रोज ही जाना था।

इसी बीच जंगल मे एक नए प्राणी ने कदम रखा जिसे आगे चलकर उस राजगद्दी पर काबिज़ होना था नाम था राजेन्द्र सिंह जी जो कही न कही थोड़ा बहुत आधुनिकता से लैश तो थे और यहाँ पर साम्राज्य का विभाजन करके अलग अलग क्षेत्र प्रदान किया गया।

कुछ नए आयाम सामने आना शुरू हुए और अब
बाहर खुले मैदान में बिठाकर सबको वो घंटो भर तक ज्ञान श्लोक, सूक्तियां, दोहे, प्रार्थना करना, मुख्य समाचार मिलना शुरू हुआ। शुरू हुआ सांसद, प्रधानमंत्री का चुनाव भी जिसमें एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हुई।

शुरू हुआ एक नया दौर स्वाध्याय और सहपाठ का साथ में संस्कृतज्ञान परीक्षा का भी और साथ ही अब इस जंग में कुछ नए योद्धाओं का आगमन भी हो गया था जो पहले से अपराजित सेनापति को हटाकर युद्ध का कार्य भार संभालना शुरू कर चुके थे।

इन सबके बीच जयराम जी द्वारा दिया गया वो शारीरिक और नैतिकशिक्षा का ज्ञान, जिनके आँखों के कोने में वो कीचड़ हमेशा मिला करता था और ग़लती से अगर उन्होंने अगर अपनी घड़ी उतार कर मेज़ पर रख दी तो समझ लो आज तो किसी की सामत आ चुकी है।

इन्हीं बीच क्लास छोड़कर विज्ञान मेला और सांस्कृतिक प्रश्नमंच जैसी गतिविधियों ने थोड़ा कुछ अलग करने की भी दिशा प्रदान की। भारतीय इतिहास में प्रचलित वैदिक गणित का द्वारा बड़े बड़े अंको से खेलने का सुनहरा मौका भी प्राप्त हुआ।

‌कहानी आ पहुँची इस सदी के सबसे खतरनाक व्यक्तित्व से रूबरू होने का जिसका नाम था देवसरण जी सुबह का नहाया भले ही न याद हो लेकिन राम और बालक के रूप नींद में भी याद होने लगे थे वरना कौन अपने कान और नाभि को दांव पर लगायेगा।

‌साथ ही में एक अजीबो गरीब आत्मा का भी मूक दर्शन हुआ जिसको ध्यान करते करते आँसू बहा देने की कला प्राप्त थी, रोज कॉपी के दस पन्ने भरने ही थे वरना बेवजह ही मार खाने की तैयारी हो जाती थी…..!!

समय आया था अब अपने मन मुताबिक़ विषय का चयन(संस्कृत, कंप्यूटर, कला )कर नए युग में प्रवेश का……!!!

Part -2

कहानी का अगला पड़ाव,

समाज की आधुनिकता को देखते हुए कुछ लोगों ने कंप्यूटर, पूर्वजो की सलाह पर(नम्बर ज्यादा मिलते है) उन्होंने संस्कृत और गणित से घृणा करने वालों ने कला का चयन किया।
और उन तमाम पुरानी दोस्ती के बीच इन फ़ालतू वैकल्पिक विषयों ने दरार डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

A1,B1,C1 के नए अंग्रेज़ी के इन अक्षरो ने अलग अलग लोगों से मुलाक़ात भी कराई,

जिनमें से कुछ अनोखे व्यक्तित्व हुआ करते थे क्लोरोमिन्ट(Nick name- जो तब तक सूत्र सुनते थे जब तक बंदा भूल न जाये और वो मस्त हाथों पर चिपकाकर डस्टर की दनादन बौछार किया करते थे मानो बीवी का गुस्सा बच्चों पर उतार रहे हो)।
दूसरे भाई साहब विश्वकर्मा जी के सुपुत्र(ब्लैक मैन) भौतिकी के सवाल न साल्व करने पर इत्ता कान घुमा देते थे कि जब तक लाल रंग न उत्पन्न हो जाये।
और सबके पसंदीदा अनोखा अंदाज रखने वाले माननीय दूबे जी ohho संस्कृत के ज्ञाता(गुस्से में ये बच्चा ज्यादा भिन भिन करबा न तो एक तमाचा पड़ी ठीक होए जाबा येह नाते शांत रहा)
सबसे शान्त अपने काम धाम से मतलब नए नए बने हॉस्टल के वार्डन राम-लक्मन जी जिसने इस गोल मटोल और पुराने पड़े इतिहास को खांगलने का काम बख़ूबी किया।
और सबसे खतरनाक इंसान तो मस्त मौला मस्तराम जी सबकी अंग्रेजी सुधारने में लगे रहे(जिनके पास कहानियों का बेहतरीन संकलन भी होता था)।

अगले वर्ष दसवीं को देखकर सबलोगों ने कोचिंग की तरफ भी रुख मोड़ा कुछ साथी अल्फानगर शर्मा जी की शरण मे पहुँचे तो ज्यादा लोगों ने अनुभव युक्त प्रभु श्रीराम की शरण लेने का फैसला लिया।
प्रभु के दाएं हाथ के एक अँगुली टेढ़ी हुआ करती थी शायद इसलिए जिससे वो बच्चों के कानों में उंगली फसा कर आगे खींच सके, हाथ न पहुँचने पर डस्टर और चाक फेंककर मारने का भी उनका अभ्यास बेहतरीन था।

नए और निर्णायक वर्ष को देखते हुए घर वालों के कहने की बस दसवीं में अच्छा कर फिर सब सेट और साथ ही नई छात्रवृति योजना (80+ तो 11th & 12th फ्री) ने लोगों को सब कुछ दांव लगाने पर मज़बूर किया।

सुबह कपकपी ठंड में भी बस आँखे खुली रखकर सुबह 6 बजे साईकल से वहाँ पहुँचकर फिर स्कूल और वापस घर आकर वही सब घिसा-पिटा सारी समस्याएं कराधान पर आकर रुक जाती थी अगर ये सवाल बन जाएं तो समझो किला फ़तह।

जनवरी में प्री बोर्ड का एग्जाम और फ़िर घर बैठ पढ़ने की सलाह के साथ बन्द हुआ स्कूल आने का सिलसिला-

ज़िन्दगी ऐसे बहुत से अनुभव होते है जो पहली बार होते है तो इंसान कुछ पल के लिये सहम सा जाता है
मार्च का महीना सेन्टर GGIC बोर्ड के एग्जाम का वो पहला दिन जहाँ न तो अपना कमरा था, न स्कूल का, न तो स्कूल की बेंच थी न ही अपने कमरे की मेज और कुर्सी, जहाँ
एक रूम में चार चार परीक्षक थे, कलम गिरने पर भी उठा कर देने वाले लोग थे खैर वो 3 घंटा भी गुजरा और बाहर आकर उन जाने पहचाने चेहरो को देखने के बाद जान में जान आयी ।
किंतु कुछ को कुछ विशेष चेहरों के दीदार की जरूरत थी, किंतु समाज की कुछ अवधारणानाओ ने उन्हें हमसे अलग कर रखा था।

ये सिलसिला भी धीरे धीरे खत्म हुआ और अब समय था लगाए पेड़ से फल खाने का (30 मई दोपहर 1 बजे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सोनू कैफ़े रामनगर)

समय बदला और कुछ इतिहास के पन्ने भी और कई नामों को एक नई पहचान और कुछ को समाचार पत्रों में जग़ह भी मिली। कुछ दिनों बाद ये हलचल भी फ़ीकी पड़ी और अब समय था एक नए तकनीकि और वैज्ञानिक युग में प्रवेश का।

एक महीने के विराम बाद नया संकट उभरा,अब क्या मैथ्स or बायो? जहाँ मैथ्स का मतलब इंजीनियर और बायो का मतलब डॉक्टरी बता दिया गया था।

Part -3

कहानी अब एक नई मोड़ पर आ चुकी थी….!!

बचपन में माँ-बाप ने जिन नन्हें पौधों को लगाया था अब वो प्रौढा अवस्था में आ चुके थे, जिनको अब इस नवीन समाज में विज्ञान एवं तकनीक के साथ खाद और पानी देना था जिससे वो मधुर फलों के साथ जंगल में उभरते नई प्रजाति(अंग्रेजी माध्यम के लोग) के लोगों के सामने सिर्फ खड़े ही नहीं अपितु अपने आप को मजबूत और अपना अस्तित्व बनाए रख सके।

दसवीं नामक जंग में हार जीत के फैसले के बाद अपने विवेक स्वरूप सबने फ़ैसले(Maths or Bio) लिए और नए वेद और पुराण जैसे ग्रंथो के अध्ययन के लिए अपने आप को मानसिक रूप से तैयार भी।

इधर मैं भले ही 2 कदम से सीमा रेखा पार न कर पाया हूँ किंतु प्रदर्शन सम्मानजनक समझ कर पिता जी ने अब नई बुलेट(BSA साईकल) वो भी हरे रंग की एक बार को तो लगा शायद लाल से हरा रंग मानो अपनी जिंदगी का सिग्नल भी अब ग्रीन हो गया है लेकिन वो ये नहीं बताए बेटा कुछ शहरों में कोई सिंग्नल सिस्टम नहीं है वहाँ कोई नियम और कानून नहीं।

इस साम्राज्य के बेहतर प्रदर्शन ने दूसरे राष्ट्रों की जनता को अपने साथ होने के लिए मजबूर किया और कई नवीन सैनिकों की सेना में भर्ती हुई जो अपने यहाँ के कुशल सैनिक मानें जाते थे किंतु अगला युद्ध तो अब 2 वर्ष बाद होना था तब तक सबको अपनी अपनी धार मजबूत करनी थी।

सैनिकों के विभिन्न क्षेत्रों के शिक्षण के लिए अब नए गुरुजनों की नियुक्ति हुई
6 अस्त्रों से लैश अनसुलझी गणित को सुलझाने की जिम्मेदारी(और भई को दी गयी जो बाहरी अध्यापको से शिक्षा(Coaching) के धुर विरोधी थे)।

ग्रंथो जैसी किताबों को भौतिकी पढ़ाने के लिए(गाइड मास्टर को जग़ह मिली जिनसे वो गाइड अग़र ले ली जाए तो भौतिकी का ‘भ’ भी न बोल पाए, निरीक्षक महोदय सामने बैठे हो तो हाथ पाँव भी काँपने लगते थे)।

जिंदगी में कौन सा केमिकल लोचा कम था जो विभिन्न केमिकल अभिक्रियाओं को बताने तिवारी जी के बेटे आ गए (भाई साहब इत्ता छापाते थे कि हाथ से उंगलिया अलग हो जाये फिर भी उनको एक्स्ट्रा समय की जरूरत पड़ ही जाती थी)

और ‘स’ को ‘फ़’ बोलने वाले गबराल प्रभु बड़े मेहनती थे वो अलग बात है साला उनकी सुनता कौन था उनके लेक्चर के दौरान नोकिया 2600 जैसे नवीनतम फ़ोन का इस्तेमाल जो एक नई दुनिया का ज्ञान बाट रहा था,हम जैसे क्रिकेट प्रेमी तो बैग में छोटा रेडियो भी रखते थे।

दो दो रुमाल रखने वाले छोटे सिंह साहब(सुअर कही के) जिन्हें अगले वर्ष ही गद्दी संभालने का मौका भी मिला, साहित्य से लाबालब भरे रहते थे।

और इन सभी के साथ अब नया नया उभरता वयस्क लड़ाई, इश्क़, अन्य तमाम काम करना भी शुरू कर चुका था, हॉस्टल सुविधा से अन्य क्रिया कलापों को काफी मदद भी मिलने लगी थी।

इन सब बीच और हम जैसे कुछ लोग बिना पैर ज़मीन पर रखे, बिना ब्रेक लगाए घर तक साईकल रेसिंग की प्रतिस्पर्धा भी किया करते थे।

राजनैतिक परिपेक्ष में इस साम्राज्य(JBIC) में कुछ हलचले हुई और वहाँ का राजा(RS) अब उपनिवेशवाद(English medium) की ओर आकर्षित हुआ और गद्दी त्याग दी और आनन फानन में वहाँ के प्रधानमंत्री(Manager) ने वहाँ के सेनानायक(SS) को ही गद्दी दे दी जिसका दुष्परिणाम सामने ही था, लोग निरंकुश हो गए।

और इस प्रजा ने सभाओं में सू सू ,हो हो, भरे मैदान में पटाखो को जलाना, दिनदहाड़े दूसरों की खाद्य सामग्री निकाल कर खाने जैसे न जाने कित्ते गुनाहों को अंजाम दिया। नए नए कप्यूटर पढ़ाने आये तिवारी साहब को तो एक मार मार नारा ही रास्ता बदलने पर मज़बूर कर दिया ।

और इन्हीं परिस्थितियों में एक फ़िर जंग का सामना हुआ और इस बार युद्ध स्थल फत्तेपुर का वो मैदान था जहाँ से लड़ाई करके पाँच मिनट में वायु के वेग से लौटेते हुए सबको अपने अपने निजी व्यक्तिगत चाँद का दीदार करना भी होता था।

और इस जंग का परिणाम इत्ता भयंकर रहा कि सभी लोग न जाने इन हवा की वादियों में कहाँ खो गए।

मानो जिंदगी की ज़िम्मेदारी, उनके व्यक्तिगत संघर्षो ने उन्हें कहीं दबा दिया हो।
और अब तक उस सभ्यता और संस्कृति के लोगों को उनके एकसाथ उसी जोश और पागलपन के साथ नहीं देखा जा सका है।

“वो भी एक दौर था ये भी एक दौर है”…..कि पंक्तियों के साथ अपने इस संस्करण को यही समाप्त करता हूँ।
शायद आज भी सबको वो दिन, वो लम्हें याद है लेकिन वक़्त की इस करवट ने उन्हें ऐसे मोड़ पर आने के लिए मजबूर कर दिया है।

शुक्रिया सभी का इस खूबसूरत ज़िन्दगी का हिस्सा होने के लिए।😊

Disclaimer- there are lots of grammatical errors plz avoid 🙏

Disclaimer – कहानी का प्रस्तुतिकरण संक्षेप में।
इस्तेमाल किये व्यंग सिर्फ यादों को ताज़ा करने के लिए किसी को ठेस पहुचाना नहीं , किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा याचना🙏

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