बिखरी डायरी

Expression of thoughts, Life Experiences, Book Reviews, Analysis and Most importantly a balance between personal life and professional life.

इंजीनियरिंग का पहला साल

स्मृतियां

Content- 18+ (Keep calm and be patience)😅

Episode -1


यादों के उन्हीं झरोखों के क्रम में आगें बढ़ता हूँ,
आगें की कहानी में थोड़ा सहूलियत बरतने की जरूरत है और मैं उसका ध्यान रखते हुए आगें बढ़ रहा हूँ आप सब पढ़िए और आनंद लीजिये और उन यादों को ताज़ा करिए-
बच्चा जब होश संभालना शुरू करता है तब उसे छोटे छोटे प्रलोभन दिये जाते है जैसे बेटा! दसवीं में अच्छा कर लो फिर सही हो जाएगा, उसके बाद बारहवीं कर लो उसके बाद सब सही हो जाएगा।
यहाँ तक तो फिर भी पता होता है अच्छा पहले ये, फिर ये करना है, असली दिक्कत तो इसके बाद आती है अब करें तो क्या करें, उसे तो कुछ पता होता नहीं, फिर उसके आस पास के लोग उसका भविष्य तय कर देते है, बेटा मैथ्स है तो इंजिनीरिंग कर लो, बायो है तो MBBS और आर्ट है तो कॉमर्स, ये बताते तो ऐसे है जैसे साला Nestle ki Maggi hai दो मिनट में बनकर तैयार ख़ैर….!!!
मैं शायद कुछ इसी बातों में था बारहवीं करी, अब इंजीनियर बनना है क्यों मालूम नहीं, मुझे तो नहीं पता था, बाकियों का पता नहीं, अब इसका ये भी मतलब नहीं कि इंजिनीरिंग करके पछतावा कर रहा, नहीं भाई साहब जिंदगी में किये अपने किसी काम पर कोई पछतावा नहीं है, किसी को थोड़े न सिद्ध करना है हमें की हम कौन है और क्या है…!!
खैर आगे बढ़ते है इसी इक्क्षा के साथ हम आगें बढ़े और हमारे देश के शिक्षा मंत्री के कुछ अहम फैसलों ने अंत मे जैसे तैसे सुल्तानपुर शहर में एक सरकारी इंजीनियरिंग संस्थान KNIT में जगह प्रदान की इसमें उस समय एक ही अच्छी बात लगी थी कम से कम सरकारी तो है(बाकी सपनें तो सबने बड़े बड़े ही देखें थे)।
अब भाई साहब, झोला बोरा पैक करके बोलेरों में भरकर पहुँचे सुल्तानपुर घर से लगभग 100 किलोमीटर ही था।देखते ही लगा । अरी साला!!! कहीं ग़लत तो नहीं आ गए, चारों ओर जंगल ही जंगल लेकिन वहाँ के लोगो ने अहसास कराया बेटा एकदम सही जग़ह आये हो ।20 अगस्त 2014 दोपहर का समय- फॉर्म वाम भरकर गए वही नोटबंदी जैसी लाइन PNB में लगाकर जैसे तैसे घण्टों बाद पसीनें से तर बदर कई हज़ार रुपये घर वाले एक साथ दे दिए कि बेटा मेरा Enginner बनेगा ये वही घर वाले है जो पारले जी बिस्किट के लिए 2 रूपए भी न देते थे कभी!!
इन्हीं बैंको के लाइन में सबसे पहला इंसान मिला जो आगें चलकर मथुरा Yogesh Sharma नाम से जाना गया, इन सब के बाद भेजा गया ओल्ड Vs चौहान साहब, मार फ़ोन वोन दौड़ाए और बोले जाओ ऊपर के पहले कमरे में यानी(VF-01).पहुँचने के बाद पहके से रह रहे भाई का नाम भी Himanshu Pratap ही निकला थोड़ा बहुत बात आगें बढ़ने ही वाली थी कि
तभी आतंकवादियों के संगठन जैसा झुंड चिल्लाते हुए हॉस्टल में प्रवेश किया वो फर्स्ट ईयर बाहर निकल, कुछ ने तो बड़े सम्मान सूचक शब्दों के साथ बाहर निकाला, इससे पहले की कुछ समझ आता भाई बोला कपड़े पहनो और नीचे चलो, बाकी चीज़े मैं तुम्हें बाद में समझाता हूँ।
नीचे आया तो देखा ये सब लोग अपने को कल्ट सभ्यता के लोग बताकर, ऑडिशन के लिये आये थे, चिल्ला चिल्ला के पूछ रहे क्या आता है “मैं सोचा ऐसे कौन पूछता है भाई”, दिन भर का थका हारा, न खाया न पीया, साला फॉर्मल पहनाकर टाई लगाकर और मुंडी नीचे करवा कर पूछ रहे हो क्या आता है, बोल क्या आता है- गाना, डांस, एक्टिंग, मैं सोचा भाई पानी पूछ लें चक्कर आ रहा है और वैसे भी अपने को कुछ नहीं आता, मना करने पर क्या हाल हो रहा था सबको पता था मैं भी बस बचने के लिए न्यूज़ पेपर पढ़ दिया जिससे रिजेक्ट हो सकू।
4 घण्टों की एक जद्दो जहद ने ऐसा आलम बनाया कि उस दिन मुझे लगा “अब अपुन नहीं बचेगा”……!!!
ख़ैर इन सबके बाद अगले दिन सुबह क्लास जाने की जानकारी के लिए Same Branch, आज़मगढ़ के ही एक मेरी ही तरह मासूम सी सकल रखने वाले Prabhat Ranjan एक बन्दे से मुलाक़ात हुई बाद में पता चला बस इसकी शक्ल ही मासूम है सिर्फ़।
उसी दिन शाम में ही संगम नगरी से पाड़े जी के लड़के (2nd Room Partner) और दो आर्मी Background वाले लौंडो :- शायराना अंदाज़ रखने वाला बरेली के हुसैन साहब का बेटा Sahil D Hussain और अलीगढ़ के एक हरामी Neeraj Singh से भी हो चुकी थी।
अगले दिन सुबह क्लास जाने के लिए तैयार सभी लोग:- मस्त व्हाइट शर्ट, स्मोक ग्रे पैंट और लाल टाई, बालों में तेल लगाकर उसे एकदम चिपका कर लाइन में लगकर और मुंडी नीचे करके भेड़ो की तरह चल दिये और हमें सुरक्षा प्रदान कर रहे गॉर्ड साहब (आज तक मुझे समझ में नहीं आया वो क्यों रहा करते थे जब उनके होने न होने का कोई फायदा नहीं होता था) हाथ में डंडा लिए पीछे-पीछे।
लाइन न्यू VS पर थोड़ी देर ठहरती थी और रामानुजम होते हुए आगें।असली जंग तो रमन के सामने से PNB तक की होती थी जाते टाइम तो हम कभी कभी बच भी जाते थे लेकिन भाई साहब लौटते टाइम मानो “भूखा शेर शिकार का इंतज़ार कर रहा हो”, सर पे बैग रख कर मुंडी नीचे करके जब हमें दौड़ाया जाता था तो लगता था कि इससे अच्छा हम धावक ही बन जाते, वो हमारे महान सीनियर्स सम्मान के साथ भाग (…..) बोला न भाग सुनाई नहीं देता एक बार में (…..)|
ये लोग हमारा बड़ा ही ध्यान रखते थे जित्ता शायद अपना ख़ुद का भी न रखते रहे होंगें….!!

Episode – 2


Intraction के इसी दौर में Cultural Counsil में जो बेचारे CSA जाते थे वो हॉस्टल आकर सारी चीज़ें Explain करते थे और बाकी लोगों के ज्ञान में वहाँ से बृद्धि होती थी।
कुछ सीनियर तो साला 5 रुपये ऑटो का किराया देकर गोमती किनारे ले जाकर अपना खुद की भड़ास को जब भाड़े के रूप मे वसूलते थे न फ़िर लगता था अब आगे से अपुन को बाहर ही नहीं जाना है।
जैसा कि मैंने पहले एपिसोड में मैंने बताया था कि सीनियर्स को हमारी बड़ी चिंता रहती थी, ये हमारे पढ़ाई लिखाई से लेकर स्वास्थ्य(BP, Sugar, Migraine, Frequency) की जानकारी भी लेते थे ये तो शुक्र मनाओ सिर्फ जानकारी ही लेते थे कहीं कॉलेज में उपकरण उपलब्ध होता तो क्वालिटी(Canteen) पर चाय पीते पीते साला वही पूरा चेकउप भी हो जाता। खैर शुक्र मनाओ इंजीनियरिंग कॉलेज था मेडिकल नहीं।
ये लोग बड़े धार्मिक प्रवित्ति के भी होते थे पूछते थे कि कभी वेद, पुराण, कुरान, बाइबिल, कुछ पढ़ा है या कोई धार्मिक सीरियल ही देखा हो, मना करने पर तत्काल प्रभाव से शुरू करने का ज्ञान देते थे और बोलते थे सिर्फ़ थ्योरी पर ध्यान नहीं उन ज्ञान वर्धक चीज़ों को दैनिक जीवन मे इस्तेमाल भी करो(Practical is more Important than theory in B tech life.)
बाबा ढाबा की 20 रुपये की maggi और कोल्ड ड्रिंक की लालच दे कर काफी पुण्य वाले काम भी करा लेते थे जैसे क्रिकेट ग्राउंड, बास्केट बॉल, वॉलीवोल कोर्ट सब साफ करा लेते थे और तो और साला ये निकम्मा फाइनल ईयर इत्ता असाइनमेंट लिखवाया है जित्ता हमनें अपने खुद के चार साल में नहीं लिखे। लेकिन कुछ महारथी हमारे बीच में भी ऐसे होते थे जो 50 पेज लिख कर हज़ारों का चूना लगा देते थे। ये लोग उन्हीं से सही रहते थे।
सबसे तगड़ा Intraction तो रामानुजम कोर्ट यार्ड में “सिक्स ए साइड के मैच” के समय पहले “विक्रम जीत सर” की टेक्निकल कमेंट्री जिसका मुकाबला आज के आकाश चोपड़ा और जतिन सप्रू भी नहीं कर सकते है और उसके बाद का समय मतलब भाई I can’t Explain सिर्फ महसूस कर सकते है अगर किसी का पाला पड़ा हो तो।
इन्हीं सबके बीच पहला Sessional आ गया अंग्रेजी में हाथ तंग तो पहले से ही था पर ऐसी बुरी हॉल होगी सोचा नहीं था ख़ैर दोष सिर्फ मेरा ही नहीं था इकोलॉजी वाली Mam का उस दिन पढ़ाने का मन तो था नहीं क्यों कि उस दिन बारिश हो गयी थी और सब लोग क्लास चले गए तो उन्होंने सबके सामने कॉपी चेक कर दी और भाई साहब इज़्ज़त का जो फालूदा हुआ, बिना पढ़े उन्होंने 00/15 दिया, किसी ज़माने में 15/15 लाने वाला लौंडा इस बार सिर्फ़ fail ही नहीं था, अपना सम्मान भी खो चुका था। और किसी लड़की के रिजेक्शन से भी कही ज्यादा इस समय अंग्रेज़ी दर्द दे रही थी।
इन्हीं सबके साथ कहानी आगे बढ़ रही थी धीरे-धीरे लोगों को सब समझ आने लगा था सब थोड़ा स्थिरता की ओर बढ़ रहे थे।CS-IT वालों के पास एक आधुनिक किस्म का हथियार हुआ करता था जिसे लैपटॉप कहा जाता था जिसका इस्तेमाल Multipurpose होता है, इसके इस्तेमाल के अधूरे ज्ञान ने हमें प्रथम वर्ष में थोड़ी दिक्क़ते जरूर दी, लेकिन उसके बाद इसनें खासकर इन दो ब्रांच के लोगों को कभी किताबो से रूबरू होने का मौका ही नहीं दिया।बेचारे सब इत्ता पढ़ाकू थे कि जगह-जगह से सर्च करके सब सैकड़ो जीबी का Study Material एकत्रित कर रखें थे जिसमें सिर्फ एक ही सेमेस्टर का नहीं बल्कि अगले सेमेस्टर का भी पाठ्यक्रम मौजूद होता था।
अब धीरे धीरे इन सबका क्रेज फ़ीका पड़ने लगा था और अब कुछ और Councils का आगमन हॉस्टल में आना शुरू हो चुका था जो Personlity Development की बात किया करते थे आगे देखते है कैसा रहा डेवलपमेंट…!!

Episode -3

Personality Development के नाम पर, अब हर कोई इसी बात का हवाला देना शुरू कर चुका था कि ज़िन्दगी में कुछ अलग करना चाहते हो तो आओ सीखो और नहीं तो चूतिया हो और चूतिया ही बने रहोगें।
इसलिए अब ISTE, CSI, LIT, ME, IEI जैसे लोग आए “मण्डल Sir “कहते थे We are the best, “काव्यकर सर्” का सम्बन्ध ME वालों से ज्यादा था, और सबसे महत्वपूर्ण “शामद सर” की हिंदी और “योगेश सिंह सर्” की अंग्रेज़ी सुनकर ऐसा मन मोहा भले ही कुछ समझ नहीं आया हो ऐसा लगा( MaybeThis is the best). शायद इसलिए भी कि अंग्रेजी ने जो डर पैदा किया था वो और हिंदी से अपना पुराना लगाव था, यहाँ दोनों भाषाओं को साथ लेकर चल सकने का स्कोप था, बाकी जगहों के टेक्निकल चीज़ों से अपना दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था।
लेकिन भाई साहब!!! इनकी मार्केटिंग स्किल देख कर ऐसा लगा कि अपना पोडक्ट कैसे बेचा जाता है और वही से मुझे बाद में समझ आया कि जो दिखता है वही बिकता है, बेहद ही जबरदस्त अनुभव था वो।
अंग्रेजी के डर से मैंने अपने एक नए समुदाय की खोज भी कर ली थी यानी हिंदी मीडियम के लोगों की। जो पहले Sessional के बाद 5 लोंगो की एक समिति भी बनी और इस भयंकर रोग से निकलने के लिए हमने कई योजनाओं पर विचार विमर्श भी किया।
लेकिन इन पिछले 3 या 4 महीनों में कॉन्फिडेंस जो हिल गया था कि अंदर से आवाज़ ही नहीं निकलती थी लगता था साला तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया है उस चार दिवारी के अंदर सब कुछ कर सकते थे लेकिन बाहर कुछ भी नहीं। हमें आज़ादी कब मिलेगी, अभिव्यक्ति की स्वन्त्रता कब मिलेगी, कब हम इन जंगलो में स्वछंद विचरण कर पायेंगे। ख़ैर ये सब का भी दौर निकला सबकी ओपिंग हो गयी, सब जग़ह जाकर अलग अलग अनुभव मिला ।
लेकिन एक बात अग़र मंडल सर या आयुष सर् में से कोई भी मिला तो बोलूँगा सर् वो ISTE के 200 रुपये मेरे वापस कर दो निर्मल बाबा ने बताया है मेरी कृपा वही से रुकी है, शायद इसलिए मैंने स्लिप भी फ्रेम करा कर रखी है अभी तक!!
अब बारी थी Engineering जीवन के पहले सेमेस्टर की, हर पहली चीज़ में कुछ खास बात होती ही है इसमें भी जरूर रही होंगी।
ठीक इससे पहले 11 नवंबर 2014 को मेरा एक ऐसे डॉक्टर के साथ Appoinment हुआ जिसके दवाओं के साइड इफ़ेक्ट से मैं आज तक नहीं उबर पाया हूँ, खैर ये मामला थोड़ा व्यक्तिगत है इसकी चर्चा न करें तो बेहतर होगा😅
और इसी महीने में 22 नवंबर को पड़ा 19वां जन्मदिन, पिछले 18 सालों में शायद कभी मुझे जन्मदिन भी न याद रहा हो, मनाने की बात तो दूर रही, लेकिन इस बार उन 18 सालों की कसर एक साथ पूरी हुई, इत्ते लात पड़े की पूरी आधारसिला हिल गयी, इसी दिन एक साथ इत्ते सुख औऱ दुख दोनों एक साथ मिलने का अद्भुत अनुभव हुआ।
और इसी बीच हमारे साथियों ने कई आन्दोलन भी किये खाने और पानी को लेकर लेकिन शाम को जब कान के नींचे चौहान साहब ने दो तड़कता भड़कता दिया तो वही खाना पांच स्टार होटल का लगने लगा सबको।
फिर आया दिसंबर का पहला सप्ताह और हॉस्टल में पसरा सन्नाटा, ये वहीं हॉस्टल था जिसे 1 मिनट की लाइट जाने पर VG & VF के एक दूसरे के परिवार की याद आ जाती थी। लेकिन अब यहाँ ऐसा लगा जैसे सिर्फ लाशें रहती हो…..ये खौफ था एग्जाम का………!!!

Episode -4


पहले वर्ष के कहानी का अंतिम पड़ाव उन सभी यादों को इन आँखों में समेटने का वक्त जिससे अब शायद कोई अछूता नहीं था।
जैसे तैसे लोगों ने परीक्षा के भयंकर दौर से अपने आप को बाहर निकाला और शीत कालीन छुट्टियों का आनन्द लेने घर गए लेकिन उन्हें क्या मालूम था वो ख़ुशी आते ही ग़मो में परिवर्तित होने वाली है जी हाँ पहले सेमेस्टर के परिणामों में Mechnics में 50℅ से ज्यादा लोगों की बैक लगी, मेरे खुद की ब्रांच में 55 में 30 लोग fail हुये थे किंतु कोई दूबारा पेपर नहीं देना चाहता था, इसलिए सरकारी अस्पतालों जैसी लाइन लगाकर सब अपनी समस्याएं लिए मास्टर साहब के केविन पहुँचे, साहब हमको ये हो गया था, हमको ये, कुछ महिला मित्रों ने तो सीधा ब्रम्हास्त्र ही चला दिया और उनके चार छे अश्रु धाराओं ने उनकी नैय्या तुरन्त ही पार लगा दी।कुछ हम जैसे लोग खूब मलाई मक्ख़न भी लगाए (जिसे वहाँ की भाषा में कुछ और कहा जाता है), खैर बच तो हम भी गए उस दिन, लेकिन हमारे कुछ मित्र बेचारे अभी भी उबर नहीं पाए थे। और उन्हें अगले साल फिर से युद्ध में शामिल होना पड़ा।
अगले सेमेस्टर में जापान से लौटे फिजिक्स के प्रोफ़ेसर शरण साहब की क्लास में बस इलेक्ट्रान चक्कर ही लगाता रह गया और उनकी आवाज़ पहले बेंच पर बैठें बन्दे तक भी न पहुँचती थी, लेकिन सबको तो हुसैन Ma’am से फिजिक्स और Electroincs मिश्रा Ma’am से पढ़ना था शरण साहब को भला कौन देखना और सुनना ही चाहता था।
इसी दौर में ब्लैक स्मिति शॉप में एक महाशय भी थे जिन्होंने पूरा छः महीना “कोयला सेन्टर में करो ” इसी में गुजार दिया।
और इसी दौर में इन सामाजिक चेतनाओं के साथ दिल्ली की राजनीति में एक नया चेहरा मफलर मैन केजरीवाल की एंट्री भी हुई थी जिसने हमारे वर्ष खत्म होते होते अपने भी संकट खत्म कर लिया था और इन भाई साहब के समर्थन में हमने बताशे भी बाटे थे ख़ैर ये तो उस समय की ही बात है।
इन सबके बाद क्लास जानें कि परम्परा और बंक मारने की प्रथा भी शुरू हो चुकी थी जिसके लिए कभी कभी 9:30 बजे तो हॉस्टल का गेट भी बंद कर दिया जाता था, इन बंक का जायजा लेने चौहान साहब कभी कभी हॉस्टल भी आ जाते थे और इसी का शिकार एक बार शरद भाई भी हुए उनके बार बार दरवाजा खटखटाने के बाद भी दरवाज़ा न खोलने पर कहा जाना है- “कौन है बे beep beep” कहते हुए दरवाज़ा खोलना और जैसे ही दरवाज़ा खुला जब तक उन्हें कुछ समझ आता उनके कान के नींचे दो तड़कता भड़कता पड़ चुका था। और वो नई दुनिया का सैर कर रहे थे।
इस कहानियों में NEW VS हॉस्टल कैसे अछूता रहता वहाँ भी हमारा फर्स्ट ईयर ही तो रहता था, वहाँ के लोग बड़े शौक़ीन मिज़ाज के लोग थे, उन्हें वहां के बाथरूम में नहाने में मज़ा तो आता नहीं था, उनका जुड़ाव सीधा प्रकृति से हुआ करता था और उन पानी की टंकियों से बाल्टी से पानी निकाल कर नहाना और कमरों में भी पानी डालना उन्हें इत्ता भारी पड़ेगा उन्हें इसका कोई अंदेशा नहीं था, पांडेय जी तो Main Gate बंद करके लाइट ऑफ करके जब अंदर घुसे (जैसे हिंदी बॉलीवुड में हीरो विलेन के घर मे घुस कर मेंन गेट बंद कर देता है) और एक एक के बालों में हाथ डाल डाल कर चेक किए और जिसका भी भीगा हुआ बाल पाए उन सबको चुन चुन के बहुत पेले, यहाँ तक की बात तो समझ आती है, अगले दिन जो नुकसान के नाम पर फ़ालतू हज़ारो का फाइन ठोके थे न (अपनी जेब भरने के लिए) लोगों का उसके बाद से नहाने से विश्वास ही उठ गया।
इन तमाम कांडों के साथ यह पहला वर्ष अंतिम चरण में था और एक बार फिर दूसरा सेमेस्टर आ चुका था, पहले सेमेस्टर के झटकों से सब काफी कुछ सीख चुके थे और इस बार काफी तैयारी के साथ एग्जाम हॉल में जाने वाले थे, और वो समय भी आया और लोगों ने अपनी परीक्षाओं को खत्म करके अपने वतन वापसी करने वाले थे जिनके चेहरे पर अलग ही ख़ुशी थी, इससे भी ज्यादा ख़ुशी शायद इस बात थी की घर से लौटने के बाद हम भी सीनियर होंगे और उन तमाम ख्वाबो को अंज़ाम देने की तमन्ना लिए बैठे हुए थे, लेकिन उन्हें क्या पता था, ख़्वाब तभी तक ख़्वाब होते है जब तक आँखे बंद रहती है।
और सबकी विदाई एक अलग अंदाज एक सम्मेलन के साथ जिसमें सबने अपने अनुभवों को साझा किया था और थोड़े से खान पान से अन्त हुआ जो IT ब्रांच का संगठन था जिसे MECHINICAL वाले ISI की तरह दूसरे संगठन की संज्ञा दिया करते थे।
और इस प्रकार ये पूरा वर्ष जीवन की न जाने कितनी घटनाओ के साथ अपने ढ़लान को प्राप्त कर चुका था।

पहले साल के अन्त में आते आते पहली बार कॉलेज में cultural Fest अनुभूति में लोंगो ने कुर्शी, मेज़ ,बेंच, पानी डालने से लेकर न जाने कित्ते काम किये बस इस उम्मीद में कि ये नेशनल लेवल फेस्ट है और जहाँ पर हमारे कॉलेज के लोग ही छुट्टी समझ घर निकल लेते थे, ख़ैर पहली बार फरवरी के अन्तिम सप्ताह में लोगों ने गजेंद्र वर्मा की गीतों पर अगर खूब झूमा तो बारिश ने मुमताज नसीम और दिनेश रघुवंशी की कविताओं को CSA हॉल तक सीमित कर दिया गया जहाँ हम जैसे प्रथम वर्ष के प्रताड़ित लोंगो को ही घुसने का मौका नहीं मिला, जिन्होंने न जाने कितने सपने देखे थे, कोई बाहर से ही तो संसद और राज्यसभा के तरह विशेष टिकट पाए लोगों के फ़ोन की रेकॉर्डिंग से ही काम चलाना पड़ा।
2 लाइन्स कुछ यूँ थी- “Ghar se nikali to thi mene socha na tha itni muskil mulakat ho jayegi,kya khabar thi ki mosam badal jayegaor raste me barsat ho jayegi”….!!
और वो लास्ट डे की dj नाईट ने पूरे साल भारतीय वेश भूसा में रहने वाले देवी देवताओं को एक दिव्य शक्तियों की प्राप्ति हुई, और सबने उसका प्रदर्शन बड़े जोर शोर से किया, परिणाम बाज़ी देवियों ने ही मारी, और ऐसे रूप देखने को मिले जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की हो। हम जैसे लोगो को अन्य समुदाय(Senoirs) ने ज्यादा आकर्षित किया, हम सब ने उस दिन सुंदरता के कुछ असली रूप देखे जिसे शास्त्रों में कामवासना कहा गया है।
कई देवताओं को अपनी राधा के प्राप्ति का आभास भी हुआ पर उन्हें कौन बताए राधा तो कृष्ण को न मिली थी।

इंतज़ार था अगले वर्ष किसी नवीन कहानियों और तमाम उठा पथक की।



Happy Ending of First year 🤗

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